बिहार-झारखंड में ‘MIC’ ने बिगाड़ा था बीजेपी का खेल

 सामने आई लोकसभा चुनाव 2024 में हार की असल वजह!

दीपक कुमार तिवारी

पटना।पहली बार पीएम बनते ही नरेंद्र मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ का नारा दिया था। यह उनकी सरकार का ध्येय वाक्य था। इस दिशा में उन्होंने काम भी किया। पर, उन्हें न सबका साथ मिला और न सभी ने उनके प्रति विश्वास ही व्यक्त किया। देश में ऐसा जातीय और धार्मिक समीकरण विपक्ष ने बनाया, जिसने मोदी के 400 पार के सपने को ध्वस्त कर दिया।

वैसे मोदी जिस पद पर हैं, उसके लिए यह स्लोगन सटीक ही था। काम भी उन्होंने उसी अनुरूप किया। मुफ्त का राशन हो या केंद्र सरकार की दूसरी कल्याणकारी योजनाएं, बिना किसी भेदभाव के मोदी ने लोगों को लाभार्थी बनाया। इसके बावजूद मुसलमानों ने मोदी का साथ छोड़ दिया तो दलित-पिछड़ी जातियों के लोगों ने भी किनारा कर लिया।

सवाल उठता है कि पीएम आवास योजना, किसानों को सम्मान निधि, कारीगरों के लिए विश्वकर्मा योजना, मुद्रा लोन और मुफ्त राशन जैसी योजनाएं लोगों को क्यों नहीं रास आई ? क्या ये योजनाएं लोक कल्याण और लोगों के विकास में बाधक थीं ? इन सवालों के जवाब तलाशने की भाजपा बार-बार कोशिश कर रही है। इसके लिए राज्यवार समीक्षा कर रही है। लोकसभा चुनाव में सीटें घटने पर राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर मंथन चल रहा है।

चुनावी परफॉर्मेंस बेहतर नहीं रहने की जो वजहें सामने आ रही हैं, उनमें कहीं से इन योजनाओं की मुखालफत नजर नहीं आती। यह भी नहीं कि जिन लोगों ने मोदी को वोट नहीं किया, उन्होंने अरबों रुपए खर्च वाली इन योजनाओं का लाभ लेना अब बंद कर दिया है।

जो कुछ कारण उभर कर सामने आए हैं, उनमें इन योजनाओं को लेकर लोगों की नाराजगी कहीं से नहीं दिखती। भाजपा को पूर्ण बहुमत से कम सीटें आने और सहयोगी दलों को भी आशातीत सफलता न मिलने के जो कारण सामने आए हैं, वे जरूर चौंकाते हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण ‘MIC’ है।
M- मुसलमानों ने भाजपा से किनारा किया।

पहला कारण स्पष्ट तौर पर यह दिखता है कि देश की तकरीबन 20 प्रतिशत मुसलमानों की आबादी ने भाजपा और उसके सहयोगी दलों से किनारा कर लिया। यद्यपि कि केंद्र की तमाम योजनाओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी कम नहीं हुई है।

केंद्र सरकार हज सब्सिडी के नाम पर हर साल 600 करोड़ रुपए मुसलमानों पर खर्च करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के लिए 15 सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वित किए। अल्पसंख्यक छात्रों के लिए स्कॉलरशिप योजनाएं शुरू कीं। प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक और मेरिट-कम-मीन्स आधारित छात्रवृत्ति मोदी सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए शुरू की।

इसके अलावा मौलाना आजाद राष्ट्रीय फेलोशिप योजना, एम.फिल और पीएचडी जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वित्तीय सहायता अल्पसंख्यक छात्रों को सरकार देती रही है। मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन में कक्षा 9 से 12 तक के अल्पसंख्यक समुदाय की मेधावी लड़कियों के लिए बेगम हजरत महल राष्ट्रीय छात्रवृत्ति नामक योजना का क्रियान्वयन मोदी सरकार ने किया।

नया सवेरा योजना के तहत मुफ्त कोचिंग और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के कौशल और ज्ञान बढ़ाने के लिए छह लाख रुपए से कम आय वालों बच्चों को आर्थिक सहायता दी। यानी अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं के शैक्षिक-आर्थिक उन्नयन की दिशा में नरेंद्र मोदी के काम पिछली सरकारों से कहीं ज्यादा रहे।

इसके बावजूद मुसलमानों ने मोदी पर भरोसा नहीं किया। I- इंपोर्टेड उम्मीदवारों ने भी खेल बिगाड़ा
भाजपा से उसके वोटरों के विमुख होने का एक और बड़ा कारण भी है। भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए दूसरे दलों से पिछले 10 साल में नेताओं का खूब आयात किया है।

भाजपा ने इस बार लोकसभा चुनाव में वैसे 106 उम्मीदवारों को टिकट दिए, जिन्होंने पिछले 10 साल में पार्टी का दामन थामा है। इस बार भाजपा ने लोकसभा की कुल 543 सीटों में 435 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें 106 दूसरे दलों से आए नेता हैं।

उत्तर प्रदेश में पिछले दो चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहा, लेकिन इस बार परिणाम सबसे खराब आए। इसके पीछे भी भाजपा के वे 23 उम्मीदवार हैं, जो बीते 10 साल में भाजपा में पाला बदल कर आए थे। झारखंड में भाजपा बीते चुनाव के मुकाबले इस बार तीन सीटें हार गईं। इनमें दुमका सीट पर भाजपा ने जेएमएम से आईं सीता सोरेन को पूर्व घोषित उम्मीदवार सुनील सोरेन को
बदल कर टिकट दे दिया था।

C- कास्ट कार्ड का असर भीअब सीता सोरेन आरोप लगा रही हैं कि पार्टी के ही कुछ नेताओं ने उनकी मदद से हाथ खींच लिए। चुनावी भाषा में इसे भीतरघात कहा जाता है। उनका सीधा आरोप सुनील सोरेन पर है, जिनका टिकट काट कर भाजपा ने जेएमएम से आईं सीता सोरेन को मौका दे दिया था।

बिहार में पिछले मुकाबले नौ सीटें गंवाने के बाद एनडीए में सिर फुटौव्वल शुरू है। कोई कह रहा है कि भाजपा के वोट एनडीए के पार्टनर उपेंद्र कुशवाहा को ट्रांसफर नहीं हुए तो कुशवाहा समाज के लोगों ने बिहार के शाहाबाद इलाके की पांच संसदीय सीटों पर एनडीए उम्मीदवारों को वोट नहीं किया।

इसके अलावा विपक्ष का कास्ट कार्ड अधिक कारगर रहा है। यादव के साथ कुशवाहा समाज के लोगों को लोकसभा का टिकट देकर इंडी अलायंस के पार्टनर आरजेडी ने नया प्रयोग किया। उसका प्रयोग सफल भी रहा। आरजेडी के टिकट पर जीते चार उम्मीदवारों में एक कुशवाहा समाज के नेता अभय कुमार सिन्हा शामिल हैं तो आरजेडी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली सीपीआई (एमएल) के टिकट पर कुशवाहा जाति के दो उम्मीदवारों ने NDA के कैंडिडेट को धूल चटा दी।

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