कहीं हिंदुत्व तो कहीं स्थानीय पहचान… बंगाल, असम से लेकर तमिलनाडु तक, इन मुद्दों पर होगा चुनाव

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव में प्रचार तेजी से चल रहा है. सभी राजनीतिक दल अलग-अलग मुद्दों को लेकर चुनावी मैदान में हैं, लेकिन इस बार के चुनाव में विकास के मुद्दों से ज्यादा भावनात्मक मुद्दे और स्थानीय अस्मिता का मुद्दा ज्यादा हावी है. असम हो या पश्चिम बंगाल, केरल हो या तमिलनाडु सभी राजनीतिक दल स्थानीय अस्मिता का मुद्दा तेजी से चुनाव में उठा रहे हैं.

चुनाव प्रचार में विकास के मुद्दे गायब हैं. न सड़क, न रोजगार, न विकास. इस बार चुनाव में एंट्री हुई है अस्मिता और संस्कृति की. पश्चिम बंगाल से असम और तमिलनाडु तक, हर जगह स्क्रिप्ट अलग, लेकिन कहानी एक पहचान की राजनीति. अब सवाल ये उठ रहा है वोट किसे मिलेगा. जो काम गिनाएगा या जो इमोशन जगाएगा.

 

बंगाल में कौन-सा मुद्दा सबसे ज्यादा उछला?

 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की बात करें तो चुनाव में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा विकास नहीं बल्कि पहचान बनाम पहचान बन गया है. 15 साल की सरकार का काम बैकस्टेज चला गया है और फ्रंट पर आ गए हैं राष्ट्रवाद, धर्म और अस्मिता के सुपरहिट डायलॉग्स.

बीजेपी की स्क्रिप्ट साफ है, अगर बहुसंख्यक मतदाता साथ आ गए तो सीटें भी साथ आ जाएंगी. इसलिए अब भाषणों में सड़क की चर्चा कम और सीमा की ज्यादा. रोजगार की कम और घुसपैठ की ज्यादा. विकास की कम और धार्मिक संतुलन ज्यादा सुनाई दे रहा है.

सभी बड़े नेताओं के भाषणों में पश्चिम बंगाल की अस्मिता का जिक्र है. बीजेपी नेता जहां एक तरफ डेमोग्राफिक बदलाव का मुद्दा उठा कर बंगाल अस्मिता को खतरा बता रहे हैं. वहीं गृहमंत्री का फोकस सीमा सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा है, जिसे वो चुनावी सभाओं में उठा रहे हैं.

 

असम में घुसपैठ और यूसीसी का मुद्दा

 

ममता बनर्जी बीजेपी के सरकार में आने के बाद मछली अंडा ना खाने देने का आरोप लगा रही हैं और बंगाल की संस्कृति और खानपान पर हमला होने की बात कर रही हैं. अब चुनाव सिर्फ धर्म नहीं भाषा, खान-पान और रीजनल प्राइड का फुल पैकेज बन चुका है और ये कहानी सिर्फ बंगाल की नहीं असम में भी UCC और पहचान जैसे मुद्दे तेजी से उठाए जा रहे हैं.

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा घुसपैठियों और यूसीसी का मुद्दा उठाकर असमिया अस्मिता को बचाने की बात कर रहे हैं और मियांओं को बाहर निकालने की बात करके डेमोग्राफिक बदलाव का मुद्दा भी उठा रहे हैं. हालांकि हिमंता कहते हैं कि उनका मियां से मतलब बांग्लादेशी घुसपैठियों से है. कांग्रेस भी मुख्यमंत्री के इस बयान को मुद्दा बनाकर असम की अस्मिता और संस्कृति पर हमला बता रही है.

 

तमिलनाडु और केरल में किस मुद्दे का बोलबाला?

 

तमिलनाडु में भी कहानी लगभग यही दिख रही है. तमिलनाडु में हिंदुत्व Vs द्रविड़ पहचान की लड़ाई चुनाव में है. डीएमके जहां हमारी भाषा, हमारी संस्कृति का मुद्दा उठा रही है तो वहीं बीजेपी हिंदुत्व का नैरेटिव लेकर चुनाव में चल रही है.

केरल में भी धर्म और संस्कृति की सॉफ्ट पॉलिटिक्स चल रही है. बीजेपी हो या कांग्रेस या लेफ्ट सभी सबरीमाला मंदिर में सोना चोरी का मुद्दा उठा रहे हैं. यहां भी सभी दल केरल की संस्कृति का मुद्दा जोर शोर से चुनाव में उठा रहे हैं. कुल मिलाकर राज्य बदल रहे हैं, किरदार बदल रहे हैं, लेकिन दलों की चुनावी स्क्रिप्ट वही है- पहचान और अस्मिता की राजनीति.

अब जनता संस्कृति और अस्मिता के मुद्दे पर किस दल पर यकीन करती है वो तो 4 मई के परिणामों से पता चलेगा, लेकिन इस बार के चुनावों को इन मुद्दों ने दिलचस्प बना दिया है.

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