संसद में पेश होने से पहले ही वंदे मातरम बिल पर छिड़ गई बहस, कांग्रेस ने बताया संविधान के खिलाफ

Parliament Monsoon Session: संसद का मानसून सत्र जल्द ही शुरू होने वाला है. इस सत्र में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम का अपमान करने या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय अपराध बनाने को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से एक प्रस्तावित विधेयक को पेश किया जाना है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस प्रस्तावित बिल को मानसून सत्र के पहले दिन यानी सोमवार (20 जुलाई, 2026) को राज्यसभा में पेश करने वाले हैं, लेकिन बिल के संसद में पेश होने से पहले ही इस पर बहस छिड़ चुकी है.

विपक्षी कांग्रेस ने इस प्रस्तावित विधेयक को संविधान के खिलाफ करार दिया है. वहीं, सरकार का कहना है कि अगर यह बिल कानून बनता है, तो राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को भी कानूनी संरक्षण उसी तरह मिलेगा, जैसा फिलहाल राष्ट्रगान जन गण मन को प्राप्त है.

 

जबरदस्ती थोपना उचित नहीं- कांग्रेस

 

कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने ‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी विवाद पर कहा, ‘वंदे मातरम के पहले सिर्फ दो अंतरों (अंतरों/पदों) को ही आधिकारिक मान्यता प्राप्त है. मैं मुस्लिम हूं और मैं वंदे मातरम कहता हूं, लेकिन पूरे गीत का पाठ करने पर जोर देना गलत है.’ उन्होंने कहा, ‘भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और संविधान के खिलाफ कुछ भी नहीं किया जा सकता है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी शाखाओं में राष्ट्रगान जन गण मन की जगह जानबूझकर पूरा वंदे मातरम गाता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अगर यह विधेयक संसद से पारित हो जाता है, तो भविष्य में वंदे मातरम का अपमान करना या उसके गायन में जानबूझकर व्यवधान डालना कानूनन अपराध माना जाएगा. सरकार के इस कदम ने एक नई बहस छेड़ दी है. क्या राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े प्रतीकों की रक्षा के लिए सख्त कानून जरूरी है? या सम्मान जागरूकता और सहमति से ही सुनिश्चित होना चाहिए.’

 

वंदे मातरम बिल पर क्या है सरकार का तर्क?

 

वहीं, दूसरी तरफ केंद्र की भाजपा सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बिल के अनुसार राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन कर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को भी शामिल किया जाएगा. यानी अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम के गायन को रोकता है, उसमें व्यवधान पैदा करता है या उसका अपमान करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी. दरअसल, सरकार का तर्क है कि संविधान सभा में 24 जनवरी, 1950 को तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वंदे मातरम को जन गण मन के समान सम्मान प्राप्त होगा. हालांकि, अभी तक ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है, जो वंदे मातरम के अपमान या उसके गायन में बाधा डालने पर कार्रवाई सुनिश्चित करता हो. इसी कमी को दूर करने के लिए यह संशोधन प्रस्तावित किया गया है.

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