याराना पूंजीवाद की पराकाष्ठा

संदीप पांडेय 
पिछले पांच वर्षों में विभिन्न कंपनियों द्वारा बैंकों से रु. 10,09,510 करोड़ का जो ऋण लिया गया वह माफ कर दिया गया है। इसे बैंक की भ्रमित करने वाली भाषा में नॉन परफार्मिंग एसेट (अनुपयोगी सम्पत्ति) कहा जाता है। सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया ने ही अकेले रु. 2,04,486 करोड़ का कर्ज माफ किया है। कुल माफ की गई राशि का 13 प्रतिशत ही वसूला जा सकता है।

ऋण माफी का लाभ प्राप्त करने वाली कंपनियों का नाम उजागर नहीं किया जाता। जबकि यदि कोई किसान ऋण लेता है और अदा नहीं कर पाता तो उसका नाम तहसील की दीवार पर लिखा जा सकता है और उसे तहसील में 14 दिनों की हिरासत में भी रखा जा सकता है, जो अवधि बढ़ाई भी जा सकती है। बड़े पूंजीपति बैंकों का पैसा लेकर देश से पलायन कर जाते हैं। उनके भागने की आशंका होते हुए भी सरकार उनका पासपोर्ट कभी नहीं जब्त करती जैसे वह शासक दल से अलग राय रखने वाले उन बुद्धिजीवियों का कर लेती है जिनके खिलाफ फर्जी मुकदमे भी दर्ज हो जाते हैं।

अब राजनीतिक दलों को चुनावी बांड के माध्यम से चंदा देने वाला मामला देखा जाए। चंदा देने वाले का नाम लाभार्थी राजनीतिक दल को चुनाव आयोग व आयकर विभाग को बताने की जरूरत नहीं है। 2018 में जब से चुनावी बांड योजना शुरू हुई तब से वित्तीय वर्ष 2020-21 के अंत तक भारतीय जनता पार्टी को रु. 4,028 करोड़ रु. चुनावी बांड में चंदे के रूप में मिले जो उसे मिले कुल चंदे का 63 प्रतिशत है और अज्ञात मिले चंदे का 92 प्रतिशत है। इस दौर में कांग्रेस पार्टी को रु.731 करोड़ चुनावी बांड से चंदा मिला, जिससे इस बात का अंदाजा लगता है कि कांग्रेस खुलकर चुनावी बांड योजना का विरोध क्यों नहीं कर रही।

अभी तक रु. 10,791.47 करोड़ के चुनावी बांड खरीदे गए हैं। 2020-21 के अंत तक सभी राष्ट्रीय दलों को चुनावी बांड से मिले चंदे का 80 प्रतिशत चंदा भाजपा को मिला और सभी राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दलों को मिलाकर मिले चंदे का 65 प्रतिशत भाजपा को मिला। जाहिर है कि भाजपा चुनावी बांड योजना की सबसे बड़ी लाभार्थी है और उसके कुल चंदे का लगभग दो तिहाई अब चुनावी बांड के माध्यम से आ रहा है।

क्या कंपनियों का जो ऋण माफ किया जा रहा है उनके नाम गोपनीय रखने व जो कंपनियां चुनावी बांड के माध्यम से चंदा दे रही हैं उनके नाम गोपनीय रखने में कोई संबंध है?
सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त एक जवाब से यह मालूम हुआ है कि चुनावी बांड के माध्यम से जो चंदा दिया गया है उसमें से 93.67 प्रतिशत चंदा रु. 1 करोड़ के बांड, जो सबसे बड़ा बांड है, में खरीदा गया है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चुनावी बांड के माध्यम से ज्यादातर बड़ी कंपनियां, जिनमें कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी हो सकती हैं, चंदा दे रही हैं जो इस देश में आम लोगों की दृष्टि से नीति निर्माण और लोकतंत्र के हित में नहीं है।

