महिलाओं के शोषण के लिए खुद महिलाएं भी कम नहीं हैं जिम्मेदार !

चरण सिंह राजपूत 

हिला दिवस पर महिला सशक्तिकरण के साथ ही महिलाओं की दुर्दशा के बारे में भी कार्यक्रम होते हैं लेख लिखे जाते हैं। सरकारें भी महिलाओं के उत्थान के लिए तरह तरह के दावे करती हैं। पर देखने में आता है कि आज भी महिलाओं के शोषण के साथ ही उनके साथ बड़े स्तर पर लैंगिक भेदभाव होता है। वैसे भी आर्थिक अवसरों, राजनीति, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी को आधार बनाने वाली वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 भारत में स्त्रियों की उत्तरोत्तर दयनीय को इंगित करती प्रतीत होती है। महिलाओं के मामले में हम विगत वर्ष की तुलना में 28 पायदानों की गिरावट के साथ 156 देशों में 140 वें स्थान पर पहुंच गए हैं। हालांकि इस गिरावट के लिए कोविड जन्य परिस्थितियों को उत्तरदायी माना गया है। लिंकेडीन अपॉर्चुनिटी इंडेक्स दर्शाता है कि कोविड-19 का नकारात्मक प्रभाव भारत की महिलाओं पर शेष विश्व की महिलाओं की तुलना में अधिक पड़ा। उन्हें एशिया प्रशांत देशों में सर्वाधिक लैंगिक भेदभाव झेलना पड़ा और वे समान वेतन तथा समान अवसरों के लिए संघर्ष करती नजर आईं। मतलब किसी न किसी रूप में महिलाओं के शोषण झेलना ही पड़ता है। देश में महिलाओं के उत्थान और सुरक्षा के कितने भी दावे किये जाते रहे हों पर महिलाओं का शोषण बदस्तूर जारी है। है शोषण किसी भी प्रकार का हो सकता है। मानसिक और दैहिक शोषण की बातें प्रमुखता से सुनने और पढ़ने में मिलती हैं। महिलाओं के शोषण के लिए पुरुष प्रधान समाज को ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या महिलाओं के शोषण के लिए बस पुरुष ही जिम्मेदार हैं। यदि महिलाओं के शोषण और हालात पर मंथन करें तो इसके लिए पुरुषों से कम जिम्मेदार महिलाएं नहीं हैं। चाहे आफिसों का मामला हो, सार्वजनिक स्थलों का मामला हो या फिर घरों का। महिलाओं को विभिन्न प्रकार के शोषण का सामना करना पड़ता है। यह भी जमीनी हकीकत है कि अक्सर महिलाओं के शोषण और भेदभाव में खुद दूसरी महिलाओं की भी बड़ी भूमिका होती है। अक्सर देखने में आता है कि महिला के  शोषण में दूसरी महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं। कई मामलों में खुद महिलाएं भी सक्रिय होती हैं। यदि कोई महिला अपने साथ होने वाले शोषण के विरोध में खड़ी होती है तो उसे खुद महिलाओं का साथ बहुत कम मिलता है। देखने में आता है कि उसके ईद-गिर्द रहने वाली महिलाएं या तो चुप्पी साध लेती हैं या फिर निजी स्वार्थ में शोषण करने वाले व्यक्ति का ही साथ देने लगती हैं। कई मामले में तो महिला का शोषण भी कोई महिला ही कराती है या फिर करती है।

घरेलू हिंसा में भी सास, जेठानी, देवरानी, ननद जैस रिश्ते में रहने वाली महिलाएं ज्यादा जिम्मेदार मानी जाती हैं। ऐसे ही हाल आफिस में भी है। आफिस में काम करने वाली महिलाएं सब कुछ जानकर भी संबंधित महिला को उसके हालात पर छोड़ देती हैं। कई मामलों में तो कोई महिला ही किसी महिला को शोषण के लिए विवश करती है या फिर उसे फंसाती है। मी टू अभियान में कितने पुरुषों पर दैहिक शोषण के आरोप लगे। काफी दिनों तक अभियान भी चला। कई महिलाओं ने बेबाकी से आरोप भी लगाए पर क्या हुआ ढाक के तीन पात ? कार्यक्षेत्रों और अन्य व्यवसायिक संस्थानों में महिलाओं के साथ होने वाला शारीरिक शोषण आज के समय की एक दुखद और कटु हकीकत है। करियर को उंचाई पर ले जाने का लालच या फिर नौकरी छिन जाने का डर, महिलाओं के साथ होने वाली ऐसी निंदनीय वारदातों का कारण बनता है। हमारे देश में महिलाओं के साथ होने वाले दुराचार को ही बलात्कार की श्रेणी में रखा जाता है। कई मामलों में तो परिवार के लोग ही परिवार की किसी महिला का शोषण कराते हैं। इसमें घर की महिलाएं भी सक्रिय होती हैं। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में धड़ीचा कुप्रथा प्रथा देश का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस जिले में आज भी कितने गांव में बहू बेटियों को किराये की पत्नी के रूप में बेचा जाता है। बाकायदा स्टाम्प पेपर पर एक एग्रीमेंट भी होता है। इस कुप्रथा में घरों की महिलाएं भी बराबर का साथ दे रही हैं। यदि जिला प्रशासन खोजबीन करता है तो खुद महिलाएं ही मामले को दबा लेती हैं। बाकायदा भेड़ बकरियों की तरह लड़कियों और महिलाओं को किराए पर देने के लिए हर साल मंडी सजती है।  दूर-दूर से खरीदार अपने लिए पत्नी किराए पर लेने के लिए यहां आते हैं।

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