भारतीय समाज में बढ़ती हिंसा: कारण, राजकीय दमन और लोकतंत्र का संकट

एस आर दारापुरी 

 

भारतीय समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति एक जटिल सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया का परिणाम है। आज हिंसा अनेक रूपों में दिखाई देती है—साम्प्रदायिक हिंसा, जातीय अत्याचार, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, माब लिंचिंग, घृणा-भाषण, राजनीतिक दमन, पुलिस अत्याचार, साइबर उत्पीड़न तथा गरीबी और वंचना से उत्पन्न संरचनात्मक हिंसा। इस समस्या को समझने के लिए केवल व्यक्तिगत अपराध या नैतिक पतन को जिम्मेदार मानना पर्याप्त नहीं है; इसके पीछे समाज और राज्य की व्यापक संरचनात्मक प्रक्रियाओं को समझना आवश्यक है।

 

1. हिंसा के सामाजिक और आर्थिक कारण

 

(क) बढ़ती आर्थिक असमानता

भारत में आर्थिक विकास तो हुआ है, किन्तु इसके साथ-साथ आर्थिक असमानता भी तेजी से बढ़ी है। एक छोटा-सा वर्ग अत्यधिक संपत्ति का मालिक बन गया है, जबकि बड़ी आबादी बेरोजगारी, महँगाई, कृषि संकट और असुरक्षा से जूझ रही है। ऐसी परिस्थितियाँ समाज में असंतोष, हताशा और आक्रोश को जन्म देती हैं।

जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ जनता की समस्याओं का समाधान करने में असफल होती हैं, तब यह आक्रोश कमजोर समुदायों के विरुद्ध साम्प्रदायिक या जातीय हिंसा के रूप में व्यक्त हो सकता है।

(ख) बेरोजगारी और युवाओं में निराशा

भारत की विशाल युवा आबादी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद सम्मानजनक रोजगार से वंचित है। बेरोजगारी और अस्थायी रोजगार की स्थिति युवाओं में असुरक्षा और असंतोष उत्पन्न करती है। ऐसे युवाओं को राजनीतिक, धार्मिक या जातीय संगठन आसानी से हिंसक अभियानों में शामिल कर लेते हैं।

(ग) सामाजिक संबंधों का विघटन

तेजी से बढ़ते शहरीकरण, प्रवासन और पारंपरिक सामुदायिक संरचनाओं के कमजोर होने से समाज में आपसी संवाद और सामूहिकता कम हुई है। सोशल मीडिया ने प्रत्यक्ष मानवीय संबंधों की जगह ले ली है, जिसके कारण अफवाहें, नफ़रत और सामाजिक ध्रुवीकरण तेजी से फैलता है।

(घ) पितृसत्ता और जाति व्यवस्था

भारत में हिंसा का गहरा संबंध सामाजिक पदानुक्रम से है। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा प्रायः प्रभुत्वशाली वर्गों द्वारा अपने सामाजिक वर्चस्व को बनाए रखने का माध्यम होती है। आनर किलिंग, जातीय अत्याचार और साम्प्रदायिक हमले केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नियंत्रण के उपकरण भी हैं।

 

2. राजनीतिक कारण

 

(क) साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण

चुनावी राजनीति में धार्मिक पहचान के बढ़ते उपयोग ने सामाजिक तनाव को गहरा किया है। जब राजनीतिक शक्तियाँ अल्पसंख्यकों को “राष्ट्र”, “संस्कृति” या “सुरक्षा” के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत करती हैं, तब समाज में घृणा और अविश्वास बढ़ता है। इससे हिंसा को वैधता मिलने लगती है।

(ख) घृणा-भाषण का सामान्यीकरण

टीवी चैनलों, सोशल मीडिया और राजनीतिक भाषणों में आक्रामकता और घृणा की भाषा लगातार बढ़ी है। जब सार्वजनिक जीवन में नफरत फैलाने वाले वक्तव्यों पर कार्रवाई नहीं होती, तब समाज में यह संदेश जाता है कि हिंसक व्यवहार स्वीकार्य है।

(ग) लोकतांत्रिक संस्थाओं का कमजोर होना

न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, विश्वविद्यालय, नागरिक समाज और संवैधानिक संस्थाएँ लोकतंत्र की सुरक्षा करती हैं। यदि ये संस्थाएँ कमजोर या राजनीतिक रूप से नियंत्रित हो जाएँ, तो दण्डमुक्ति (impunity) बढ़ती है और हिंसा को रोकने की क्षमता घटती है।

जब जनता का कानून और न्याय व्यवस्था पर विश्वास कम होता है, तब भीड़तंत्र और प्रतिशोधात्मक हिंसा बढ़ सकती है।

3. क्या राज्य दमन और निरंकुश प्रवृत्तियाँ भी हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं?