शक इसलिए भी पैदा होता है कि 2018 से, जब से चुनावी बांड की योजना लागू हुई है, कंपनियां जो पहले अपने पिछले तीन साल के औसत मुनाफे का 7.5 प्रतिशत तक ही चुनावी चंदा दे सकती थीं अब उनके लिए कोई पाबंदी नहीं है। यानी अब कोई घाटे में चल रही कम्पनी भी चुनावी बांड से चंदा दे सकती है। जिन कंपनियों का ऋण माफ किया जा रहा है वे तो शायद घाटे में ही हैं, इसीलिए ऋण अदा नहीं कर पा रही हैं।

क्या यह सम्भव है कि कुछ कंपनियां बैंकों से ऋण लेकर चुनावी बांड के माध्यम से चंदा दे रही हों और अपना ऋण माफ करा ले रही हों?
हमें इस बारे में पता ही नहीं चलेगा क्योंकि पूरी व्यवस्था अपारदर्शी है जिसे सूचना अधिकार के दायरे से भी बाहर रखा गया है। चुनावी बांड से चंदा देने व ऋण माफी की व्यवस्थाएं गोपनीय रखना सूचना अधिकार अधिनियम की भावना के ही खिलाफ है जिसने शासन-प्रशासन के कार्य में 2005 से एक पारदर्शिता लाने की कोशिश की है। बिना सूचना के अधिकार की मदद के कारपोरेट-निजी कंपनियों की मिलीभगत को उजागर नहीं किया जा सकता। लेकिन भाजपा सरकार ने एक और जन-विरोधी जो काम किया है वह सूचना के अधिकार अधिनियम को 2019 में एक संशोधन के माध्यम से कमजोर किया है। अन्यथा यूपीए की सरकार मेें केंद्रीय सूचना आयोग ने सभी राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों को अपने चंदे की जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश पारित कर दिया था।

तमाम गोपनीयताओं के बावजूद यह जगजाहिर है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के सबसे बड़े लाभार्थी गौतम अडानी हैं। नरेन्द्र मोदी उनसे अपने संबंध छुपाने की कोशिश भी नहीं करते। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री होते हुए प्रधानमंत्री की शपथ लेने नई दिल्ली आए तो अडाणी के हवाई जहाज से आए। मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले जिन गौतम अडाणी को गुजरात से बाहर शायद ही कोई जानता हो आज दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं।
पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री की तस्वीर निजी कंपनियों जैसे जिओ व पेटीएम के विज्ञापनों में दिखाई दी। नरेन्द्र मोदी 2014 में मुकेश अंबानी के निजी अस्पताल का उद्घाटन करने गए। संघीय सरकार ने दो चुनी हुई कहानियों अडार पूनावाला की सीरम व भारत बायोटेक को कोरोना का टीका बनाने के नाम पर क्रमशः रु. 3,000 व रु.1,500 करोड़ रुपए अनुदान दिए। प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता, जिसका मुख्यालय लंदन में है, के मालिक अनिल अग्रवाल भी साथ जाते हैं। सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि किन कंपनियों ने चुनावी बांड के माध्यम से भाजपा को चंदा दिया होगा।

नरेन्द्र मोदी अपने आप को एक फकीर के रूप में प्रस्तुत करते हैं किंतु उनका रहन सहन काफी खर्चीला दिखाई देता है। लोग देख रहे हैं कि कैसे वे एक ही दिन में कई बार अपनी पोशाक बदलते हैं। हरेक पोशाक काफी महंगी होती है। उन्होंने 2015 में जो कोट पहना था, जिसपर उनका नाम कई बार लिखा था, को नीलामी में रु. 1.21 करोड़ रुपए में खरीदा गया। वे अपने आप को डॉ. मनमोहन सिंह की तरह ईमानदार बता सकते हैं क्योंकि शायद उनके भी खाते में अधिक पैसा न होगा लेकिन जो आरोप मनमोहन सिंह पर नहीं लग सकता वह यह है कि हम कैसे मान लें कि गौतम अडाणी ने जो सम्पत्ति बनाई है वह बेनामी नहीं है?

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