Patriarchy : श्राद्ध  का  महत्व
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  • September 10, 2022

बी कृष्णा नारायण पितरः प्रीति मापन्ने सर्वाम प्रीयन्ति देवता || पितर के प्रीत से ही देवता प्रसन्न होते हैं| जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे, आर्यावर्ते, पुण्य क्षेत्रे (अपने नगर/गांव का नाम लें) श्वेतवाराहकल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे, उत्तरायणे बसंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुक वासरे , अमुक गोत्रोत्पन्नोऽहं (अपने गोत्र का नाम लें), अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं … च अहं पूजन करिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन निर्विघ्नतापूर्वक कार्य सिद्धयर्थं यथामिलितोपचारे… पूजनं करिष्ये। किसी भी शुभ संकल्प से पहले जब पंडित जी यह मन्त्र बोलते थे तब हमारा ध्यान बरबस ही इस ओर जाता था| जब मैंने बाबूजी से इसके बारे में पूछा तब उन्होंने विस्तार से इसके बारे में बताया और न केवल मेरी शंका का शमन किया अपितु अपने पूर्वजों से भी मिलवाया| इस मंत्र में अन्य बातों के साथ जब हम अपना गोत्र जोड़ते हैं तो अपने पितरों के साथ तो हम अपना सम्बन्ध स्थापित करते ही हैं साथ ही साथ हम कौन हैं इसकी पहचान भी होती है| श्राद्ध – अपने पितरों से मिलने का समय, उनसे मिलकर एकाकार होने का समय, उनके प्रति श्रद्धाभाव से समर्पित होने का समय है| श्रद्धां दीयते, श्रद्धां क्रियते, श्रद्धां अनुदीयते श्राद्धं| श्राद्येषु पितरं तृप्तः| श्राद्ध को लेकर शास्त्रीय कथन क्या है?…

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