जब पी एम पुजारी बन जाते हैं, तो धर्मनिरपेक्षता ‘पंडाल’ बन जाती है

कैप्टन अमर जीत कुमार (सेवानिवृत्त)

(ट्रिब्यून को पत्र)

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से. नि.)

यह PM और श्री सोमनाथ ट्रस्ट के चेयरमैन के लेख के संदर्भ में है। PM मोदी, श्री सोमनाथ ट्रस्ट के चेयरमैन के तौर पर, ‘सोमनाथ की आस्था और जुझारूपन की गाथा’ की बात करते हैं और अगले हज़ार दिनों के लिए विशेष पूजा की घोषणा करते हैं। एक हज़ार दिन। यानी 2 साल 9 महीने। बड़ी आसानी से, इसमें अगले मुश्किल विधानसभा चुनाव भी शामिल हो जाते हैं। क्या यह महज़ एक इत्तफाक है? एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रधानमंत्री, और एक मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन। यह कैसे मुमकिन है? संविधान का अनुच्छेद 27 कहता है कि राज्य किसी भी धर्म के लिए टैक्स लगाने को मजबूर नहीं कर सकता। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म की आज़ादी देता है। संविधान कहता है कि सरकार का कोई धर्म नहीं होता। तो फिर, एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का मुखिया होने के बावजूद, प्रधानमंत्री एक हिंदू मंदिर ट्रस्ट का नेतृत्व कैसे कर सकते हैं? अगर PM सोमनाथ के चेयरमैन बन सकते हैं, तो अजमेर दरगाह के सज्जादानशीन क्यों नहीं? स्वर्ण मंदिर के ट्रस्टी क्यों नहीं? वेटिकन के संपर्क अधिकारी क्यों नहीं? आप 140 करोड़ लोगों के PM और किसी एक के पुजारी, दोनों एक साथ नहीं हो सकते। यह बहुलवाद नहीं है। यह तो ‘पंडाल की राजनीति’ है।

आस्था अच्छी बात है। लेकिन आस्था को चुनावी कैलेंडर की तरह इस्तेमाल करना सही नहीं: सोमनाथ की गाथा सच्ची है। महमूद गज़नवी ने इसे तोड़ा था। सरदार पटेल ने इसे फिर से बनवाया। आस्था ज़िंदा रही। जुझारूपन ज़िंदा रहा। लेकिन PM को चेयरमैन बनाना और ‘हज़ार दिनों की पूजा’ की घोषणा करना, आस्था की बात नहीं है। यह तो ‘सही समय’ (timing) की बात है। अगले 1000 दिन = मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव।

इस जुड़ाव को समझने के लिए आपको किसी चुनाव-विशेषज्ञ (psephologist) होने की ज़रूरत नहीं है। आपको बस एक कैलेंडर चाहिए। जब आस्था को वोटों के लिए ‘काउंटडाउन टाइमर’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो वह आस्था नहीं रह जाती। वह तो ‘वोट बैंक की पूजा’ बन जाती है। धर्मनिरपेक्ष सरकार का कोई धर्म नहीं होता; PM को भी इसी तरह पेश आना चाहिए: अगर सरकार का कोई धर्म नहीं होता, तो उसके मुखिया का भी कोई ‘आधिकारिक धर्म’ नहीं हो सकता। आप सुबह संविधान की शपथ लें, और शाम को मंदिर ट्रस्ट के लेटरहेड पर आशीर्वाद लें, और फिर यह दावा करें कि ये दोनों बातें एक ही हैं—ऐसा नहीं हो सकता। एक आपका ‘कर्तव्य’ है। दूसरा आपकी ‘आस्था’ है। इन दोनों को आपस में मिला देंगे, तो आपको ‘राम राज्य’ नहीं मिलेगा। बल्कि आपको सिर्फ़ ‘सत्ता का राज’ मिलेगा। सोमनाथ का असली सबक है ‘जुझारूपन’, न कि सिर्फ़ ‘रीति-रिवाज’: सोमनाथ हमें यह सिखाता है कि 17 बार हमले होने के बाद भी, आस्था फिर से खड़ी हो गई। और ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि उस समय का राजा ही पुजारी भी था। लेकिन इसलिए कि लोगों ने फिर से निर्माण किया। आज हमें PM की ज़रूरत 1000 दिनों तक पूजा का आयोजन करने के लिए नहीं है। हमें PM की ज़रूरत 1000 दिनों तक रोज़गार का आयोजन करने के लिए है। 1000 दिनों तक MSP का आयोजन करने के लिए। 1000 दिनों तक अग्निवीर पेंशन का आयोजन करने के लिए। मंदिर तो खड़ा रहेगा। लोगों को भी खड़ा रहना होगा। अगर आप चेयरमैन बनना चाहते हैं, तो PM पद से इस्तीफ़ा दे दें: भक्त बनें। ट्रस्टी बनें। हिंदू बनें। कोई दिक्कत नहीं। लेकिन ऐसा करते समय PM न बनें। क्योंकि जब आप लाल क़िले से बोलते हैं, तो 140 करोड़ लोग सुनते हैं। मुसलमान सुनता है ‘1000 दिनों तक पूजा’। ईसाई सुनता है ‘क्या अगला त्योहार हमारा है?’। नास्तिक सुनता है ‘संविधान तो बस दिखावे के लिए था’। सरदार पटेल ने सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया था। उन्होंने खुद को चेयरमैन नहीं बनाया था। यही फ़र्क होता है एक राजनेता और एक प्रचारक में। सोमनाथ की गाथा आस्था है। आपका कैलेंडर राजनीति है। एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का PM किसी एक मंदिर का चेयरमैन नहीं हो सकता। अगले 1000 दिन संविधान की पूजा के लिए होने चाहिए, न कि चुनाव प्रचार के लिए।

अगर आप सोमनाथ से प्यार करते हैं, तो सोमनाथ को सोमनाथ ही रहने दें। उसे पोलिंग बूथ न बनाएँ।

कैप्टन अमर जीत कुमार (सेवानिवृत्त)

पर्यावरणविद्

मनोचिकित्सक

खरड़ (पंजाब)

 

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