उपेंद्र कुशवाहा, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद, 5 सितंबर 2025 को पटना के मिलर हाई स्कूल ग्राउंड में एक विशाल रैली का आयोजन कर रहे हैं, जिसे वे “संवैधानिक अधिकार और परिसीमन सुधार महारैली” कह रहे हैं। इस रैली का घोषित उद्देश्य परिसीमन और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व की मांग है, लेकिन इसे बिहार की राजनीति में कुशवाहा समाज और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के बीच अपनी जातीय और राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
रैली का महत्व और जगदेव बाबू का प्रतीकात्मक उपयोग
जगदेव प्रसाद का शहादत दिवस: 5 सितंबर को शहीद जगदेव प्रसाद कुशवाहा का शहादत दिवस है, जिन्हें “बिहार का लेनिन” कहा जाता है। वे एक क्रांतिकारी नेता थे, जिन्होंने शोषित समाज दल की स्थापना की और शोषित वर्गों (90% शोषित बनाम 10% शोषक) के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। उनकी हत्या 5 सितंबर 1974 को कुर्था में एक सत्याग्रह के दौरान पुलिस फायरिंग में हुई थी।
कुशवाहा समाज का प्रतीक: जगदेव बाबू कुशवाहा समाज के एक बड़े नेता थे, और उपेंद्र कुशवाहा इस रैली को उनके शहादत दिवस से जोड़कर समाज में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह रैली न केवल परिसीमन के मुद्दे को उठाने का मंच है, बल्कि कुशवाहा समाज और अन्य OBC समुदायों को एकजुट करने का भी प्रयास है।
शिक्षक दिवस का संयोग: 5 सितंबर को शिक्षक दिवस होने के कारण भी इस दिन का प्रतीकात्मक महत्व बढ़ जाता है, जिसे कुशवाहा ने रैली के लिए चुना है।
परिसीमन का मुद्दा
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कुशवाहा का तर्क: उपेंद्र कुशवाहा का कहना है कि 1976 के आपातकाल के दौरान परिसीमन पर रोक लगाई गई थी, जिससे बिहार जैसे राज्यों को नुकसान हुआ। यदि समय पर परिसीमन होता, तो बिहार में लोकसभा सीटें 40 के बजाय 60 हो सकती थीं। उनकी पार्टी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रही है।
अभियान की पृष्ठभूमि: RLM ने इस मुद्दे पर पहले भी बिक्रमगंज, मुजफ्फरपुर और गया में रैलियां की हैं। पटना की रैली को इस अभियान को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
राजनीतिक रणनीति और जातीय समीकरण
चुनावी साल में शक्ति प्रदर्शन: बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और यह रैली NDA के घटक दल RLM के लिए सीट-शेयरिंग से पहले अपनी ताकत दिखाने का मौका है। विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा इस रैली के जरिए न केवल अपनी पार्टी की ताकत दिखाना चाहते हैं, बल्कि कुशवाहा समाज और अन्य OBC समुदायों में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।
जातीय जमीन की तलाश: कुशवाहा समाज बिहार में एक महत्वपूर्ण OBC समुदाय है, और उपेंद्र कुशवाहा इस रैली के जरिए जगदेव बाबू की विरासत को भुनाकर इस समुदाय का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, वे अन्य शोषित और पिछड़े वर्गों को भी अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
विपक्ष पर हमला: कुशवाहा ने विपक्षी गठबंधन (INDIA) की रैलियों को “हंगामा” करार देते हुए अपनी रैली को जमीनी मुद्दों से जोड़ा है, जिससे उनकी रणनीति को और बल मिलता है।
रैली का संभावित प्रभाव
भीड़ और प्रभाव का आकलन: कुशवाहा ने दावा किया है कि यह रैली ऐतिहासिक होगी और मिलर ग्राउंड में पहले कभी ऐसी भीड़ नहीं देखी गई होगी। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने लोग इस रैली में शामिल होते हैं और क्या यह परिसीमन के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला पाती है।
राजनीतिक संदेश: यह रैली NDA के भीतर कुशवाहा की स्थिति को मजबूत कर सकती है और बिहार की OBC राजनीति में उनकी भूमिका को और स्पष्ट कर सकती है। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह रैली महज शक्ति प्रदर्शन तक सीमित रह सकती है, अगर यह परिसीमन जैसे जटिल मुद्दे को व्यापक बहस में नहीं बदल पाती।








