36 साल बाद कश्मीरी पंडितों की हत्यारोपियों पर शिकंजा! 9 जगहों पर छापेमारी

जम्मू कश्मीर घाटी में आतंकवाद के दौर में हुई कश्मीरी पंडितों की हत्याओं के मामलों में अब दोबारा जांच तेज हो गई है।1990 में आतंकवादियों के हाथों मारे गए सर्वानंद कौल और उनके बेटे की हत्या के मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी (SIA) ने प्रदेश के नौ ठिकानों पर छापेमारी की है। इस कार्रवाई के बाद वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे पीड़ित परिवारों में उम्मीद जगी है।

SIA की टीम ने बुधवार को अनंतनाग में हुए इस डबल मर्डर केस से जुड़े संदिग्ध ठिकानों पर कार्रवाई की। पुलिस अधिकारियों ने कश्मीर घाटी के आठ स्थानों और जम्मू के बागे बहू इलाके में छापेमारी की। यह मामला 1990 के उस दौर से जुड़ा है, जब घाटी में आतंकवाद बढ़ने के बाद कई कश्मीरी पंडित परिवारों को निशाना बनाया गया था. पुलिस अब पुराने मामलों की फाइलें खोलकर जांच आगे बढ़ा रही है।
 

कश्मीरी पंडित हत्याओं की दोबारा जांच का फैसला

 

 

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने आतंकवाद के दौर में हुई कश्मीरी पंडितों की हत्याओं के मामलों की जांच दोबारा शुरू करने का फैसला किया है। इसी क्रम में कई पुराने मामलों को फिर से खंगाला जा रहा है. पुलिस का मानना है कि इन मामलों में पीड़ित परिवारों को लंबे समय बाद न्याय दिलाने के लिए जांच को नए सिरे से आगे बढ़ाने की जरूरत है।

 

सरला भट्ट हत्याकांड में दाखिल हो चुकी है चार्जशीट

 

इससे पहले कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट की हत्या के मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एंटी टेररिज्म कोर्ट में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। पुलिस के मुताबिक, वर्ष 1990 में सरला भट्ट का कथित तौर पर अपहरण प्रतिबंधित आतंकी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के आतंकियों ने किया था. पुलिस ने दावा किया कि उन्हें प्रताड़ित करने के बाद हत्या कर दी गई थी।

 

पुलिस ने बताया था टारगेटेड हिंसा का हिस्सा

 

पुलिस के अनुसार, सरला भट्ट हत्याकांड कश्मीरी पंडितों के खिलाफ टारगेटेड हिंसा के अभियान का हिस्सा था. इसका उद्देश्य लोगों में डर पैदा करना और उन्हें घाटी छोड़ने के लिए मजबूर करना था। इस मामले में पुलिस ने खुर्शीद अहमद चालकू को मुख्य आरोपी बताया था. पुलिस के मुताबिक घटना के बाद वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भाग गया था।  इसके अलावा तीन अन्य आरोपियों अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी और गुलाम मोहम्मद टपलू के नाम भी सामने आए थे, जिनकी अब मौत हो चुकी है। 36 साल पुराने मामलों में हो रही इन कार्रवाइयों से उन परिवारों को उम्मीद है, जिन्होंने आतंकवाद के दौर में अपने प्रियजनों को खो दिया था।

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