साथियों, जिस तरह से 20सदी में फासिस्ट ताकतों ने यूरोप के दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्रों पर कब्जा जमाने के लिए जनसंख्या के किसी एक खासवर्ग के खिलाफ अराजकता, अतिराष्ट्रवाद, तानाशाही, विपक्ष को ख़त्म करने प्रयास, जैसी दमनकारी हथकंडे अपनाये थे| कमोबेश भारत में भी आज वही हालात दिख रहे हैं सरकारी दमन अपने चरम पर है| लोकतंत्र फासीवाद का शिकार बनता जा रहा है स्टेट ताकतवर बनता जा रहा है और जन विरोध की कमर टूट रही है| हाल की घटनाएं इस ओर साफ़ इशारा कर रही हैं –
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में ईद त्यौहार से एक दिन पुर्व स्थानीय पुलिस ने मस्जिद के इमाम सहित 23 लोगों के खिलाफ इसलिए मुकदमा दर्ज कर दिया क्योकि उन्हौने अलविदा की नमाज के दौरान वक्फ संसोधन बिल के विरोध में काली पट्टी बांधकर नमाज पढ़ी थी |
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के कासिम नगर में होली के दौरान हिन्दू वर्ग के कुछ शरारती तत्वों ने एक मुस्लिम व्यक्ति को जबरदस्ती रंग लगाने का प्रयास किया और उसके मार- पीट की जिसके कारण उसकी मौत हो गयी थी लेकिन स्थानीय पुलिस ने पीड़ित परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ इसलिए मुकदमा लिख दिया क्योकि वो शवयात्रा ले जाते वक्त कलमा पढ़ रहे थे |
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में भारतीय प्रोधिगिकी सस्न्थान (आई आई टी) ने 32 परिवारों के घरों को इसलिए उजाड़ दिया क्योकि वो दलित वर्ग के थे और धोबी का कार्य करते थे| स्थानीय पुलिस द्वारा पीड़ित पक्ष को ही डराया-धमकाया एवं उनके खिलाफ मुकदमा लिखने की धमकी दी जिससे कि वो आईआईटी प्रशासन के खिलाफ कोर्ट न जा पाए |
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के शंकरगढ़ी गाँव में सामाजिक कार्यकर्त्ता देवकी नंदन शर्मा अपनी ग्राम पंचायत में भृष्टाचार के मामलों की जांच के लिए 4 माह तक भूख हड़ताल पर रहे और भूख हड़ताल के दौरान ही उनकी मौत भी हो गयी पर जिला प्रशासन ने जरा सी भी संवेदना नहीं दिखाई और न ही आज तक उनके मामले में कोई ध्यान दिया गया है|
जवाहर लाल नेहरु विश्विधालय के छात्र कार्यकर्त्ता उमर खालिद पिछले 5 वर्षों से बिना किसी सुनवाई के जेल में हैं,पत्रकार मुहम्मद जुबैर को बिना किसी अपराध के जेल की सजा काटनी पड़ी, लेखक गौतम नवलखा जैसे कई लेखक, विचारक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को सालों से जेल में रखा गया है क्योकि वो लोकतंत्र के पक्षधर हैं|
इधर सुप्रीम कोर्ट ने भी विपक्षी नेताओं के खिलाफ सरकारी लठैत की तरह काम कर रहे प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी को बिना आरोप बताए किसी के भी घर छापा मारने और उसे गिरफ्तार करने के अधिकार की पुष्टि कर दी है। विपक्ष का आरोप है कि ईडी धन शोधन के मामलों की जाँच करने की जगह अपने दमनकारी अधिकारों का उपयोग विपक्षी सरकारों को ध्वस्त करने और असहमत आवाज़ों को चुप करने के लिए कर रही है।
अदालतें अब स्वतंत्र नहीं हैं, पुलिस सत्तारूढ़ पार्टी के इशारे पर काम करती है, कुछ सशस्त्र बल के जवान राजनीतिक रूप से सत्तारूढ़ पार्टी का समर्थन करते दिखते हैं, और संविधान के साथ असंगत कानून पारित करने के लिए संसदीय बहुमत का दुरुपयोग किया जा रहा है – लेकिन जब अदालतों पर कब्ज़ा कर लिया गया है, तो कौन ऐसा कह सकता है? आप सरकार के खिलाफ प्रदर्शन नहीं कर सकते हो, आप लोकतंत्र के पक्ष में कुछ लिख नहीं सकते हो DPDP नामक एक नया दमनकारी कानून लाया जा रहा है जिससे कि पत्रकारों-लेखकों की आवाज को दबाया जा सके, सूचना अधिकार कानून को निष्क्रिय करने का प्रयास किया जा रहा है|
तो ऐसे में क्या लगता है आपको सिर्फ मुस्लिम समुदाय ही इनके निशाने पर है, आप इस मुगालते में मत रहिये कि सिर्फ मुस्लिम इनका टारगेट हैं अगला नंबर हर उस समुदाय या शख्स का है जो सरकार के मंसूबों के खिलाफ बोलने की हिम्मत करेगा वो फासीवाद का शिकार बनेगा |
केएम भाई