आरक्षण पर अब होगा नीतीश-मोदी का ‘पॉलिटिकल पैथोलॉजी टेस्ट’

बिहार सरकार के पास क्या है विकल्प?

दीपक कुमार तिवारी

पटना। बिहार में आरक्षण का दायरा 50 फीसदी से ऊपर बढ़ाने की कोशिश कामयाब नहीं हुई। पर ऐसा भी नहीं कि नीतीश नीत सरकार के लिए रास्ता बंद हो गया है। कई राजनीतिक दाव पेंच अभी शेष हैं, जिसे अपनी-अपनी राजनीति की सुविधा के अनुसार रणनीति बनाना अभी बाकी है। ऐसे में जानना जरूरी है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास क्या-क्या संभावनाएं अभी बचे हैं। साथ ही सरकार के साथ-साथ जनता का भी ‘पैथोलॉजी टेस्ट’ होगा।

जाहिर है पटना हाईकोर्ट ने वही किया जो उम्मीद थी। लेकिन हाई कोर्ट जाने के पहले राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का पूरा होमवर्क कर लिया था। सबसे पहले जातीय जनगणना करा कर एक ऑथेंटिक डाटा तैयार कर लिया। सामाजिक समीकरण का एक पूरा खाका सुप्रीम कोर्ट के लिए तैयार है। साथ-साथ इसके आर्थिक सर्वेक्षण भी कराया गया है। इस सर्वेक्षण में बिहार अत्यंत गरीब राज्य की कैटेगरी में दिखाया गया है।

इससे एक नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि पिछड़े दलित को कैसे विकास के रास्ते कैसे लाया जाए। यह सावधानी इसलिए भी कि इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, महाराष्ट्र सरकार के द्वारा 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण बढ़ाने के कारण रद्द करना पड़ा था। और वजह यही बताई गई कि जाति के किस आंकड़े के कारण आरक्षण प्रतिशत बढ़ाया। नीतीश सरकार ने पहले ही सब कुछ व्यवस्था कर ली है। बावजूद एससी रिजेक्ट करता है तो और भी कई रास्ते हैं।

केंद्र में बहुमत की सरकार अभी नहीं है। राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास अभी 12 सांसदों की ताकत है। पिछड़ों की राजनीति साधने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजी किया जा सकता है। वैसे भी भाजपा की राजनीति की धारा बदल चुकी है। भाजपा भी प्रो पिछड़ा की राजनीति करने लगी है। ओडिशा में आदिवासी को सीएम बनाया।

मध्यप्रदेश में मोहन यादव को सीएम बनाया। पिछड़ों की राजनीत को साधने के लिए शिवराज सिंह चौहान तक को एमपी का वर्षों तक सीएम बनाया। कई राज्यों से दबाव पड़ने पर संभव है कि आरक्षण के प्रतिशत बढ़ाने पर सत्ता और विपक्ष में सहमति बने और संविधान में संशोधन हो सके।

एक रास्ता यह भी है कि नीतीश सरकार तमिलनाडु सरकार की राह पर चले। विधान मंडल में आरक्षण के प्रतिशत बढ़ाने पर सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित कराए। और फिर केंद्र सरकार पर दबाव डाले कि इसे 9वीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाए ताकि पिछड़ चुके लोगों को विकास की धारा में लाया जा सके।

राजनीतिक पार्टियां संभव है कि इस मुहिम को विमर्श में परिवर्तित कर देंगी। समाज के अंतिम पायदान तक बहस को ले जाएंगी। इस बहस से जनता के रुख को पहचाना जायेगा। दरअसल सभी राजनीतिक दल जनता के बीच जाकर आरक्षण पर उनका दृष्टिकोण जानना चाहती है। ऐसा इसलिए कि लगभग सभी दल इस बात को समझते हैं कि सरकारी नौकरी है ही कितनी, जिसका लाभ उठाया जा सके। इसलिए इस बहस को राजनीतिक दल लंबा खींचेंगे। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अब आरक्षण विचार-विमर्श के बाद ही परिवर्तित किया जायेगा। और यह विमर्श दलों के लिया समाज का एक तरह से पैथोलॉजी टेस्ट हो जाएगा।

बढ़े आरक्षण प्रतिशत का पटना हाईकोर्ट के द्वारा रद्द किया जाना कोई पहली घटना है। महाराष्ट्र, राजस्थान इसके पहले उस सूची में शामिल हो चुका है। महाराष्ट्र विधानसभा ने साल 2018 में एक विधेयक पारित किया। इसके तहत सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में मराठा समुदाय के लोगों को 16 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया, जिससे आरक्षण का दायरा बढ़कर 68 फीसदी जा पहुंचा। मामला सुप्रीम कोर्ट गया और 2021 में देश की सर्वोच्च अदालत ने इसे रद्द कर दिया।

ओडिशा सरकार ने भी राज्य सरकार की नौकरियों में ओबीसी समुदाय के लिए आरक्षण का दायरा बढ़ाने की कोशिश 2017 में की। साथ ही 2018 में स्थानीय शहरी निकाय चुनाव में भी ओडिशा की सरकार ने मिलती-जुलती कोशिश की। मगर यह भी पूरा प्रयास ओडिशा हाईकोर्ट में नहीं टिका और राज्य सरकार को कदम वापस लेना पड़ा।

राजस्थान की राज्य सरकार ने कुछ बरस पहले गुर्जर और ओबीसी समुदाय के लोगों के लिए आरक्षण का नोटिफिकेशन जारी किया था। इससे आरक्षण का दायरा 50 फीसदी के पार चला गया। मामला उच्च न्यायालय से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो भी आरक्षण का हकदार हैं, उसे आरक्षण तो दी जानी चाहिए, मगर 50 फीसदी के निर्धारित दायरे का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

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