टांग खींचने नहीं, हाथ थामने की संस्कृति विकसित करें

दिनेश कुमार कुशवाहा

 

समाज के निर्माण और विकास में सबसे बड़ी भूमिका मनुष्य की सोच और उसके व्यवहार की होती है। आज हम सभी को ईमानदारी से एक प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए कि हम अपनी ऊर्जा और समय का कितना हिस्सा किसी को आगे बढ़ाने में लगाते हैं और कितना हिस्सा किसी को पीछे खींचने में। यदि हम निष्पक्ष होकर आत्मचिंतन करें तो पाएंगे कि कई बार हम अनजाने में ही दूसरों की आलोचना करने, उनकी कमियां खोजने और उनके प्रयासों को कमजोर करने में अपनी बहुमूल्य ऊर्जा खर्च कर देते हैं।

कल्पना कीजिए, यदि यही समय, यही ऊर्जा और यही क्षमता किसी व्यक्ति का हाथ पकड़कर उसे आगे बढ़ाने में लगाई जाए, तो उसका परिणाम कितना सकारात्मक और दूरगामी हो सकता है। एक व्यक्ति आगे बढ़ेगा तो उसका परिवार आगे बढ़ेगा, परिवार आगे बढ़ेगा तो समाज मजबूत होगा और समाज मजबूत होगा तो राष्ट्र का विकास होगा।

जब हम किसी की टांग खींचते हैं, उसे नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं या उसकी सफलता से ईर्ष्या करते हैं, तब हमें क्षणिक संतुष्टि अवश्य मिल सकती है। कुछ पल के लिए हमें ऐसा लग सकता है कि हमने किसी को रोक दिया या उसकी प्रगति में बाधा डाल दी। लेकिन यह संतुष्टि बहुत अल्पकालिक होती है। समय बीतने के बाद हमारा अपना जमीर हमसे सवाल करता है। मन के किसी कोने में यह एहसास बना रहता है कि हमने किसी का भला करने के बजाय उसे नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। यह भावना अंततः हमारे आत्मसम्मान को भी चोट पहुंचाती है।

इसके विपरीत, जब हम किसी का हाथ थामते हैं, उसे सहयोग देते हैं, उसका उत्साह बढ़ाते हैं और उसके संघर्ष में उसके साथ खड़े होते हैं, तब जो संतोष प्राप्त होता है वह केवल उस क्षण तक सीमित नहीं रहता। वह संतोष लंबे समय तक हमारे मन को शांति और तसल्ली प्रदान करता है। हमें गर्व होता है कि हमने किसी के जीवन में सकारात्मक भूमिका निभाई है। किसी की सफलता में हमारा भी एक छोटा-सा योगदान रहा है। यही भावना मानवता का सबसे सुंदर रूप है।

समाज में अक्सर यह कहा जाता है कि “कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है।” यह कहावत तब तक सच प्रतीत होती रहेगी, जब तक हम अपने जीवन में अपने शब्दों और कर्मों के बीच समानता स्थापित नहीं करेंगे। यदि हम दूसरों से सम्मान की अपेक्षा करते हैं तो हमें भी दूसरों का सम्मान करना होगा। यदि हम चाहते हैं कि संकट के समय लोग हमारा साथ दें, तो हमें भी दूसरों के कठिन समय में उनके साथ खड़ा होना होगा। यदि हम चाहते हैं कि समाज में प्रेम, सहयोग और भाईचारा बढ़े, तो उसकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी।

जीवन का एक सरल सिद्धांत है कि जो व्यवहार हमें अपने लिए अच्छा लगता है, वही व्यवहार हमें दूसरों के प्रति भी अपनाना चाहिए। जो शब्द हमें सुनकर प्रसन्नता होती है, वही शब्द हमें दूसरों के लिए भी प्रयोग करने चाहिए। जो सहयोग हमें कठिन समय में चाहिए, वही सहयोग हमें भी दूसरों को देने का प्रयास करना चाहिए। यही नैतिकता है, यही मानवता है और यही एक सभ्य समाज की पहचान है।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम दूसरों की गलतियां गिनाने में अपना समय व्यर्थ करें। आवश्यकता इस बात की है कि हम अच्छाइयों को पहचानें, प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करें और एक-दूसरे की उन्नति में सहभागी बनें। याद रखिए, किसी को गिराकर हम कभी बड़े नहीं बन सकते, लेकिन किसी को उठाकर अवश्य महान बन सकते हैं।

आइए, हम सभी मिलकर एक ऐसी संस्कृति का निर्माण करें जहां ईर्ष्या की जगह प्रेरणा हो, प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग हो और टांग खींचने की जगह हाथ थामने की परंपरा हो। यही मानवता का मार्ग है, यही नैतिकता का मार्ग है और यही एक बेहतर समाज के निर्माण का आधार है।

“किसी को गिराने में नहीं, किसी को उठाने में अपनी शक्ति लगाइए।
क्षणिक सुख से अधिक मूल्यवान वह संतोष है, जो किसी के जीवन में आशा और सहयोग का कारण बनता है।”

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