शिकार और जंगलों की अवैध कटाई से घटी बाघों की आबादी
वन्यप्राणी सफारी में आयोजित कार्यक्रम में निदेशक एवं अन्य अतिथि
राम विलास
राजगीर। जितनी देश – प्रदेश में हरियाली और वन पर्यावरण की आवश्यकता है, उतनी ही वन्य प्राणियों का होना जरूरी है। जंगल बचेंगे तभी बाघ सहित सभी जीवजंतु सुरक्षित रहेंगे। देश में बाघों की घटती संख्या को लेकर चिंता व्यक्त किया गया। बाघ हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ रखने और उसकी विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर बाघ नहीं बचेंगे, तो पारिस्थितिक तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
पर्यटक शहर राजगीर के वन्यप्राणी सफारी ( जू सफारी) में आयोजित विश्व बाघ दिवस पर सोमवार को वक्ताओं ने यह कहा। इस अवसर पर स्कूली बच्चों के बीच हुई निबंध, पेंटिंग और क्वीज प्रतियोगिता के प्रथम, द्वितीय और तृतीय विजेता को पुरस्कृत किया गया। वन्यप्राणी सफारी के निदेशक हेमंत पाटिल ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि बाघ बचेंगे तभी सभी वन्यप्राणी और जंगल बचेंगे। आज बाघ और जंगल बचाने के लिए संकल्प लेने की जरूरत है।
उन्होंने कहा राजगीर के वन्य सफारी में चार बाघ सहित विभिन्न प्रजातियों के दो हजार वन्यप्राणी हैं। इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग को है। उन्होंने कहा कि 2008 में बाल्मीकि नगर टाइगर प्रोजेक्ट में केवल आठ बाघ थे, आज उनकी संख्या बढ़कर 54 हो गई है। यह सब जन सहयोग से हुआ है। देश में 2006 में कुल बाघों की संख्या 1411 थी। वर्तमान में यह संख्या बढ़कर 3612 हो गयी है।
निदेशक ने कहा कि बाल्मीकि नगर टाइगर प्रोजेक्ट के बाद उससे भी बड़ा कैमूर टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। बाघों की देखभाल की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक बाघ के बच्चे को रेस्क्यू कर यहां लाया गया है। दूसरे बाघ के बच्चे को आंख में कांटा चुभ गया था। उसे यहां लाकर उसका सफल इलाज किया गया है। अब वह पूरी तरह स्वास्थ्य है। उन्होंने कहा कि पेड़ काटने की जगह पेड़ लगाने का संकल्प लेंगे, तभी वन्य प्राणियों के अधिवास के लिए जंगल बच सकेंगे।
एसीएफ अरविन्द कुमार ने कहा कि 2010 में विश्व बाघ दिवस शुरू हुआ है। बाघों की संख्या निरंतर घटने पर चिंता व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा कि बाघ संरक्षण के लिये जागरुकता जरुरी है। पहले राज महाराजाओं के शिकार करने और बाद में जंगलों की अंधाधुंध कटाई से बाघ सहित अन्य वन्यप्राणी की आबादी साल दर साल घटती जा रही है। भूख और भय के कारण बाघ हिंसक और आक्रमक हो रहे हैं।
उन्होंने सभी जीव जंतुओं के महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि मेढ़क और छिपकली भी पर्यावरण के हिस्सा हैं। जिला पशुपालन पदाधिकारी डाॅ रमेश कुमार ने कहा कि मानव कृत्य के कारण वन्य प्राणियों की आबादी घट रही है। गिद्ध विलुप्त हो गया है। इसका कारण खेतों में कीटनाशक का उपयोग है। यदि समय रहते कीटनाशक और शिकार बंद नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में डायनासोर की तरह बाघ भी विलुप्त हो सकते हैं।
पशुपालन पदाधिकारी डॉ जितेंद्र दीपक ने पर्यावरण में बाघ के महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि पर्यावरण में सभी जीवों का अलग-अलग महत्व है। अतिक्रमण के कारण जंगल सिकुड़ने लगा है। जंगली जानवर गांव की ओर रुख करने लगे हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति के नियम का पालन कर वन्य प्राणियों एवं पशु पक्षियों की रक्षा की जा सकती है।
जू सफारी के पशु चिकित्सक डॉ दिलीप कुमार बैठा ने कहा कि दुनिया के केवल 13 देश में बाघ पाए जाते हैं। बाघ पर्यावरण की रक्षा करते हैं। वह जल- जंगल- जमीन की भी रक्षा करते हैं. पर्यावरण और जीवन संरक्षण के लिए बाघ का संरक्षण आवश्यक है। उन्होंने कहा प्रत्येक जीवजंतु एक दूसरे के सहयोगी हैं।
नालंदा वन प्रमंडल के एसीएफ सत्यम कुमार ने कहा कि पहले दवा और खाल के लिए बाघ का शिकार किया जाता था। शिकार के कारण ही बाघों की संख्या घटती गयी है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा बाघों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहल किया गया था।
इस अवसर पर आरओएफ राकेश कुमार, आरओएफ अरुण कुमार, शिक्षक अशोक कुमार गुप्ता एवं अन्य के द्वारा विचार व्यक्त किया गया।