चरण सिंह
समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का ऐसे ही राजपूतों से लगाव नहीं रहा है। ऐसे ही वह चंद्रशेखर सिंह को अपना राजनीतिक गुरु नहीं मानते थे ? ऐसे ही उन्होंने मोहन सिंह को पार्टी का प्रवक्ता नहीं बनाया था। ऐसे ही अमर सिंह उनके सारथी नहीं थे ? ऐसे ही उन्होंने सीएन सिंह, अखिलेश सिंह, कीर्तिवर्धन सिंह को सांसद नहीं बनाया था। ऐसे ही पोटा लगने पर राजा भैया का साथ नहीं दिया था। ऐसे ही मुलायम सिंह की दोनों ही बहू डिंपल और अपर्णा राजपूत समाज से नहीं ली हैं। नेताजी राजपूतों से सामंजस्य बैठाकर चलते थे। राजपूतों और यादवों के रीति रिवाज एक से हैं। रहन सहन एक सा है। ऐसे ही मुलायम सिंह समाजवादी में राजपूतों को पूरा सम्मान देते थे। इन सबकी वजह यह थी कि वह राजपूतों का वजूद जानते थे। राजपूतों की प्रतिबद्धता जानते थे।
अखिलेश यादव हैं कि वह लोकसभा चुनाव की खुमारी से नहीं निकल पा रहे हैं। अखिलेश यादव यह भूल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में उनको 37 सीटें मिलने के कई कारण थे। एक तो आरक्षण और संविधान का मुद्दा चल निकला था दूसरे यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और गृह मंत्री अमित शाह में वर्चस्व की लड़ाई के चलते योगी आदित्यनाथ नाराज होकर दूसरे राज्यों में पार्टी का प्रचार करने चले गए थे। तीसरे गुजरात में पुरुषोत्तम रुपाला के राजपूतों पर घटिया टिप्पणी करने पर उत्तर प्रदेश के राजपूत बीजेपी से नाराज हो गए थे। जिसका फायदा सपा को हुआ था।
अखिलेश यादव को यह समझ लेना चाहिए कि देश में कितना भी जातिवाद हो जाए पर महापुरुषों के अपमान पर सभी वर्गों में नाराजगी देखने को मिलती है।
सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने जिस तरह से राज्य सभा में राणा सांगा को गद्दार बोल दिया। ऐसे में राजपूतों के साथ ही यादवों में भी नाराजगी देखी जा रही है। अब इस तरह के बयानों का मुस्लिमों पर भी कोई असर नहीं दिखाई देता है। वे अपनी रोजी रोटी में लगे हैं। दलित और मुस्लिम दोनों ओर से लोगों को कहते सुना जाता है कि समाजवादी पार्टी विपक्ष की भूमिका सही ढंग से नहीं निभा पा रही है। यह तब है जब योगी आदित्यनाथ को यूपी में राज कर करते हुए आठ साल हो गए हैं। स्थिति यह है कि किसी जमीनी मुद्दे पर समाजवादी पार्टी ने एक भी आंदोलन प्रदेश में नहीं किया है।
अखिलेश यादव ने पार्टी को पीडीए में बांट दिया तो वह समझ रहे हैं कि पीडीए के नाम पर पिछड़ों, दलितों और मुस्लिमों का वोट उन्हें मिलेगा। ऐसा नहीं है। पीडीए उनकी पार्टी तक ही सीमित है। मतलब पीडीए के नाम पर पार्टी में बंटवारा हो चुका है।