चिराग की ‘लौ’ पर भाजपा का ‘पारस’ पड़ा भारी

 एलजेपीआर में फूट की अटकलों के बीच क्या है बिहार की सियासत का सच?

दीपक कुमार तिवारी

पटना/नई दिल्ली। लगता है चिराग पासवान के होश ठिकाने आ गए हैं। भाजपा ने पेंच की एक ही चूड़ी कसी और वे जमीन पर आ गए। हाल के दिनों में अपने को नरेंद्र मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान ने उनके ही फैसलों की जिस तरह मुखालफत शुरू की थी, उससे लगता था कि भाजपा ने भस्मासुर पाल लिया है। एक के बाद एक वे मोदी सरकार के फैसलों का विरोध करते रहे। सामान्य समझ भी नहीं रही कि वे मोदी मंत्रिमंडल के ही सदस्य हैं। ऐसे में सरकार का हर फैसला मंत्रियों की सामूहिक जिम्मेदारी है। वे ऐसा करने लगे, जैसा उनके पिता ने गोधरा कांड के बाद मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर किया था। हालांकि वैसी हिम्मत चिराग न दिखा सके। वे तो पानी में रह कर ही मगरमच्छ से टकराना चाहते थे। इसके जरिए वे अपनी अलग पोलिटिकल आइडेंटिटी बनाना चाहते होंगे। पर, भाजपा ने पेंच कस दिया।
चिराग जब मोदी सरकार को आंखें दिखाने लगे, तब भाजपा ने भी अपनी त्यौरियां चढ़ाईं। एनडीए में अलग-अलग पड़े उनके चाचा पशुपति कुमार पारस की सुध लेनी भाजपा ने शुरू कर दी। बिहार प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल उनसे उनके कार्यालय में जाकर मिले। पारस को अमित शाह का दिल्ली से बुलावा आ गया। पारस ने अपने दूसरे भतीजे पूर्व सांसद प्रिंस राज के साथ अमित शाह से मुलाकात की। इसके साथ ही यह अफवाह उड़ी कि एलजेपीआर के तीन सांसद चिराग का साथ छोड़ सकते हैं। इससे चिराग तिलमिलाए जरूर होंगे। उसके बाद उन्होंने भी अमित शाह से मुलाकात की। चिराग पटना आए तो उनका सुर बदल गया था। वे उन मुद्दों पर मोदी के साथ दिखे, जिनकी उन्होंने विपक्षी सुर में सुर मिला कर आलोचना की थी। पार्टी में टूट की खबर को उन्होंने विपक्ष की ओर से फैलाई अफवाह करार दिया।
चिराग इतने में ही तिलमिलाए थे कि भाजपा ने उन पर एक और प्रहार कर दिया। भाजपा से ताल्लुक रखने वाले एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी याचिका लगा दी, जो उनके राजनीतिक करियर को चौपट करने के लिए काफी होगा। चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने और जानकारी छिपाने का उन पर आरोप है। याचिका में चिराग पर अपने खिलाफ दर्ज रेप केस, जमीन और पढ़ाई संबंधी ब्योरे छिपाने या गलत जानकारी देने की बात है। अगर ये बातें सच पाई गईं तो चिराग की लोकसभा सदस्यता भी जा सकती है। जाहिर है कि 10 साल के राजनीतिक करियर में चिराग को इतने दांव-पेंच से पहली बार सामना करना पड़ा होगा। 2021 में भी उन्हें ऐसे ही दांव-पेंच से जूझना पड़ा था, जब उनकी पार्टी टूट गई और वे अपने धड़े के इकलौते सांसद रह गए थे।
वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए तो चिराग ने एनडीए से अलग होकर 134 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। उन्होंने ऐसा करते समय भाजपा के प्रति तो नरमी बरती, लेकिन नीतीश को निशाने पर रखा। जेडीयू की सभी सीटों पर चिराग के उम्मीदवार थे। चिराग की वजह से जेडीयू को 38 सीटों पर हार झेलनी पड़ी। यानी जिस तरह चिराग ने जेडीयू से पंगा लिया था, उसी अंदाज में भाजपा से भिड़ने लगे थे। जेडीयू से भिड़ंत का परिणाम यह हुआ कि चिराग को लंबे समय तक एनडीए से अलग रहना पड़ा। मंत्री नहीं बन पाए। पिता को आवंटित बंगला छिन गया। एलजेपी दो हिस्सों में विभाजित भी हो गई। अपनी पार्टी में चिराग अकेले सांसद रह गए। विधानसभा में भी उन्हें सीट नहीं मिली।
चिराग बैकफुट पर आ गए हैं। पर, क्या भाजपा ने अब उन्हें अभयदान दे दिया है। यह सवाल इसलिए उठता है कि जिस पशुपति पारस के बारे में चिराग की पार्टी के सांसद अरुण भारती ने कहा था कि अब वे एनडीए में नहीं हैं, उनकी पूछ तो एनडीए में न सिर्फ होने लगी है, बल्कि बढ़ गई है। यह भाजपा की रणनीति हो सकती है। भाजपा चिराग की पार्टी को तोड़ने का दाग शायद अपने माथे नहीं लगाना चाहती हो। इसके लिए पशुपति पारस को भाजपा मोहरा बनाए और चिराग के होश ठिकाने लगा दे तो आश्चर्य नहीं।

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