तमिलनाडु: ‘ब्राह्मण’ कैंडिडेट्स पर दांव खेलने से क्यों बीजेपी समेत सभी बड़े दल बच रहे?

तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने से प्रमुख दल (DMK, AIADMK, BJP और कांग्रेस) बच रहे हैं। यह 2026 विधानसभा चुनाव के संदर्भ में चर्चा में है, जहां AIADMK ने 35 साल में पहली बार कोई ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा है, जबकि BJP ने अपनी 27 सीटों पर भी ऐसा नहीं किया। DMK और कांग्रेस की ओर से भी कोई ब्राह्मण टिकट नहीं दिया गया।

 

मुख्य कारण

 

तमिलनाडु में ब्राह्मण आबादी सिर्फ 2.5-3% के आसपास है। राज्य की राजनीति 1967 से द्रविड़ आंदोलन (Periyar EV Ramasamy की विचारधारा) पर आधारित है, जो गैर-ब्राह्मण (Non-Brahmin) अस्मिता, सामाजिक न्याय और आरक्षण पर जोर देती है। द्रविड़ पार्टियां (DMK, AIADMK) शुरू से ब्राह्मण-विरोधी (anti-Brahminism) रुख अपनाती रहीं, क्योंकि ब्राह्मणों का पहले प्रशासन और शिक्षा में असंगत प्रभाव था। Karunanidhi के समय में सरकारी नौकरियों और राजनीति से ब्राह्मणों को काफी हद तक हटाया गया।

 

कोई भी बड़ी पार्टी ब्राह्मण-बहुल सीट नहीं मानती (Mylapore या Kumbakonam जैसी कुछ सीटों को छोड़कर)।

ब्राह्मण उम्मीदवार खड़ा करने से गैर-ब्राह्मण वोट (OBC, जो 70%+ हैं) खिसकने का खतरा रहता है।
DMK जैसे दल इसे “आर्यन vs द्रविड़” का मुद्दा बनाकर राजनीति करते हैं।

 

 

BJP का खास मामला

 

BJP पर लंबे समय से “ब्राह्मण पार्टी” या “उत्तर भारतीय/सवर्ण पार्टी” का ठप्पा लगा है। पार्टी पिछले 10 वर्षों से इस छवि को तोड़ने की कोशिश कर रही है, ताकि गैर-ब्राह्मण हिंदू वोट (Thevar, Vanniyar, Gounder आदि) आकर्षित हो सकें।

2024 लोकसभा और 2026 विधानसभा में BJP ने जानबूझकर ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारे।
AIADMK के साथ गठबंधन में भी यही रणनीति अपनाई गई।
TAMBRAS (Tamil Nadu Brahmin Association) ने BJP को समर्थन दिया, लेकिन पार्टी ने वोट बैंक विस्तार के लिए Non-Brahmin नेताओं (जैसे K. Annamalai, जो Gounder हैं) पर फोकस किया।

BJP की रणनीति है: हिंदुत्व को पैन-हिंदू बनाने की, न कि सवर्ण-केंद्रित। द्रविड़ पार्टियां BJP को “ब्राह्मणिकल” बताकर हमला करती हैं, इसलिए पार्टी इस ट्रैप से बचना चाहती है।
अन्य दलों की स्थिति

AIADMK: Jayalalithaa (ब्राह्मण) के बाद ब्राह्मण समर्थन धीरे-धीरे BJP की ओर शिफ्ट हो गया। अब AIADMK को ब्राह्मण टिकट से फायदा नहीं दिखता।
DMK: विचारधारा के कारण ब्राह्मणों को जगह नहीं देती।
कांग्रेस: द्रविड़ गठबंधन में शामिल होने से प्रभावित।

 

छोटी पार्टियों का रुख

 

इसके विपरीत, नई पार्टियां जैसे Naam Tamilar Katchi (NTK) ने 6 ब्राह्मण उम्मीदवार (4 महिलाएं) उतारे हैं, और Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने 2 (Mylapore और Coimbatore South से)। NTK का कहना है कि “तमिल ब्राह्मण भी तमिल हैं” और वे द्रविड़ पार्टियों के ब्राह्मण-विरोधी रुख से दूर हट रहे हैं। यह प्रतीकात्मक कदम है, लेकिन कुल 234 सीटों में बहुत कम असर।

 

ब्राह्मणों की राजनीतिक स्थिति

ब्राह्मण अब राजनीति में लगभग “अदृश्य” हो चुके हैं। विधानसभा में शायद ही कोई ब्राह्मण MLA हो। वे मुख्य रूप से शिक्षा, आईटी, पेशेवर क्षेत्रों में सक्रिय हैं। BJP के साथ उनका जुड़ाव बढ़ा, लेकिन पार्टी उन्हें टिकट नहीं दे रही। कई ब्राह्मण अब NTK जैसी पार्टियों को विकल्प मान रहे हैं।
यह दूरी वोट बैंक की कड़क गणित का नतीजा है। तमिलनाडु में चुनाव जाति-आधारित समीकरणों पर लड़े जाते हैं, और ब्राह्मण अल्पसंख्यक होने से “winnability” कम मानी जाती है। बड़े दल सामाजिक न्याय की छवि बनाए रखना चाहते हैं, जबकि BJP हिंदू एकता के बिना ब्राह्मण-केंद्रित छवि से बचना चाहती है।
यह ट्रेंड 1967 के बाद से चला आ रहा है, लेकिन 2026 में यह और स्पष्ट दिखा। छोटी पार्टियां प्रतीकात्मक रूप से ब्राह्मणों को जगह दे रही हैं, लेकिन मुख्यधारा में बदलाव की संभावना कम है जब तक वोटर समीकरण न बदलें। राजनीति में जाति अभी भी निर्णायक भूमिका निभाती है, चाहे कोई दल कितना भी “जाति से परे” होने का दावा करे।

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