अटल बिहारी वाजपेयी के संबोधित करते हुए दिखा दिया था आक्रामक रुख, चंद्रशेखर के बीच में टोकने का कर दिया था विरोध
चरण सिंह
आज की राजनीति में भले ही दूसरी पार्टियों के बड़े नेताओं का सम्मान करने की प्रवृति दलों में खत्म होती जा रही है पर भारतीय राजनीति में वैचारिक लड़ाई होती थी। व्यवहारिक रूप से नेता दूसरी पार्टियों के बड़े नेताओं का सम्मान करते थे। समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया वैचारिक रूप से खुलकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू विरोध करते थे पर जवाहर लाल नेहरू डॉ. लोहिया को विशेष सम्मान देते थे।
यह परम्परा सभी पार्टियों में देखी जाती थी। इसी तरह का पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह का एक किस्सा बहुत चर्चित है। दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी से वैचारिक विरोध होने के बावजूद चंद्रशेखर उनका बहुत सम्मान करते थे। उन्हें गुरु जी कहकर संबोधित करते थे। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी के बोलते समय आक्रामक रुख दिखाने पर उन्होंने शरद यादव और राम विलास पासवान की क्लास लगा दी थी।
दरअसल ‘बलिया के शेर’ के नाम से मशहूर चंद्रशेखर सिंह द्वारा शरद यादव और रामविलास पासवान को संसद में आड़े हाथों लेने की घटना भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित किस्सों में से एक है। यह घटना उस समय की है 80 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर दी थी। जब मंडल आयोग लागू होने के बाद राजनीति में काफी उबाल था। आरक्षण विरोधी आंदोलन देशभर में सुलग रहा था। बहस के दौरान शरद यादव और रामविलास पासवान अटल बिहारी वाजपेयी के सामने काफी आक्रामक तरीके से अपनी बात रख रहे थे। उस समय चंद्रशेखर सिंह जनता पार्टी के अध्यक्ष थे और वरिष्ठ नेता के तौर पर सदन में मौजूद थे।
चंद्रशेखर ने दोनों युवा नेताओं शरद यादव और रामविलास का व्यवहार देखकर हस्तक्षेप किया और कहा, “शरद, रामविलास… तुम्हारे पिछले जन्म के कुछ पुण्य हैं कि तुम्हें अटल जी को सुनने का मौका मिल रहा है… ध्यान से सुनो, ये राजनीति के महाग्रंथ हैं”। क्योंकि समाजवादी विचारधारा से जुड़े नेता चंद्रशेखर सिंह को अध्यक्ष जी के नाम से संबोधित करते थे तो शरद यादव ने तुरंत टोकते हुए कहा – अध्यक्ष जी आप बीच में मत बोलिए।
शरद यादव का यह रवैया देखकर चंद्रशेखर भड़क गए। उन्होंने लोकसभा में कड़कती आवाज में कहा, “मुझसे ऐसी भाषा में बात करते हो? संसद के बाहर बोलकर दिखाओ शरद… मैं यकीन दिलाता हूं, तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों में भी कोई गुंडा पैदा नहीं होगा”। उस समय चंद्रशेखर के इस रौद्र रूप और कड़क डांट के बाद सदन में सन्नाटा छा गया था। कहते हैं कि संसद के बाहर निकलते ही दोनों नेताओं ने चंद्रशेखर जी से माफी मांगी थी। यह किस्सा यह दर्शाता है कि चंद्रशेखर अपनी उम्र और अनुभव के दम पर कितने कद्दावर नेता थे और राजनीति में वरिष्ठों का सम्मान न करने पर किस तरह कड़ी प्रतिक्रिया देते थे।








