18 मई 1838 को भारत से पहली बार आमों की टोकरी इंग्लैंड की रानी को भेजी गई थी। अभी आम का मौसम चल रहा है । कोकण के आम दुनिया पर राज करते हैं—और इसका श्रेय जाता है फ्रामजी कावसजी बनाजी को। आज मुंबई में IT हब पूछा जाए तो पवई हिरानंदानी गार्डन का नाम आता है—ऊंची इमारतें, सॉफ्टवेयर कंपनियाँ और IIT के कारण यह नॉलेज सिटी बन चुका है। लेकिन कभी यह इलाका घना जंगल था। 1799 में अंग्रेजों ने मुंबई के कुछ हिस्सों को विकसित किया, लेकिन परेल से सायन तक का क्षेत्र पिछड़ा था। इसे लीज पर दिया जाता था।
पवई एक ब्रिटिश डॉक्टर स्कॉट को ₹3200 में दिया गया। उनके जाने के बाद यह भूमि खाली पड़ी रही। 1829 में फ्रामजी कावसजी बनाजी ने इसे लीज पर लिया। कलेक्टर जॉर्ज गिल्बर्ट ने कई शर्तें रखीं—पानी की व्यवस्था, खेती, जंगल साफ करना आदि। फ्रामजी ने यह सब किया और आसपास के क्षेत्रों जैसे साकीनाका, चांदिवली, विक्रोली को भी विकसित किया। उन्होंने 3500 एकड़ में एक लाख आम के पेड़ लगाए। तीन साल में यह “बॉम्बे मैंगो” के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
उन्होंने आमों को एक टोकरी में पैक कर जहाज के जरिए रानी Queen Victoria को भेजा। 18 मई 1838 को पहला आम निर्यात हुआ। रानी को आम बहुत पसंद आए और इसके बाद भारतीय आमों को वैश्विक बाजार मिला। फ्रामजी ने रेशम उत्पादन, गन्ना, चीनी मिल और शराब निर्माण भी शुरू किया। बाद में उन्होंने समाज सेवा की ओर ध्यान दिया। उन्होंने गिरगांव में पहली पाइपलाइन लगाई और साफ पानी की व्यवस्था की।
उन्होंने ₹30,000 खर्च किए (जो आज अरबों के बराबर है) और मुंबई में गैस लाइटिंग भी शुरू की। आज मुंबई के विकास का श्रेय अंग्रेजों को दिया जाता है, लेकिन फ्रामजी कावसजी बनाजी जैसे भारतीयों का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनकी याद में धोबी तालाब क्षेत्र में उनका नाम दिया गया है।








