प्रेम कुमार मणि
इन दिनों हिन्दू धर्माधिकारियों की टीम हिन्दू या हिंदुत्व की जगह सनातन शब्द का अधिक प्रयोग करती दिख रही है. मैं नहीं जानता इसके निहितार्थ क्या हैं. क्या अब वे भारत को हिन्दू राष्ट्र की जगह सनातन राष्ट्र बनाना चाहेंगे. या फिर जैसे बिजनस में कभी-कभार नाम बिनाका की जगह सिबाका करने जैसा कुछ प्रपंच है. अनुमान है कि इस शब्द के द्वारा वे अपनी अधिक प्राचीनता का दावा पेश कर रहे हैं.या फिर उनकी बौद्धिक टीम वैदिक भारत जैसा कोई सनातन भारत का स्वप्न देखने लगी है. संभव है यह हिंदुत्व के फलसफे का अगला चरण हो, अथवा सावरकरवाद का एक विकास. यह भी संभव है यह कुछ भी नहीं, केवल एक नया शिगूफा हो. लेकिन कुछ भी हो हमें इस पर विचार करना ही चाहिए. यह हमें कुछ सोचने का अवसर भी तो देता है.
मेरी जानकारी के अनुसार हिन्दू शब्द भारत में अरबों और तुर्कों के आक्रमण के बाद व्यवहार किया जाने लगा. उसके पूर्व भी भारतखण्ड में कई सम्प्रदायों के लोग रहते थे और उनके आध्यात्मिक विचार और उपासना विधियां अलग-अलग हुआ करती थीं. बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णव, आजीवक जैसे जाने कितने मत-मतान्तर थे. इनके बीच सौहार्द ही था, ऐसा भी नहीं है. वे आपस में अपनी मान्यताओं को लेकर लड़ते-झगड़ते भी थे. बौद्ध और वेदान्तिक या फिर शैव और वैष्णवों के बीच वैचारिक मतभेद कभी-कभार उग्र और हिंसक हो जाते थे. इनकी अलग कहानी है, जिसमें उलझना विषयांतर होना होगा.
लेकिन उपरोक्त संप्रदायों के बीच कभी सनातन संप्रदाय का प्रसंग नहीं आता है. प्राचीन भारतीय इतिहास में सिंधु सभ्यता का दौर, झूकर संस्कृति, प्राक और उत्तर वैदिक काल, उपनिषद काल, बौद्ध प्रभाव-काल आदि सांस्कृतिक महत्त्व के दौर आते हैं,किन्तु कभी सनातन काल रहा हो, यह नहीं हुआ है. जनपदीय दौर में पश्चिमोत्तर इलाके में वैदिक ब्राह्मण संस्कृति का प्रभाव दीखता है और पूरब के इलाके में जहाँ मगध, वज्जि, अंग या फिर इससे तनिक पश्चिम के कोसल आदि में, और इन से उत्तर के मल्ल, कोलिय,मौर्य, शाक्य आदि गणों में श्रमण संस्कृति का अधिक प्रभाव था. बुद्ध और महावीर श्रमण परंपरा के ही थे. यह परंपरा पहले से चली आ रही थी. अशोक मौर्य के स्तम्भ इतिहास के बेहतर स्रोत हैं . इन्हें आधार बनाया जाय तो उसके जमाने तक सनातन नाम से कोई संप्रदाय या समुदाय नहीं था. वहाँ बम्मन -श्रमनम यानि ब्राह्मण और श्रमण की चर्चा है और अशोक दोनों समुदायों को समान भाव से देखने का आश्वासन देते हैं. बाद के समय में ब्राह्मणों और श्रमनों के बीच सांप-नेवले जैसे संघर्ष की चर्चा भी मिलती है. शैवों और वैष्णवों के बीच भी खूब संघर्ष हुए. लेकिन एक धर्म या विचार समुदाय के तौर पर सनातन इस जमाने में ही आया है. यदि यह शब्द इस अर्थ में कहीं होता तब स्वामी दयानन्द जी को आर्य समाज की स्थापना नहीं करनी पड़ती. वह सनातन समाज बनाने की सोचते.
