आदित्य कुमार
आदमी की दृष्टि पर निर्भर है कि चीजें कैसी दिखाई पड़ती है जो आदमी जैसा भीतर होगा वैसे ही बाहर दिखाई पड़ेगा और वैसा ही करेगा। अगर आदमी अंदर से जाति मुक्त है तो वह जाति मुक्त समाज का निर्माण करेगा अगर आदमी धार्मिक कट्टरता से मुक्त है तो वह आदमी धार्मिक कट्टरता से मुक्त समाज का निर्माण करेगा या दूसरे शब्दों में कहा जाए अगर आदमी अंदर से जातिवादी है या फिर संप्रदाय वादी है वह समाज को घृणा व नफरत की ओर ले जाएगा उसे चारों ओर नफरत ही दिखाई देगी और नफरत का जवाब नफरत से देगा। अगर आदमी जाति से मुक्त सांप्रदायिकता से मुक्त तो वह प्रेम का संचार करेगा तथा बंधुता को मजबूत करेगा क्योंकि उसे चारों ओर प्रेम बंधुता ही दिखाई पड़ रही है। प्रेम हमें जोड़ता है जबकि नफरत हमें लोगों से अलग करती है और सारा जगत शत्रु हो जाता है
हिटलर अपने दोस्तों को भी रात अपने कमरे में सोने नहीं देता था निकटतम मित्र भी हिटलर के कमरे में नहीं सो सकता था क्योंकि डर की कहानी रात को गार्डन ना दबा दे हिटलर सारी जिंदगी अकेला सोया एक स्त्री को भी उसने कभी इतना प्रेम नहीं किया कि वह उसके पास अकेले सो सके कोई भी स्त्री जहर पिला सकती है गर्दन दबा सकती है गोली मार सकती है इतना हृदय गर्दा से भरा था हिटलर ने अकेले एक आदमी ने एक करोड़ आदमियों की हत्या की जर्मन में तो जिस आदमी ने एक करोड़ आदमी मारे, वह किसी आदमी पर कैसे विश्वास कर सकता है और कैसे करेगा उसे तो हर आदमी में हत्यारा दिखाई पड़ेगा यह कहीं मन ना डालें हिटलर ने 12 वर्षों में एक बार खाना नहीं खाया जो पहले कुत्तों को ना खिलाया गया हो एक बार पानी नहीं पिया पहले दूसरे आदमी को पानी पिलाकर ना देखा गया हो रात सारे ताले लगाकर चाबी अपने बिस्तर के पास रखकर सोता रहा रात भी डरा हुआ है दिन भी डरा हुआ है जिसके मन में घृणा हिंसा है सारा जगत उसके लिए शत्रु हो जाता है।
स्टालिन ने रूस में अंदाजन 30 लाख से 60 लाख लोगों की हत्या की फिर वह इतना पड़ा गया कि स्टालिन को अपनी शक्ल सूरत का एक आदमी खोजना पड़ा एक डबल खोजना पड़ा क्योंकि जब रास्तों पर निकले स्वभाव में जाए मिलिट्री प्लेट में सलामी ले तब कोई गोली ना मार दे तो बड़ी अद्भुत बात स्टालिन तो अपने घर में ही बंद रहता था उसकी शक्ल सूरत का आदमी परेड में सलामी लेता था मीटिंग में जाकर भाषण करता था गोली लग तो उसको लगे भाषण स्टालिन का तैयार किया हुआ होता था भाषण देने वाला आदमी मंच पर दूसरा होता था गोली लग तो उसको लागे मारे तो वह मरे बड़ी हैरानी की बात है आदमी स्टालिन जिंदगी भर यही कोशिश किया कि हजारों लोगों को ताली बजाते देखा लेकिन हिंसा और घृणा ने यह हालत कर दिया ताली बजाते हुए दूसरा आदमी देखा था स्टालिन खुद भीड़ में खड़ा नहीं हो सकता था दुनिया में जितना भी उपद्रव है वह आदमी के अंदर विभाजनकारी प्रवृत्ति के कारण है इसीलिए जब कोई व्यक्ति अंदर से जातिवादी या संप्रदायवादी है जितना भी चाहे वह बंधुता की बात करें इसका असर नहीं होता भारतीय समाज बहुत जटिल समाज है उसे जाति, संप्रदायवाद से मुक्त करने के लिए सबसे पहली शर्त है कि व्यक्ति स्वयं को इन विभाजनकारी प्रवृत्तियों से मुक्त करना होगा तभी समाज में करुणा प्रेम,अहिंसा,अवैर, का प्रसार होगा और समाज में शांति स्थापित होगी तभी जनता में मानव बोध होगा।








