एक पहेली बन कर रह गया है सहारा निवेशकों का भुगतान!

चरण सिंह
सहारा निवेशकों का भुगतान इस समय देश में बड़ा मुद्दा है वह बात दूसरी है कि राजनीतिक दल इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। यह मुद्दा विभिन्न विधानसभाओं में भी उठा और लोकसभा और राज्यसभा में भी। विधानसभाओं में भी जवाब दिया गया और लोकसभा और राज्यसभा में भी। सब कुछ हुआ पर न हो सका तो वह है निवेशकों का भुगतान। अब जब मामला राज्यसभा में उठा तो केंद्रीय गृहमंत्री और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने लिखित में जवाब दिया। उन्होंने जवाब में कहा कि सहारा रिफंड पोर्टल और सीआरसीएस के माध्यम से १६ जुलाई तक ४,२०,४१७ निवेशकों को ३६२.९१ करोड़ रुपये का का भुगतान किया गया है। मतलब मामला राज्यसभा में उठ गया और सरकार ने जवाब भी दे दिया पर हुआ क्या, ढाक के तीन पात। जब सहारा-सेबी के खाते से ५००० करोड़ रुपये निकाले गये हैं तो दो साल में मात्र ३६२.९१ करोड़ रुपये ही सहारा निवेशकों को क्यों दिये गये ? राज्यसभा में विपक्षी दलों ने क्यों नहीं कहा कि भुगतान की रफ्तार इतनी धीमी क्यों ? अब तक ५००० करोड़ रुपये क्यों दिये गये ? गत सरकार में तत्कालीन केंद्रीय राज्यमंत्री बीएल वर्मा ने कहा था कि सरकार सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध कर ४०००० करोड़ रुपये और निकलवाएगी। ऐसे में प्रश्न उठता कि जब दो साल में ३६२.९१ करोड़ रुपये ही दिये गये तो फिर पांच हजार करोड़ रुपये देने में कितने साल लगेंगे ? यदि सुप्रीम कोर्ट से आदेश कराकर ४०००० करोड़ रुपये निकलवा भी लिये गये तो फिर क्या ये रुपये निवेशकों दिये जाएंगे ? दिये जाएंगे तो फिर कितने सालों में।
दरअसल सहारा निवेशकों के भुगतान का मुद्दा देश में गंभीर रूप लेता जा रहा है। बताया जा रहा है कि पैसा न मिलने की वजह से बड़े स्तर पर एजेंटों ने आत्महत्या कर ली है। निवेशकों के एजेंटों को गोली मारने के भी मामले सामने आ रहे हैं। कितने एजेंट अपने घरों को नहीं जा पा रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि एजेंटों ने झूठ-सच बोलकर निवेशकों से पैसे लिये हैं पर वह इन एजेंटों की मजबूरी रही है। यह भी जमीनी हकीकत है कि सहारा में सुब्रत राय ने एजेंटों पर ऐसी ऐल्टी मार रखी थी कि एजेंट एक एक पैसा सहारा में जमा कराते रहे हैं। ये बेचारे कहां से पैसा लाकर देंगे। इसमें भी दो राय नहीं कि आंदोलन करने वाले भी अधिकतर एजेंट ही हैं। आंदोलनों में भीड़ न होने का कारण भी यही होता है कि एजेंटों के साथ निवेशक नहीं आ पाते हैं। हालांकि फिर से संगठनों में एकता की बात होने लगी है।
देखने की बात यह है कि सहारा के चेयरमैन रहे सुब्रत राय भले ही आज दुनिया में न रहे हों पर उनकी तिकड़मबाजी सरकारों पर भी भारी पड़ती थी। चाहे बालीवुड हो, चाहे खेल का क्षेत्र हो या राजनीति हर क्षेत्र के धुरंधरों से उनकी जबर्दस्त संबंध रहे हैं। मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, प्रमोद तिवारी, राज बब्बर, नरेश अग्रवाल जैसे नेताओं से सुब्रत राय के पारिवारिक रिश्ते रहे हैं। एक से बढ़कर अभिनेता और अभिनेत्रियों को सुब्रत राय ने सहारा शहर में नचाया है। खेल क्षेत्र की हस्तियां उनकी आगे पीछे घूमती थीं। यह सब जनता के पैसों का खेल था। मतलब जिन लोगों ने सुब्रत राय को फर्श से अर्श तक पहुंचाया उन लोगों को सुब्रत राय ने सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया।

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