एक क्रांतिकारी योद्धा ऐसे भी

25 वर्षीय जीवन काल में बन गए लोकनायक, धार्मिक गुरु एवं आदिवासियों के भगवान।

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ उल गुलाल आंदोलन का किया आगाज और अबुआ दिसुम अबुआ राज (abua disum abua raj) “हमारा देश हमारा राज”का नारा दिया।

पवन कुमार 

आजादी के दीवानों का नेतृत्व की क्षमता रखने वालों में एक नाम जो बहुत कम याद किया जाता है और वह नाम है महान क्रांतिकारी,लोकनायक, धर्म गुरु,आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा।
अंग्रेजी शासन के दौरान जब झारखंड में सामंती व्यवस्था जड़े जमाने लगी और आदिवासियों की परंपरागत जमीनी व्यवस्था में दखल देकर नई स्थाई बंदोबस्ती से आदिवासियों के जीवन में आर्थिक शोषण और सामाजिक अशांति के बीज बो दिए थे, इस भयंकर दौर में मुंडा जनजाति में एक अनमोल रत्न का जन्म हुआ। जिसने 1857 के बाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहला महासंग्राम छेड़ा, और विदेशी हुकूमत को नकारते हुए विद्रोह किया जिसे ulgulal (अल गुलाल) आंदोलन का नाम दिया। बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों की लड़ाई का अपने तरीके से नेतृत्व किया, बिरसा मुंडे का योगदान इतना जबरदस्त था कि आदिवासी आज भी उन्हें भगवान के तरह पूजते हैं।
15 नवंबर 1875 को गांव उलिहातू रांची जिला बंगाल प्रेसीडेंसी वर्तमान पता खूंटी जिला झारखंड में एक सामान्य परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ जिसको माता कुर्मी मुंडा -पिता सिगमा मुंडा, द्वारा नाम मिला बिरसा मुंडा, बिरसा मुंडा के माता-पिता नागपुर पठार क्षेत्र की मुंडा जनजाति से आते थे और परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी, बिरसा मुंडा की प्रारंभिक शिक्षा सालग़ा गांव में जगपाल नाग की देखरेख में हुई, बिरसा मुंडा ने जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ाई पूरी करने के लिए ईसाई धर्म अपना लिया था।
जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ाई करते हुए उन्हें एहसास हुआ कि धर्मांतरण के मकसद से चल रहे हैं जर्मन मिशन स्कूल जिसमें शिक्षा के लालच वशीभूत कर आदिवासियों को ईसाई धर्म में बदलना चाहते हैं इस वजह से बिरसा मुंडा ने स्कूल एवं ईसाई धर्म छोड़ दिया और एक नया धर्म “पंथ” बिरसाइत की शुरुआत करी। जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ाई के दौरान बिरसा मुंडा को नाम बदलना पड़ा पहले उनका नाम बिरसा डेविड और बाद में बिरसा दारूद रखा गया। उनको एहसास हुआ कि ब्रिटिश सरकार एवं जमींदार और साहूकार उनके हक ओर अधिकार का हनन कर रहे हैं। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ-साथ जमींदार और साहूकारों के खिलाफ उल गुलाल (महा उत्पात) आंदोलन का आगाज कर दिया और नारा दिया “अबुआ दीशुम अबुआ राज”(हमारा देश हमारा राज) और यह नारा झारखंड और भारत के अन्य आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले मूल निवासियों के संघर्ष स्वाभिमान और अधिकार का प्रतीक बना, यह नारा आदिवासी समुदायों के स्वशासन, सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक संसाधनों उनके हक को रेखांकित करता है।
बिरसा मुंडे का संदेश – बिरसा मुंडे ने अपने अनुयायियों को संदेश दिया कि उनकी भूमि पर उनका अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा के लिए उनका संगठित होना अति आवश्यक है उनका “अल गुलाल” यानी (महा उत्पात) आंदोलन आदिवासियों को एकजुट करने और उनके हक की लड़ाई लड़ने का प्रतीक बना उल गुलाल इस विद्रोह का उद्देश्य मूल निवासियों को अपने संसाधनों पर अधिकार स्थापित करना था जिन्हें जमींदारों और साहूकारों से मिलकर ब्रिटिश अधिकारी उनसे छीन रहे थे। बिरसा मुंडा ने अपने अनुयायियों को नशा छोड़ने और साफ-सुथरा जीवन जीने की सलाह दी बिरसा मुंडा का नेतृत्व ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और आदिवासी समुदायों पर थोपी गई दमनकारी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध के आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता है भूमि अधिकार धार्मिक स्वतंत्रता और समानता का उनका संदेश आदिवासी समुदायों में गूंज उठा और आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला।
बिरसा मुंडा ईसाई धर्म छोड़कर क्यों बने योगी -? जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ाई करते हुए बिरसा मुंडा को एहसास हुआ कि धर्मांतरण के मकसद से चल रहे जर्मन मिशन स्कूल में शिक्षा के नाम पर अंग्रेज आदिवासियों को ईसाई धर्म में बदलना चाहते हैं इस वजह से बिरसा मुंडा ने स्कूल और ईसाई धर्म दोनों ही छोड़ दिए और एक नया पथ (धर्म) शुरुआत करी जिसे “बिरसाइत” नाम दिया।
बिरसा मुंडा एक स्वतंत्रता सेनानी धार्मिक नेता और लोकनायक थे जिन्हें आदिवासी धरती आबा (भूमि का पिता) और अपना भगवान मानते हैं जिन्हें शताब्दी के बाद आज भी आदिवासी भगवान की तरह पूजते हैं, जिन्हें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आदिवासी विद्रोह का नेतृत्व करने वाले महान क्रांतिकारी के रूप जाना जाता है।
तीर कमान के धनी बिरसा मुंडा को 24 अगस्त 1898 को चप्लाई गांव से सोते समय ब्रिटिश सरकार द्वारा कई साथियों के साथ बरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया,9 जून 1900 में रांची के कारागार में उनकी मृत्यु हुई थी, अंग्रेजों के द्वारा मृत्यु का कारण हैजा बताया गया लेकिन उनके साथियों का मानना था कि उनको जहर दिया गया था,सही जानकारी नहीं है।
जनजातीय गौरव दिवस -बिरसा मुंडा की जयंती के 150 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने हर साल 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाए जाने का ऐलान किया।ओर बिरसा मुंडा के नाम से एक स्मारक सिक्का भी जारी किया, वही दिल्ली सराय काले खां एस आई बी टी चौक का नाम बदलकर बिरसा मुंडा चौक किया गया।आज भी सदन संग्रहालय में बिरसा मुंडा की तस्वीर लगी हुई है।
बिरसा मुंडा ने आंदोलन के साथ-साथ धर्म और नीति के उपदेश भी देने शुरू किया उनके उपदेशों का इतना प्रभाव पड़ा उनके अनुयाई “बिरसाईत”कहलाए जाने लगे।

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