क्या होगा इस देश का? आप सांसद ने उद्योगपतियों के खिलाफ आवाज क्या उठा दी कि उसकी खुद की पार्टी ही उसकी दुश्मन बन गई। मतलब जनहित के मुद्दे न उठाकर पार्टी के मुद्दे ही उठाते रहो। आप नेता कह रहे हैं राघव पार्टी से जुड़े मुद्दों पर नहीं बोल रहे थे। भाई आम आदमी के मुद्दे तो उठा रहे थे। इसलिए ही तो आप लोगों ने पार्टी बनाई है। कुछ तो शर्म करो। बोलो बीजेपी से बढ़ती नजदीकियों की वजह से उन पर एक्शन लिया गया है। जमीनी हकीकत यह है केजरीवाल भी पूंजीपतियों के दम पर पार्टी चला रहा है।
राघव चड्ढा (आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद) ने संसद में मुख्य रूप से आम जनता, मिडिल क्लास और रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। हाल ही में AAP के अंदर विवाद के दौरान उन्होंने खुद इन मुद्दों का वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि इन्हें उठाने की वजह से ही उन्हें पार्टी का उपनेता पद से हटाया गया।
मुख्य मुद्दे जो राघव चड्ढा ने राज्यसभा में उठाए
खाने में मिलावट (फूड अडल्टरेशन): देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट (यूरिया आदि), स्वास्थ्य पर इसका असर, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए खतरा। स्वास्थ्य सेवाएं: “एक राष्ट्र, एक स्वास्थ्य उपचार” की वकालत, निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल और आम लोगों की निर्भरता कम करने की मांग की।
मिडिल क्लास पर टैक्स बोझ: इनकम टैक्स, विवाहित जोड़ों के लिए संयुक्त आयकर फाइलिंग का विकल्प, और आम आदमी पर बढ़ता आर्थिक बोझ। पैटरनिटी लीव (पितृत्व अवकाश): पुरुषों के लिए पैटरनिटी लीव की मांग, मेनस्ट्रुअल हेल्थ (मासिक धर्म स्वास्थ्य) को डिग्निटी और शिक्षा से जोड़कर उठाया। राघव चड्ढा ने अन्य मुद्दों में पेपर लीक और युवाओं का भविष्य। वायु प्रदूषण (एयर पॉल्यूशन)।
पंजाब में भूजल संकट। राइट टू रिकॉल (वोटरों को सांसद/विधायक वापस बुलाने का अधिकार) जैसी लोकतांत्रिक मुद्दे उठाए हैं। ज्यादातर मुद्दे कंज्यूमर राइट्स, रोजमर्रा की महंगाई, स्वास्थ्य, डिजिटल अधिकार और गिग इकोनॉमी से जुड़े रहे, जिन्हें उन्होंने “जनता के मुद्दे” बताया है। AAP नेताओं (जैसे आतिशी और भगवंत मान) ने आरोप लगाया कि उन्होंने केंद्र सरकार या बड़े राजनीतिक मुद्दों (जैसे चुनाव आयोग, विपक्षी प्रदर्शन आदि) पर कम आवाज उठाई, इसलिए इन्हें “सॉफ्ट PR इश्यू” कहा है। दिलचस्प बात यह है कि जनहित के मुद्दे उठाने वाले राघव चड्ढा के पक्ष में दूसरे दलों के नेता भी बोलने को तैयार नहीं। जो पत्रकार और डिजिटल मीडिया विपक्ष की आवाज बनने का दंभ भरता है वह भी बीजेपी से बढ़ती नजदीकियों की वजह से यह सब कार्रवाई बता रहा है।
अरे भाई राघव चड्ढा मुद्दे तो जनहित के उठा रहा था। उसके बोलने का फायदा जनता को मिलने की संभावना तो थी। मतलब सब दल इन उद्योगपतियों के दम पर राजनीति कर रहे हैं। केजरीवाल जो आम आदमी की लड़ाई लड़ने का दंभ भरता है उसे आम आदमी की आवाज उठाना पसंद न आया। खास आदमी जो बन गया है। वे लोग क्या कर रहे हैं जिनके लिए राघव संसद में आवाज उठा रहा था। नेताओं के उकसावे में जाति धर्म के नाम पर तो सड़कों पर उतर जाओगे। अपने लिए नहीं। यूथ को राघव चड्ढा की आवाज बनकर सड़कों पर उतरना चाहिए। ये जो दल पूंजीपतियों के लिए काम करते हैं उन्हें बेनकाब करना चाहिए। यही बात तो हम करते हैं कि जो नेता पार्टी पॉलिटिक्स से ऊपर उठकर जनहित के मुद्दे उठाए उसे बढ़ावा दो। कोई जनप्रतिनिधि किसी भी पार्टी से हो। किसी भी पार्टी में जाए यदि वह जनहित के मुद्दे उठाता है तो उसके साथ खड़े हो जाओ। दूसरे जनप्रतिनिधियों का जमीर भी जागेगा।







