चरण सिंह
देश में बहुत से लोग इस गलत गहमी में जी रहे हैं कि वे बड़े नेता हैं उनके बिना आंदोलन नहीं हो सकता। ऐसे बहुत नेता देश में घूम रहे हैं कि वे ही हक की लड़ाई लड़ने वाले महारथी हैं। यह बात समझने की है कि अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है। नेता तो लड़ाई को भुनाने आ जाते हैं। नोएडा के श्रमिक आंदोलन ने दिखा दिया कि आंदोलन के लिए संकल्प, जज्बे और एकता की जरूरत होती है।
नोएडा के आंदोलन में कौन नेता था? कौन आंदोलन की अगुआई कर रहा था ? कोई न। देश में बहुत से लोग सेमिनार, सभा, पंचायत कर सोच रहे हैं कि वे ही बदलाव के लिए बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। ये सब वे लोग हैं जो जेल जाने से डरते हैं। डंडे खाने से डरते हैं। कहते हैं कि यह सरकार तो गंभीर धाराओं में जेल भेज देती है। बात करेंगे लोहिया, जेपी, अंबेडकर, चंद्रशेखर, चरण सिंह, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद की और डरेंगे एफआईआर और जेल जाने से। बात करेंगे बदलाव की। नोएडा में 8-10 हजार रुपए प्रतिमाह कमाने वाले युवा एफआईआर से नहीं डरे जेल जाने से नहीं डरे। इसलिए इनकी बात सुनी जा रही है। सरकार को इनकी मांगें माननी ही होगी। नहीं तो स्कूल, मीडिया और दूसरी संस्थाओं में भी आंदोलन भड़क सकता है।
कुछ करेंगे नहीं। पर बात करेंगे संधियों की सरकार को बदलने की। दिलचस्प बात यह है कि अब बदलाव का दंभ भरने वाले इन नेताओं को हर सुख सुविधा चाहिए। कुछ लोग इनकी चाटुकारिता और चापलूसी करने के लिए भी चाहिए। वातानुकुलित कमरे मीटिंग करने, रहने और सोने के लिए चाहिए। अंग्रेजों के मुखबिर, आजादी की लड़ाई से दूर रहने वाले संघी इसलिए देश पर राज कर रहे हैं क्योंकि समाजवादी आराम तलबी और स्वार्थी हो गए हैं और वामपंथी अपने रास्ते से भटक गए हैं। यदि देश और समाज के लिए कुछ करना चाहते हो। देश में बदलाव चाहते हो तो हर सुख और सुविधा छोड़नी पड़ेगी। नहीं तो महिलाओं की किट्टी पार्टी की तरह कार्यक्रम करते रहो। चाय बिस्कुट खाकर घर लेटो रहो। देश को लूटते देखते रहो। बच्चों का भविष्य बर्बाद होते देखते रहो। कुछ नहीं होगा। विधवा विलाप करने से कुछ नहीं होगा। बदलाव के लिए सड़कों पर उतरना होगा । लाठी डंडे खाने पड़ेंगे। क्रांति करनी पड़ेगी।