अरब, तुर्क और मंगोल आए तब उनलोगों ने इन समस्त लोगों को जो एक निश्चित भूभाग, जिसे वे अल-हिन्द या हिन्द कहते थे, पर रहने वालों को हिन्दू कहना आरम्भ किया, जैसे यूरोप के लोगों ने भारत आने पर यहाँ के लोगों को इंडियन कहना आरम्भ किया. तो हिन्दू में बौद्ध, जैन, शैव , वैष्णव, वेदान्तिक, आजीवक सब थे. सरना या श्रमण परंपरा के आदिवासी जन भी थे. इसी तरह इंडियन में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, पारसी सब थे. इस तरह हिन्दू और इंडियन शब्द विदेशियों द्वारा अपनाया गया है. नाम हमेशा दूसरे लोग ही तय करते हैं.
संभवतः यही कारण है कि व्याकुल हिन्दुत्ववादियों को यह अनुभव हुआ हो कि हिन्दू शब्द में कुछ न कुछ विदेशी है अतएव इसकी जगह सनातन अधिक उपयुक्त है क्योंकि यह देशी शब्द है.
लेकिन सनातन मतलब क्या ?
सनातन का अर्थ है परंपरा से चला आने वाला. इसका प्रयोग यहाँ के कारीगर और किसान लोग अपनी जीवन शैली केलिए प्रयोग करते रहे हैं. वह स्वयं को प्रायः सनातनी कहते रहे हैं. जैसे आदिवासी जन स्वयं को सरना कहते आए हैं. यह उस हिन्दू से पृथक अर्थ में है, जिसे सावरकर रेखांकित करते हैं और फलसफे का रूप देते हैं. किसी सनातनी को राम, कृष्ण जैसे अवतारों से कुछ भी लेना देना नहीं. वे बस ग्रामदेवता की पूजा कर लेते हैं. उनका किसी धर्मग्रन्थ से भी कोई वास्ता नहीं. भारतीय हिन्दू परिवार की अधिकांश स्त्रियां सनातनी विश्वास की होती रही हैं. नाग,वृक्ष,नदी, जलगाह और स्थानीय देवियों की पूजा करके अपनी आध्यात्मिक संतुष्टि हासिल कर लेती हैं. किसी धर्मग्रन्थ से उनका कोई संबंध नहीं होता.
शास्त्रीय बौद्धिक परंपरा में सनातन शब्द प्रायः प्राचीनतम के अर्थ में प्रयुक्त होता आया है. लेकिन यह सब इसके शब्दकोशीय अर्थ हैं. सनातन का वास्तविक और बहुत हद तक व्यावहारिक अर्थ प्रकृत है. हिन्दू धर्मग्रंथों में इसका यही अर्थ है. प्रकृत और सर्वस्वीकृत. जैसे ब्राह्मण, बौद्ध और जैन ग्रंथों में एषा धम्मो सनातनः जब कहा गया है तो इसका अर्थ है परंपरा से चले आ रहे सर्वस्वीकृत प्रकृत सिद्धांत या विचार से ही है.
सनातन अथवा प्रकृत ज्ञान सभी प्राणियों और वनस्पतियों में होते हैं. गुलाब और जूही अपने तय अंदाज में खिलते हैं. जानवर भी अपने सनातन ज्ञान और धर्म से परिपूर्ण होते हैं. बिना किसी प्रशिक्षण के भोजन, उत्सर्जन, प्रजनन आदि कार्य वे करते ही हैं. शत्रुओं से यथासंभव रक्षा के उपाय भी वे जानते हैं. ऐसे में हमारे धर्म-नियामकों ने चिह्नित किया कि मनुष्य के धर्म या धम्म क्या हैं या होने चाहिए. मनुष्य को जानवरों से अलग दिखना ही चाहिए क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. प्रकृति के कतिपय नियमों को अपने सामजिक अर्थात मानव समाज द्वारा स्वीकृत नियमों के अधीन रखना होगा. यही सामाजिकन्याय भी है. प्रकृति के नियम मानव समाज पर उसी तरह नहीं लागू होंगे जैसे जानवरों के बीच होते हैं. उन्मुक्त सेक्स अथवा जिसकी लाठी उसकी भैस (कमजोरों पर बलवानों का दबदबा)का सिद्धांत नहीं चलना चाहिए. एक नैतिकता विकसित करनी होगी. यही नियंत्रण एक अनुशासन लाता है. धर्म का काम यही है. कोई भी धर्म-उद्घोषक अपने देसकाल और परिस्थितियों के आधार पर जो है और जो होना चाहिए के बीच एक सेतु बनाने की कोशिश करता है. हमारे देश में भी बार-बार यही हुआ है. बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक सबने यही किया है. पुराने समय में अपनी स्मृति में मनु ने धर्म की एक व्याख्या की है:
धृति: क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणं .
