लालू यादव को बिहार ने दिया तगड़ा सियासी झटका!

 पारंपरिक समीकरण दरकने से तेजस्वी परेशान

दीपक कुमार तिवारी

पटना। वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने शानदार प्रदर्शन किया था। सबसे बड़े दल के रूप में आरजेडी उभरा। तेजस्वी यादव ने पहली बार चुनाव की कमान संभाली थी। लालू तब जेल हिरासत में रांची के सरकारी अस्पताल रिम्स में इलाज के लिए भर्ती थे। यह लालू का ज्ञान था या तेजस्वी यादव का अपना निर्णय कि उन्होंने पूरे चुनावी कैंपेन पर मां-बाप की साया नहीं पड़ने दिया। यानी आरजेडी के बैनर, पोस्टर और तमाम प्रचार सामग्री में लालू-राबड़ी की तस्वीर तक नहीं लगने दी।

नवोदित की तरह तेजस्वी मैदान में उतरे और पहली बार में ही बड़ी कामयाबी हासिल कर ली। तब आरजेडी ने विधानसभा की 144 सीटों पर लड़ कर 75 जीत ली थीं। तेजस्वी के महागठबंधन में आरजेडी के अलावा कांग्रेस ने 70 सीटों पर लड़ कर 19, सीपीआई (एमएल) ने 19 पर लड़ कर 12, सीपीआई ने छह पर लड़ कर दो और सीपीआईएम ने चार पर लड़ कर दो सीटें जीती थीं। यानी महागठबंधन को 110 सीटें आ गईं।

बाद में तेजस्वी ने एआईएमआईएम के चार विधायकों को भी अपनी पार्टी के साथ जोड़ लिया।तेजस्वी की पॉलिटिकल ट्रेनिंग 2015 में शुरू हुई, जब महागठबंधन की बिहार में सरकार बनी। लेफ्ट पार्टियों और कांग्रेस के साथ आरजेडी ने 2015 में ही महागठबंधन बना लिया था। तब नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू भी महागठबंधन का ही हिस्सा थी।

महागठबंधन ने 2015 में सरकार बना ली थी। नीतीश के नेतृत्व में बनी सरकार में तेजस्वी यादव पहली बार डेप्युटी सीएम बने। हालांकि नीतीश ने 2017 में महागठबंधन से रिश्ता तोड़ लिया और भाजपा के साथ सरकार बना ली थी। नीतीश का साथ छूटने के बावजूद तेजस्वी ने जनता से रिश्ता बनाए रखा। इसका प्रतिफल तेजस्वी को 2020 के विधानसभा चुनाव में मिला। वे विधानसभा में सदस्यों की संख्या के हिसाब से एनडीए से आठ-नौ सीटों की कमी के कारण सरकार बनाने से चूक गए। पर, इतना तो उन्होंने साबित कर ही दिया कि वे बिहार की सियासत के सबसे तेज उभरते सितारा हैं।

तेजस्वी को बिहार का दूसरी बार डेप्युटी सीएम बनने का मौका तब मिला, जब नीतीश ने 2022 में उन्होंने नीतीश को पटा कर एनडीए से अलग करने में कामयाबी पा ली। उसके बाद वे 17 महीने तक नीतीश की सरकार में दूसरे ओहदे के मंत्री बने रहे। दूसरी बार वे डेप्युटी सीएम बने। नीतीश के साथ रह कर तेजस्वी ने राजनीति की कई तरह की बारीकियां भी सीख लीं।

नीतीश ने जब 2024 में तेजस्वी को झटका दे दिया तो वे बेरोजगार हो गए। इसका उन्होंने सदुपयोग किया। पर्याप्त समय मिला तो लोकसभा चुनाव के दौरान 200 से भी अधिक बिहार में चुनावी दौरे कर लिए। भीड़ भी उनकी सभाओं में खूब उमड़ी। वोट भी खासा मिले। पिछले लोकसभा चुनाव 2019 में आरजेडी को एक भी सीट नहीं मिली थी और वोट शेयर भी 15.4 प्रतिशत ही था। इस बार तेजस्वी यादव ने अपनी नेतृत्व क्षमता का कमाल दिखाया है।

लोकसभा चुनाव में पिछली बार से तकरीबन सात फीसद अधिक 22.14 प्रतिशत वोट आरजेडी को मिले हैं। यह पिछले मुकाबले सात फीसद अधिक है और इकलौती किसी भी पार्टी से ज्यादा है। आरजेडी का वोट शेयर तो बढ़ा, पर सीटें सिर्फ चार ही आईं। यह तेजस्वी की चिंता का बड़ा कारण है। दो दिनों तक आरजेडी ने लोकसभा चुनाव परिणामों की गहन समीक्षा की तो यकीनन इस पर चर्चा हुई होगी।

आरजेडी का पुराना और परखा जातीय समीकरण है मुस्लिम-यादव (M-Y)। यादव आबादी बिहार में करीब 14 फीसद है। मुस्लिम आबादी भी लगभग 18 फीसदी है। यानी आरजेडी के 32 प्रतिशत वोट ट्रेडिशनल हैं। इस बीच करीब पांच प्रतिशत आबादी वाली कुशवाहा जाति को भी आरजेडी ने लोकसभा चुनाव में आजमाया। आरजेडी का कुशवाहा प्रयोग सफल भी रहा। राजपूत और कुशवाहा वोटरों की जंग में एनडीए समर्थित आरएलएम प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा को हार का सामना करना पड़ा।