हाँ, अनेक विद्वानों और मानवाधिकार संगठनों का मत है कि राज्य दमन और अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ समाज में हिंसा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

(क) राज्य की दमनकारी शक्ति

आधुनिक राज्य के पास पुलिस, सेना, निगरानी तंत्र और कठोर कानूनों के रूप में व्यापक दमनकारी शक्ति होती है। जब इन शक्तियों का प्रयोग असमान, पक्षपातपूर्ण या अत्यधिक रूप में किया जाता है, तब समाज में भय और असंतोष बढ़ता है।

इसके उदाहरण हैं:

हिरासत में यातना, फर्जी मुठभेड़, मनमानी गिरफ्तारियाँ, असहमति रखने वालों पर कठोर कानूनों का प्रयोग, शांतिपूर्ण आंदोलनों का दमन, इंटरनेट बंदी एवं पुलिस बल का अत्यधिक प्रयोग।

ऐसी परिस्थितियों में समाज भी हिंसा को सामान्य मानने लगता है।

(ख) कानून के राज का क्षरण

यदि जनता को यह महसूस हो कि कानून का प्रयोग चुनिंदा लोगों के विरुद्ध किया जा रहा है, जबकि सत्ता से जुड़े लोगों को संरक्षण मिलता है, तो संविधान और न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है। इससे लोग यह मानने लगते हैं कि न्याय का आधार कानून नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति है।

(ग) अधिनायकवादी राजनीतिक संस्कृति

जब राजनीतिक संस्कृति में अंध-राष्ट्रवाद, नेता-पूजा और असहमति को “राष्ट्र-विरोध” या “धर्म-विरोध” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। इससे समाज में असहिष्णुता और आक्रामकता बढ़ती है।

(घ) राजनीति का अपराधीकरण और सैन्यीकरण

यदि राजनीतिक दल विरोधियों को दबाने के लिए हिंसा, धमकी, पुलिस शक्ति या गैर-कानूनी समूहों का उपयोग करते हैं, तो धीरे-धीरे राजनीति में हिंसा संस्थागत रूप ले लेती है। समाज भी यह मानने लगता है कि विवादों का समाधान संवाद नहीं, बल्कि शक्ति और बल से होता है।

 

4. संरचनात्मक हिंसा की अवधारणा

 

Johan Galtung ने प्रत्यक्ष हिंसा और संरचनात्मक हिंसा के बीच अंतर किया था। संरचनात्मक हिंसा वह स्थिति है जिसमें सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाएँ लोगों को समान अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित करती हैं।

भारत में जाति, वर्ग, लिंग और धर्म पर आधारित असमानताएँ ऐसी संरचनात्मक हिंसा को जन्म देती हैं, जो आगे चलकर प्रत्यक्ष हिंसा का रूप धारण कर सकती है।

इसी प्रकार B. R. Ambedkar ने चेतावनी दी थी कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। यदि समाज में गहरी असमानता बनी रहती है, तो हिंसा और तनाव बढ़ना स्वाभाविक है।

 

5. मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका

 

सोशल मीडिया ने अफवाहों, फर्जी खबरों और घृणा-प्रचार को अत्यंत तेज़ बना दिया है। कई बार झूठी सूचनाएँ कुछ ही घंटों में भीड़ हिंसा को जन्म दे देती हैं। टीवी मीडिया का एक हिस्सा भी सनसनीखेज और ध्रुवीकरणकारी बहसों के माध्यम से सामाजिक विभाजन को गहरा करता है।

 

6. मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहलू

 

लगातार असुरक्षा, आक्रामक राजनीतिक भाषा और उपभोक्तावादी प्रतिस्पर्धा समाज में तनाव और क्रोध को बढ़ाती है। जब समाज में:

आक्रामकता का महिमामंडन होने लगे, सहानुभूति कम हो जाए, असहमति को देशद्रोह माना जाए एवं हिंसक व्यवहार पर कठोर दंड न मिले।

तब हिंसा धीरे-धीरे सामान्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन जाती है।

 

7. सकारात्मक पक्ष

 

फिर भी भारत की स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। आज भी देश में:

स्वतंत्र न्यायपालिका, संवैधानिक अधिकार, नागरिक अधिकार आंदोलन, मानवाधिकार संगठन, स्वतंत्र पत्रकार, छात्र आंदोलन, श्रमिक संघर्ष और लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया

मौजूद हैं, जो लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

 

निष्कर्ष

 

भारतीय समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। इसके पीछे आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, जातीय और साम्प्रदायिक तनाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण, संस्थागत कमजोरी, मीडिया की भूमिका और सामाजिक असुरक्षा जैसे अनेक कारण कार्य कर रहे हैं।

राज्य दमन और अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ भी हिंसा को बढ़ाने में योगदान दे सकती हैं, विशेषकर तब जब सत्ता का प्रयोग पक्षपातपूर्ण ढंग से हो, असहमति को दबाया जाए और संवैधानिक संस्थाएँ कमजोर हों। ऐसी स्थिति में समाज में भी हिंसा और असहिष्णुता सामान्य होती जाती है।

दीर्घकालिक समाधान केवल कठोर पुलिस व्यवस्था में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती तथा संवाद और सहिष्णुता की संस्कृति के विकास में निहित है। जैसा कि B. R. Ambedkar ने कहा था, लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि “सह-अस्तित्व और बंधुत्व पर आधारित जीवन-पद्धति” है।

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