नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओका का मानना है कि अगर सरकारें असहमति को अपराध की श्रेणी में रखना जारी रखती हैं तो भारत में लोकतंत्र खत्म होने का खतरा है। पूर्व जज ने संवैधानिक अदालतों से आग्रह किया कि वे ऐसे मामलों को खत्म करें और फ्री स्पीच को रोकना या दबाना बंद करें। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस ओका का कहना है कि जब मौलिक अधिकारों का सवाल हो तो प्रदर्शनकारियों या असहमति जताने वालों की बातों और भाषण के आधार पर अदालतें फैसला नहीं दे सकतीं।
‘कोर्ट का काम उपदेश देना नहीं’
बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1 अगस्त को मुंबई के केसी कॉलेज ऑडिटोरियम में एक कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में जस्टिस ओका ने अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर अपनी बातें सामने रखी हैं।
याचिकाकर्ता ने जो कहा या व्यक्त किया है, हो सकता है कि अदालत को पसंद न आए, लेकिन फिर भी बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना कोर्ट की ड्यूटी है। कोर्ट का काम यह नहीं है कि याचिकाकर्ता को उपदेश दे या सिखाए कि उसे क्या कहना चाहिए और उसे क्या नहीं कहना चाहिए।
तो लोकतंत्र नहीं बचेगा- जस्टिस ओका
जस्टिस ओका ने संविधान सभा में हुई बहस का हवाला देते हुए दावा किया कि संविधान निर्माताओं ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि जनता की मांगों को आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘इसलिए यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन और संवैधानिक दायरे में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकारों की बात है। और अगर हम लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके नाराजगी नहीं जाहिर करने देंगे तो लोकतंत्र नहीं बचेगा।’
‘चाहे भारी कीमत भी चुकानी पड़ जाए’
आयरलैंड के लेखक सर थॉमस मोर का जिक्र करते हुए जस्टिस ओका ने कहा कि नागरिकों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सिर्फ वही कहें, जो शासकों को पसंद हो। उनके मुताबिक, ‘अगर लोकतंत्र को जिंदा रहना है, हमें भारत के संविधान के आर्टिकल 19 (1)(ए) और आर्टिकल 21 के तहत अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। चाहे इन मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमें भारी कीमत भी चुकानी पड़ जाए।’
‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दी जाए’
जस्टिस ओका ने इस दौरान कर्नाटक में सीएए के खिलाफ बेंगलुरु में हुए एक प्रदर्शन का जिक्र किया।
उन्होंने तब प्रदर्शन रोकने के लिए निषेधाज्ञा लगाए जाने की आलोचना की। उन्होंने कहा, ‘कोई व्यक्ति बिना कोई अपराध किए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहता है, पुलिस को इसकी अनुमति देनी चाहिए। प्रदर्शन किसी भी बात को लेकर हो सकता है, जबतक कि यह संविधान के दायरे में कानून के तहत होने वाला प्रोटेस्ट है, अदालत की यह जिम्मेदारी है कि वह इसकी अनुमति दे।’
उन्होंने तब प्रदर्शन रोकने के लिए निषेधाज्ञा लगाए जाने की आलोचना की। उन्होंने कहा, ‘कोई व्यक्ति बिना कोई अपराध किए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहता है, पुलिस को इसकी अनुमति देनी चाहिए। प्रदर्शन किसी भी बात को लेकर हो सकता है, जबतक कि यह संविधान के दायरे में कानून के तहत होने वाला प्रोटेस्ट है, अदालत की यह जिम्मेदारी है कि वह इसकी अनुमति दे।’

