राष्ट्रपति भवन में गूंजा शिक्षा और सशक्तिकरण का संदेश

ऋषी तिवारी
नई दिल्ली। भारत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज एक बहुत ही प्रेरणादायक और भावनात्मक मुलाकात की और आज राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक हाल में जनजातीय कार्य मंत्रालय की प्रमुख छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत लाभ उठा रहे छात्रों का एक समूह उनसे मिलने पहुंचा। यह मुलाकात केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह देश के सबसे उच्च संवैधानिक पद पर बैठी एक जनजातीय महिला और भविष्य के निर्माताओं के बीच विचारों का एक सशक्त आदान-प्रदान था। इस अवसर पर राष्ट्रपति मुर्मु ने छात्रों को न केवल भारत की संपदा और संभावनाओं पर गर्व करने को कहा, बल्कि उन्हें ‘विकसित भारत’ के संकल्प में सहभागी बनने का भी आह्वान किया।

 

 

प्रतिभा की कमी नहीं, अवसरों की थी कमी

 

 

लाभार्थी युवाओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने देश के विविधतापूर्ण परिदृश्य पर प्रकाश डाला और कहा कि हमारे देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। बस आवश्यकता है सही मार्गदर्शन, सहयोग और एक उचित मंच उपलब्ध कराने की। उनका यह कथन उन गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों की वास्तविकता को दर्शाता है, जहां असीमित प्रतिभा धूल में मिट जाती है, क्योंकि उन्हें सही अवसर नहीं मिल पाता। राष्ट्रपति ने कहा कि आज जो छात्र यहां उपस्थित हैं, वे इस बात के जीते-जागते प्रमाण हैं कि यदि अवसर मिले तो हमारे जनजातीय अंचलों से ऐसे युवा निकलकर आएंगे, जो भारत का नाम दुनिया भर में रोशन करेंगे। उनकी उपस्थिति यह संदेश देती है कि समाज के हर वर्ग में चमकने वाले तारे मौजूद हैं, बस उन्हें आकाश में दिखाने की जरूरत है।

राष्ट्रपति मुर्मु ने इस मौके पर छात्रवृत्ति योजनाओं के गहरे अर्थ को समझाया। उन्होंने कहा कि छात्रवृत्तियां केवल कुछ रुपयों की वित्तीय सहायता नहीं हैं, बल्कि ये युवाओं के सपनों को पंख देने का काम करती हैं। कई बार ऐसा होता है कि प्रतिभावान बच्चों के पास असीम क्षमता होती है, लेकिन संसाधनों का अभाव उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। छात्रवृत्तियां उन युवाओं के जीवन में नई संभावनाओं के द्वार खोलती हैं। उन्होंने भारत सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जनजातीय समुदायों से आने वाले युवाओं को सशक्त बनाने और उनका उत्थान करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। यह एक ऐसा अभियान है, जो सामाजिक न्याय और समावेशिता को साकार करने की दिशा में काम कर रहा है।

 

 

शिक्षा: आत्मनिर्भरता की पहचान

 

 

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में शिक्षा को जीवन का सबसे बड़ा हथियार बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षा सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण साधन है। शिक्षा ही वह शक्ति है जो किसी व्यक्ति को आत्मनिर्भर, जागरूक और सक्षम बनाती है। उन्होंने अपनी निजी जीवन यात्रा का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके जीवन में भी शिक्षा ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक आदिवासी बेटी होने के नाते, उन्होंने शिक्षा के माध्यम से ही देश के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया। उन्होंने छात्रों से कहा कि उनकी शिक्षा और अनुभव को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रखना चाहिए। यह उन बच्चों के लिए प्रेरणा बननी चाहिए, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब वे दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ेंगे, तभी राष्ट्र का समावेशी विकास एक वास्तविकता बन पाएगा।

 

 

विरासत पर गर्व और तकनीक की शक्ति

 

 

राष्ट्रपति मुर्मु ने अपने संदेश में परंपरा और आधुनिकता के बीच एक संतुलित समीकरण स्थापित किया। उन्होंने युवाओं, विशेष रूप से जनजातीय समुदायों से आने वाले युवाओं से आग्रह किया कि वे अपनी जड़ों और अपने लोगों को न भूलें। उनका कहना था कि विकास की दौड़ में अपनी संस्कृति और पहचान से जुड़े रहना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब युवा अपनी विरासत पर गर्व करते हुए, शिक्षा और प्रौद्योगिकी की शक्ति के बल पर आगे बढ़ेंगे, तो वे एक सुदृढ़, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करेंगे। यह संदेश विशेष रूप से आज के दौर में प्रासंगिक है, जब वैश्वीकरण के युग में अपनी पहचान को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन का अंत देश के विकास के वृहद लक्ष्य से जोड़ा। उन्होंने कहा, “हम वर्ष 2047 तक भारत को ‘विकसित भारत’ में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में युवा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।” युवा शक्ति, आशा और उज्ज्वल भविष्य के प्रतीक हैं। चाहे वह विज्ञान हो, कला हो, खेल हों या प्रशासन—वे जिस भी क्षेत्र को चुनें, उनमें वे समाज और राष्ट्र के विकास के लिए सक्रिय योगदान दे सकते हैं। राष्ट्रपति ने उन पर भरोसा जताया कि ये युवा देश की प्रगति में अग्रणी भूमिका निभाएंगे।

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