इक प्रेम ऐसा भी…मेरे डैडी जैसा

ऊषा शुक्ला

“मैंने माँ खोई थी, और पापा ने अपनी दुनिया…”
ये सिर्फ़ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक पूरा जीवन है—एक ऐसी कहानी, जो शब्दों में बयां तो हो सकती है, पर पूरी तरह महसूस वही कर सकता है, जिसने ऐसे प्रेम को जीया हो या देखा हो। प्रेम… हम सबके जीवन का सबसे सुंदर, सबसे गहरा और सबसे रहस्यमयी भाव। लेकिन क्या हर प्रेम एक जैसा होता है? क्या हर रिश्ता समय के साथ बदल जाता है? या कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो समय, दूरी और मृत्यु की सीमाओं से भी परे चले जाते हैं?
यह कहानी है ऐसे ही एक प्रेम की—इक प्रेम ऐसा भी, जो सिर्फ़ साथ जीने तक सीमित नहीं था, बल्कि बिछड़ने के बाद भी उतनी ही शिद्दत से जिया गया। अक्सर देखा गया है वृद्धावस्था में पति पत्नी में ख़त्म होता था मेरे डैडी का प्रेम बढ़ गया। मम्मी के प्रति उनका सम्मान और अधिक बढ़ गया।
एक साथ की शुरुआत—माँ और पापा का रिश्ता सिर्फ़ पति-पत्नी का नहीं था—वो एक-दूसरे की आदत थे, एक-दूसरे की ज़रूरत थे, एक-दूसरे का संबल थे। माँ का हर काम पापा से जुड़ा होता था—चाय बनाना हो या दवा देना, बाहर जाना हो या घर में रहना—हर जगह पापा उनके साथ होते थे। और पापा… वो तो जैसे माँ के बिना अधूरे ही थे। मुझे याद नहीं है की कभी मेरी मम्मी अकेली बाज़ार गई हो।
उनके बीच कोई दिखावटी प्रेम नहीं था—न बड़े-बड़े वादे, न फ़िल्मी अंदाज़—बस एक सादगी थी, एक गहराई थी, जो हर छोटी बात में झलकती थी।
जब माँ पापा को देखती थीं, तो उनकी आँखों में एक अजीब सी शांति होती थी। और जब पापा माँ को पुकारते थे, तो उस आवाज़ में अपनापन ही नहीं, एक पूरा जीवन समाया होता था। दोनों हर निर्णय एक साथ बैठ कर लेते थे। वो एक दिन… जिसने सब बदल दिया-ज़िंदगी हमेशा एक सी नहीं रहती। एक दिन ऐसा आया, जब माँ चुपचाप चली गईं—बिना कुछ कहे, बिना अलविदा कहे। पूरा घर ही क्या सब लोग हिल गए ।
उनके जाने के बाद घर वही था, लोग वही थे, चीज़ें वही थीं—पर कुछ भी वैसा नहीं रहा। मेरे लिए वो एक गहरा दुख था… पर पापा के लिए—वो सब कुछ खो देना था।
मैंने माँ को खोया था, पर पापा ने अपना अस्तित्व खो दिया था।
रुक गया समय—जहाँ मैं धीरे-धीरे अपने जीवन में आगे बढ़ने लगी—पति का सहारा था, बच्चों की हँसी थी—वहीं पापा उसी जगह रुक गए। वो हर दिन उसी तरह जीते थे, जैसे माँ अभी भी उनके साथ हों। उनकी कुर्सी वही, उनका कप वही, उनकी बातें वही—सब कुछ वैसा ही। मकान भी ।पर फर्क बस इतना था कि अब माँ वहाँ नहीं थीं। फिर भी… पापा ने इस सच्चाई को स्वीकार नहीं किया। हम सब ने पापा को अजीब सा गुमसुम सा देखा।
एक अनोखा निर्णय— शायद कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि उन्हें खोना संभव ही नहीं होता। पापा ने माँ का एक पुतला बनवाया। किसी और के लिए यह अजीब हो सकता था, पर पापा के लिए वह सिर्फ़ एक मूर्ति नहीं थी—वो उनका जीवन थी, उनकी साथी थी, उनका सहारा थी। वो उस पुतले से बात करते थे… उसे अपने दिन की हर बात बताते थे… उसके सामने बैठकर हँसते थे, कभी रोते थे…
