दिल्ली में कैसे घटीं बेट‍ियां, क्या चोरी-छुपे जेंडर टेस्टिंग और अबॉर्शन जारी है?

दिल्ली में बेटियों की “गायब” होने की समस्या मुख्य रूप से जन्म के समय लिंगानुपात (सेक्स रेशियो) में लगातार गिरावट से जुड़ी हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024 में दिल्ली में हर 1,000 लड़कों पर केवल 920 लड़कियां पैदा हुईं, जो 2023 के 922 से और कम है। यह गिरावट लगातार चौथे साल दर्ज की गई है, जो 2021 के 928 से शुरू होकर तेजी से नीचे आ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह अवैध जन्मपूर्व लिंग निर्धारण परीक्षण (जेंडर टेस्टिंग) और भ्रूण हत्या (सेक्स सिलेक्टिव अबॉर्शन) की वजह से हो रहा है।

क्या चोरी-छुपे जेंडर टेस्टिंग और अबॉर्शन जारी है?

हां, विशेषज्ञों और रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में अवैध तरीके से ये प्रथाएं अभी भी जारी हैं। पीसीपीएनडीटी एक्ट (प्रिवेंशन ऑफ चाइल्ड मरीजन एंड प्रीनेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स एक्ट) के बावजूद, अल्ट्रासाउंड सेंटर्स और क्लिनिक्स में गुप्त रूप से लिंग परीक्षण हो रहे हैं। दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने इसे “चिंताजनक” बताया है, लेकिन कार्रवाई में कमी के सवाल उठ रहे हैं। उदाहरण के लिए:

2024 में हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों में भी लिंगानुपात गिरा है (आठ सालों में सबसे खराब), जो दिल्ली के साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि लोग सीमा पार जाकर ये काम करवाते हैं। हालिया रिपोर्ट्स में उल्लेख है कि चिकित्सा समुदाय में स्व-नियमन की कमी के कारण ये प्रथाएं फल-फूल रही हैं।

इसके अलावा, बेटियों की “गायब” होने का एक अन्य पहलू मानव तस्करी और अपहरण भी है। 2025 के पहले छह महीनों में दिल्ली से 788 बच्चियां और 4,753 महिलाएं लापता बताई गईं, जिनमें से कई का संबंध तस्करी और जबरन वेश्यावृत्ति से जोड़ा जा रहा है। हालांकि, मुख्य समस्या जन्म स्तर पर ही है, जहां बेटियों को जन्म ही न देने की प्रवृत्ति समाज में बेटे की चाहत से उपजी है। सरकार की ओर से ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता के साथ-साथ सख्त निगरानी और कानूनी कार्रवाई बढ़ाने की जरूरत है। अगर यह रुझान जारी रहा, तो 2030 तक भारत में करोड़ों कम लड़कियां पैदा हो सकती हैं। समाज को बेटी-बेटे में भेदभाव खत्म करने की दिशा में सोचना होगा।

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