इस झगड़े की गूंज पड़ोस की अन्य संसदीय सीटों पर सुनाई पड़ी। शाहाबाद अंचल के नाम से मशहूर इस इलाके में एनडीए का सफाया हो गया। जाहिर है कि इन पांच सीटों पर ‘इंडिया’ में शामिल दलों को कामयाबी मिली। राजपूतों के गढ़ औरंगाबाद में पहली बार कोई कुशवाहा जीता, वह भी आरजेडी के टिकट पर। औरंगाबाद से अभय कुशवाहा खुद ही नहीं जीते, बल्कि पड़ोस की सीटों पर इंडिया को कामयाबी दिलाने में भी मदद की।

बहरहाल, आरजेडी के कोर वोटर में मुसलमान, यादव और कुशवाहा वोटों का सम्मिलित आंकड़ा 37 प्रतिशत है। मुकेश सहनी और वाम दलों की वजह से ओबीसी, ईबीसी और दलित वर्ग के भी कुछ वोट जरूर मिलना चाहिए, पर मिले 22 प्रतिशत। यानी आरजेडी के कोर वोटर में एनडीए ने सेंधमारी कर दी है।

पहले अनुमान था और अब यह बात पुष्ट हो गई है कि आरजेडी मुस्लिम और यादव वोटों का अकेला दावेदार नहीं रहा। अगर इन दोनों जातियों के पूरे वोट आरजेडी को मिले होते उसका वोट शेयर कम से कम 30-32 प्रतिशत होना चाहिए। इसकी दो वजहें हैं। अव्वल तो पूर्णिया में पप्पू यादव को इंडिया ब्लाक से ठिकाने लगा कर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने यादव बिरादरी को बांटने पर मजबूर कर दिया।

पप्पू के बारे में तेजस्वी का यह बयान कि आरजेडी उम्मीदवार को वोट नहीं दे सकते तो एनडीए प्रत्याशी को दे दें, यादवों के बिदकने का सबसे बड़ा कारण बना। मुसलमान तो पहले से ही इस बात को लेकर बिदके हुए थे कि टिकट बंटवारे में अधिक आबादी के बावजूद उनके साथ नाइंसाफी हुई। आरजेडी ने 17 प्रतिशत मुसलमानों के लिए लोकसभा में सिर्फ दो ही सीटें दी थीं। आरजेडी के राज्यसभा सांसद रहे अशफाक करीम ने इसी मुद्दे पर आरजेडी से इस्तीफा दे दिया।

सिवान में आरजेडी का ऑफर छोड़ कर शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। सिवान में इसका असर आरजेडी उम्मीदवार पर तो पड़ता ही, सारण प्रमंडल की दूसरी लोकसभा सीटों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। यानी टिकट न मिलने से नाराजगी, टिकट बंटवारे में मुसलमानों की उपेक्षा और पप्पू यादव के मुद्दे पर यादवों एक तबके की नाराजगी आरजेडी को इशारा कर गई कि मुसलमान और यादव पर आरजेडी अपना एकाधिकार न समझे। मत प्रतिशत से भी पता चलता है कि उसे उसके समीकरण के पूरे वोट नहीं मिले हैं।

तेजस्वी यादव की लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी सफलता यह है कि आरजेडी का वोट शेयर बढ़ा है। पिछली बार शून्य के मुकाबले इस बार चार सांसद भी हो गए। उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ कर इंडिया ब्लाक ने एनडीए से 10 सीटें भी छीन लीं। इनमें निर्दलीय पप्पू यादव की भी सीट भी शामिल है, क्योंकि वे लगातार कहते रहे हैं कि जीतने के बाद भी कांग्रेस के साथ ही रहेंगे। पर, तेजस्वी की असली परीक्षा 2025 के विधानसभा चुनाव में होनी है।

उन्हें MYK (मुस्लिम, यादव और कुशवाहा) समीकरण में दिख रहीं कमियां दूर करनी होगी। महिलाएं अब भी नीतीश कुमार की मददगार बनी हुई हैं। महिलाओं की वजह से ही नीतीश खराब हालत में भी लोकसभा की 12 सीटें जीतने में महिलाओं की बदौलत ही कामयाब रहे हैं। सीपीआई (एमएल) जैसे साथी की ताकत को पहचानना और उसी अनुरूप सीटें देना भी तेजस्वी की चुनौती होगी।

तीन सीटों पर लड़ कर सीपीआई (एमएल) ने दो जीत लीं। सिवान की सीट भी माले मांग रही थी। पर, उसकी बात नहीं सुनी गई। इससे माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य नाराज बताए जा रहे हैं। तेजस्वी दावा करते हैं कि बिहार का अगला सीएम वहीं बनेंगे। इसके लिए उनके पास सबसे बड़ा हथियार है रोजगार। लेकिन नीतीश कुमार जिस तरह रोजगार देने के उनके दावे पर पानी फेरने के प्रयास में हैं, वह तेजस्वी के लिए मुश्किल का सबब बन सकता है।

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