जैसे माँ सच में वहीं बैठी हों।
—लोग क्या कहते थे_लोगों ने बहुत कुछ कहा—
“ये ठीक नहीं है…”
“उन्हें आगे बढ़ना चाहिए…”
“ये पागलपन है…”
पर क्या सच में ये पागलपन था?
या ये उस प्रेम की पराकाष्ठा थी, जिसे हम समझ ही नहीं पाते?
आज की दुनिया में, जहाँ रिश्ते छोटी-छोटी बातों पर टूट जाते हैं, जहाँ साथ होते हुए भी लोग दूर हो जाते हैं—वहाँ कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी के जाने के बाद भी उसे इतनी सच्चाई से जी रहा हो… क्या वो पागल है?
या फिर… वो हमसे ज़्यादा सच्चा है?
प्रेम की परिभाषा—हम अक्सर प्रेम को साथ रहने से जोड़ते हैं—पर क्या प्रेम सिर्फ़ साथ होने का नाम है?
या फिर प्रेम वो है, जो दूर होने के बाद भी उतना ही जीवित रहता है? पापा ने हमें सिखाया कि प्रेम का अर्थ सिर्फ़ हाथ पकड़कर चलना नहीं है—बल्कि उस हाथ को छोड़ने के बाद भी उसकी गर्माहट महसूस करना है।
धीरे-धीरे… एक और विदाई—समय बीतता गया… पापा का शरीर हमारे बीच था, पर उनका मन कहीं और चला गया था—वहीं, जहाँ माँ थीं। उन्होंने जीना नहीं छोड़ा था,
पर उन्होंने जीने की इच्छा छोड़ दी थी।
और एक दिन… वो भी चुपचाप चले गए।
शायद अब वो साथ हैं…—आज जब मैं ये सब सोचती हूँ, तो एक अजीब सी शांति महसूस होती है।
दर्द तो है—बहुत गहरा दर्द—पर उसके साथ एक सुकून भी है। शायद अब वो फिर से साथ होंगे…शायद माँ फिर से पापा के लिए चाय बना रही होंगी… शायद पापा फिर से उन्हें उसी प्यार से देख रहे होंगे… जैसे कभी कुछ बदला ही नहीं।
इक प्रेम ऐसा भी—हर किसी को ऐसा प्रेम नहीं मिलता।
और हर कोई ऐसा प्रेम निभा भी नहीं पाता।
यह कहानी सिर्फ़ मेरे माँ-पापा की नहीं है—यह उस प्रेम की कहानी है, जो आज के समय में दुर्लभ होता जा रहा है।
एक ऐसा प्रेम—
जो साथ में भी पूरा था, और जुदाई में भी अधूरा नहीं हुआ।
एक ऐसा प्रेम— जो समय से नहीं बंधा, जो दूरी से नहीं टूटा,
जो मृत्यु से भी समाप्त नहीं हुआ। मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ सीखा—पर सबसे बड़ी सीख यही रही—
कि सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।
वो रूप बदल सकता है,
वो दूरी में बदल सकता है,
वो यादों में बस सकता है—
पर वो खत्म नहीं होता।
अंतिम विचार—आज मैं जब अपने बच्चों को देखती हूँ, अपने जीवन को देखती हूँ, तो महसूस करती हूँ—
मैं आगे बढ़ गई… पर पापा ने पीछे रहकर भी प्रेम को आगे बढ़ा दिया। उन्होंने हमें दिखाया कि प्रेम सिर्फ़ एक भावना नहीं, एक तपस्या है… एक समर्पण है… एक अमर सत्य है।
और सच में…
**कुछ प्यार ऐसे होते हैं,
जो जुदाई से नहीं टूटते,
बल्कि जुदाई में ही अमर हो जाते हैं।**
*— इक प्रेम ऐसा भी…*
लेखिका- ऊषा शुक्ला

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