बांग्लादेश के घटनाक्रम को हल्के में ना लिया जाए

सांप्रदायिक सद्भाव भारतीय उपमहाद्वीप की सर्वोच्च प्राथमिकता हो : अजय खरे

रीवा । बांग्लादेश भौगोलिक , भाषाई और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के बेहद करीब है। इसकी पूर्वी उत्तरी और पश्चिमी सीमाएं भारतीय राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, मेघालय और त्रिपुरा से मिलती हैं। पूर्वी कुछ सीमा पड़ोसी देश म्यांमार से भी जुड़ी हुई है। इसके अलावा दक्षिण में बंगाल की खाड़ी इसका समुद्र क्षेत्र है। बांग्लादेश में मची उथल-पुथल का असर भारतीय उपमहाद्वीप में पड़ रहा है। भारतीय सीमाओं पर भी बहुत अधिक दबाव बना हुआ है। ऐसे समय में किसी भी क्रिया प्रतिक्रिया का असर अनदेखा नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश के अभ्युदय में भारत की बहुत बड़ी भूमिका रही है। बांग्लादेश को मान्यता देने वाला सबसे पहला देश भारत ही है। चीन और अमेरिका दोनों देशों की नजर बांग्लादेश और उसके समुद्री तट पर टिकी हुई है। बांग्लादेश का साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के लिए साम्राज्यवादी शक्तियां सक्रिय हैं। वहां की अराजकता का फायदा साम्राज्यवादीज्ञशक्तियों के साथ साम्प्रदायिक शक्तियां भी उठाना चाहती हैं।दुनिया में कहीं दूर भी आग लगे उसका असर देर सबेर होता है। यदि पड़ोस में आग लगे तो उसका तुरंत असर होता है।

बांग्लादेश में सत्ता के उलटफेर को लेकर भारत की लोकसभा के प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस तरह की बातें एक सुनियोजित साजिश के तहत हो रहीं हैं। दरअसल बांग्लादेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के गंदे खेल को जानबूझकर हवा दी जा रही है। भारत में मोदी सरकार हिंदू वोटो के ध्रुवीकरण के गंदे खेल के चलते पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से सत्ता में काबिज है। भारतीय जनता पार्टी के अस्तित्व के पहले उसकी पूर्वज पार्टी जनसंघ और आरएसएस जैसे संगठन भी शुरू से बहुसंख्यक हिन्दूओं के प्रबल पक्षधर बनकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तूल देते हुए सत्ता हथियाने के लिए सक्रिय रहे हैं। उनके क्रियाकलापों से कभी ऐसा नहीं लगा कि यह देश के लिए काम कर रहे हैं बल्कि कट्टर धार्मिक संगठन के रूप में इनकी पहचान बनीं। इस समय बांग्लादेश को लेकर तरह-तरह की बयानबाजी हो रही है। कहीं बांग्लादेश को भारत में मिलाने की बात को हवा दी जा रही है या फिर वहां के हिंदुओं को लेकर मुसलमानों के खिलाफ वातावरण बनाया जा रहा है। भारत में बांग्लादेशी मुसलमान और बंगाली मुसलमान को भी जगह-जगह बेइज्जत किया जा रहा है। इसकी खतरनाक प्रतिक्रिया बांग्लादेश में हो इसका भी प्रयास हो रहा है। यदि बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिंदुओं के पलायन की स्थिति बनती है तो भारत में मुसलमान के खिलाफ और जहरीला वातावरण बनाने की गंदी कोशिश को बढ़ावा मिलेगा। इससे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की गंदी सोच को ताकत मिल सकती है। लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ रिपोर्टिंग करने वाला ढाका से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार‌ ब्लिट्ज का संपादक सलाउद्दीन सोएब चौधरी है जिन्होंने राहुल गांधी के द्वारा बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री को दी गई बधाई को लेकर उन्हें लपेटने की कोशिश की है। उन्होंने ठीक उसी तरह के सवाल खड़ा किए हैं जिस तरह की बातें भारतीय जनता पार्टी करती आई है। जबकि राहुल गांधी ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि वह बांग्लादेश के मामले में किसी तरह की दखलंदाजी कर सकें। बांग्लादेश के सवाल को लेकर उनकी छवि बिगाड़ने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जो गंदा खेला हो रहा है वह ढाका से नहीं बल्कि दिल्ली से प्रायोजित है जिसे कुछ भारतीय अखबार भी बड़ी प्राथमिकता से उछाल रहे हैं। यदि बांग्लादेश में शीघ्र शांति का माहौल नहीं बनता है तो उसका भरपूर गलत फायदा भारत में स्थापित साम्प्रदायिक शक्तियां उठाने की कोशिश करेंगी। देखने को मिल रहा है कि संघी गिरोह के लोग भी बांग्लादेश की अराजक घटनाओं को लेकर भारत का साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने पर उतारू हैं।‌ ऐसे समय में बहुत धैर्य और समझदारी से काम लेने की जरूरत है। यदि बांग्लादेश जलेगा तो भारत उसकी लपट से अपने आप को कितना बचा पाता है यह कहना मुश्किल है। भारत के लोगों को यह देखना है कि देश में कोई भी ऐसी सांप्रदायिक हलचल नहीं हो जिसके चलते बांग्लादेश का माहौल और खराब हो। भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की सर्वोच्च प्राथमिकता बांग्लादेश के अमन चैन को वापस लाना है। वहां शीघ्र शांति का माहौल स्थापित हो। भारतीय उपमहाद्वीप के लिए इससे अच्छी बात और कुछ नहीं हो सकती है। इसी में सभी का भला है।

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