यानी, धैर्य ,क्षमा , वासनाओं पर नियंत्रण, अचौर्य अथवा चोरी न करना , पवित्रता, इन्द्रियों पर नियंत्रण, विवेक, सच्चाई और अक्रोध मनुष्य में धर्म के लक्षण हैं.
यहाँ कोई उपासना विधि या दैवी सिद्धांत या कोई पुरोहितवाद नहीं है. उपरोक्त दस लक्षण मनुष्य होने के हैं. इसे धारण करना उसका धार्मिक होना है.
महाभारत, रामायण और बुद्ध के धम्मपद में भी सनातन प्रसंग आते हैं. स्मरण आता है कहीं जैन वांग्मय में भी है. लेकिन अभी ठीक से स्मरण नहीं हो रहा. महाभारत और रामायण में एक-एक जगह एषा धर्म सनातनः के साथ प्रसंग आते हैं.
महाभारत का प्रसंग देखिये :
अकृत्यं नैव कृत्यं स्यात प्राणत्यागेप्युपस्थिते
न च कृत्यें परित्याजम एषम् धर्मः सनातनः
( प्राणों की बाजी लगा कर भी जो करणीय है उसे करना और जो नहीं करने योग्य है उसे न करना धर्म के सनातन लक्षण हैं.)
रामायण का प्रसंग :
सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यं अप्रियम
प्रियं च ना नृतं ब्रूयात एष धर्मः सनातन .
( सच बोलिए , प्रिय बोलिए, अप्रिय सच भी मत बोलिए. प्रिय किन्तु न बोलने लायक असत्य भी मत बोलिए. यह धर्म सनातन है. )
बौद्धों के धम्मपद का प्रसंग जो यमक वग्ग में है :
न हि वेरेना वेरानि सम्मततीध कुदाचत्मं
अवेरेन च सम्प्रति, एसो धम्मो सनातनो
(वैर से वैर कभी शांत नहीं होता, अवैर से ही होता है . यह सनातन धम्म है.)
सनातन का मतलब उपरोक्त है न कि हिन्दुत्ववादियों द्वारा प्रस्तुत अर्थ. जिस धर्म को वह सनातन बता रहे हैं वह दरअसल ब्राह्मण धर्म को सनातन बता रहे है. हालांकि हिन्दू ब्राह्मण धर्म भी कोई रूढ या जड़ धर्म नहीं है. इसके मूल में प्रणव की अवधारणा है. वहाँ ईश्वर को प्रणव कहा गया है. सनातन नहीं. प्र ण व अर्थात नित-नया. जो हर क्षण नवीन हो रहा हो. इस प्रणवता को सनातनता के कचरे से ढकना कितनी होशियारी है यह देखना होगा.
हर धर्म, हर संस्था, हर समाज में निरंतर सुधार और परिष्कार होते रहना चाहिए. इसके अभाव में धर्म, समाज और संस्थायें जड़ हो जाती हैं, मर जाती हैं. सनातनता को ज़िद के साथ ग्रहण करना हमारी चेतना को अतीतजीवी बना सकता है. हमें अतीत में नहीं, भविष्य में जाना है.








