और जब पानी नहीं मिलता तब खारा पानी पी कर ही गुज़ारा करना पड़ता है। इलाके में पाइप लाइनें तो बिछाई गई है लेकिन सिर्फ दिखाने के लिए। ओर तो ओर गर्मी के दिनों में पानी के लिए पूरे इलाके में हाहाकार मच जाता है। जो सफाई कर्मचारी है वो भी सफाई करने के लिए महीने में इक बार आते है और कूड़ा वही जमा कर के रख जाते है हमें खुद ही नाले का कूड़ा उठाना पड़ता है। जो खारा पानी आता है वह भी काला और मिट्टेयों से भरा, जिसका इस्तेमाल घरेलूं काम काज में भी महीं हो पाता है।
इन सब के बीच जो सबसे बड़ा सवाल हैं वह यह है कि जो वादे इलेक्शन के वक्त किए जाते है क्या उनका कोई मायने नहीं? क्या सिर्फ गरीब जनता सरकार के लिए एक वोट बैंक का जरिया मात्र है। क्या जो मूलभूत सुविधाएं जनता के लिए बनी है उन पर गरीब झुग्गी वालें लोगो का हक नहीं। जिन मुद्दों को विधानसभा सत्र में उठाया जाता है क्या धरातल स्तर पर वह सुविधा मिल भी रही या नहीं। लोगों का कहना है कि कई बार कम्प्लेन करने पर भी कोई इस दिशा में सुनने को तैयार नहीं है।