नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओका का मानना है कि अगर सरकारें असहमति को अपराध की श्रेणी में रखना जारी रखती हैं तो भारत में लोकतंत्र खत्म होने का खतरा है। पूर्व जज ने संवैधानिक अदालतों से आग्रह किया कि वे ऐसे मामलों को खत्म करें और फ्री स्पीच को रोकना या दबाना बंद करें। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस ओका का कहना है कि जब मौलिक अधिकारों का सवाल हो तो प्रदर्शनकारियों या असहमति जताने वालों की बातों और भाषण के आधार पर अदालतें फैसला नहीं दे सकतीं।
‘कोर्ट का काम उपदेश देना नहीं’
याचिकाकर्ता ने जो कहा या व्यक्त किया है, हो सकता है कि अदालत को पसंद न आए, लेकिन फिर भी बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना कोर्ट की ड्यूटी है। कोर्ट का काम यह नहीं है कि याचिकाकर्ता को उपदेश दे या सिखाए कि उसे क्या कहना चाहिए और उसे क्या नहीं कहना चाहिए।
तो लोकतंत्र नहीं बचेगा- जस्टिस ओका
‘चाहे भारी कीमत भी चुकानी पड़ जाए’
‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दी जाए’
उन्होंने तब प्रदर्शन रोकने के लिए निषेधाज्ञा लगाए जाने की आलोचना की। उन्होंने कहा, ‘कोई व्यक्ति बिना कोई अपराध किए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहता है, पुलिस को इसकी अनुमति देनी चाहिए। प्रदर्शन किसी भी बात को लेकर हो सकता है, जबतक कि यह संविधान के दायरे में कानून के तहत होने वाला प्रोटेस्ट है, अदालत की यह जिम्मेदारी है कि वह इसकी अनुमति दे।’






