“सब सामान्य है” : सत्ता का नया शास्त्र

भारतीय राजनीति में एक नया शास्त्र लिखा जा रहा है। इस शास्त्र का पहला और अंतिम सूत्र है—
“सब सामान्य है।”
अगर कहीं संकट दिखे, जनता परेशान हो, लाइनें लग जाएं, लोग सवाल पूछने लगें—तो घबराने की जरूरत नहीं। बस घोषणा कर दीजिए कि सब सामान्य है। उसके बाद समस्या अपने आप सरकारी फाइलों में मर जाती है।
यह एक तरह का नया राजनीतिक कौशल है—समस्या को खत्म मत कीजिए, उसे “सामान्य” घोषित कर दीजिए।
नोटबंदी के समय देश ने अजीब दृश्य देखा। बैंक और एटीएम के बाहर अंतहीन कतारें थीं। अपनी ही मेहनत की कमाई निकालने के लिए लोग दिन-रात खड़े रहे। कई बुजुर्ग लाइन में ही दम तोड़ गए। लेकिन सत्ता की भाषा में सब कुछ ठीक था—किसी को कोई परेशानी नहीं हुई।
फिर अचानक लॉकडाउन लगा। करोड़ों मजदूर शहरों से अपने गांवों की ओर पैदल निकल पड़े। सैकड़ों किलोमीटर की यात्राएं, भूख-प्यास, दुर्घटनाएं—यह सब देश की सड़कों पर दिखाई दे रहा था। लेकिन सत्ता का बयान वही रहा—किसी को कोई समस्या नहीं हुई।
कोरोना के समय अस्पतालों में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा। सोशल मीडिया पर लोग मदद के लिए चीख रहे थे। एंबुलेंस के भीतर मरीज दम तोड़ रहे थे। लेकिन संसद में बताया गया—ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई।
सीमा पर तनाव हुआ तो घोषणा हुई—चीन एक इंच भी अंदर नहीं आया।
मणिपुर महीनों से जल रहा है, लेकिन कहा गया—स्थिति पूरी तरह सामान्य है।
अब इसी सरकारी दर्शन की नई कड़ी सामने आई है—
देश में LPG सिलेंडर की कोई कमी नहीं है।
यह घोषणा भी उसी आत्मविश्वास के साथ की गई है, जैसे पहले की जाती रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार गैस एजेंसियों के बाहर लगी लंबी कतारें शायद इस बयान को समझ नहीं पा रही हैं।
सुबह-सुबह खाली सिलेंडर लेकर खड़े लोग शायद यह नहीं जानते कि वे असल में “सामान्य स्थिति” का हिस्सा हैं।
दरअसल सत्ता की नजर में समस्या वही होती है जिसे स्वीकार कर लिया जाए। और जिसे स्वीकार ही नहीं किया जाए, वह समस्या रहती ही नहीं।
लोहिया कहा करते थे कि राजनीति का असली काम जनता की पीड़ा को समझना और उसके समाधान की ईमानदार कोशिश करना है। लेकिन आज की राजनीति ने एक नया रास्ता खोज लिया है—
पीड़ा को स्वीकार मत कीजिए, बयान दे दीजिए कि पीड़ा है ही नहीं।
गैस एजेंसी के बाहर लाइन में खड़ा आदमी कोई क्रांतिकारी नहीं है। वह किसी विचारधारा की लड़ाई नहीं लड़ रहा। वह सिर्फ इतना चाहता है कि उसके घर का चूल्हा जलता रहे।
अगर प्रशासन सच में समस्या हल करना चाहता है, तो समाधान बेहद सरल है—
जिसके घर का सिलेंडर खाली है, उसे एक भरा हुआ सिलेंडर दे दीजिए।
वह नारे नहीं लगाएगा, धरना नहीं देगा, ट्वीट नहीं करेगा।
वह बस “धन्यवाद” कहेगा और घर लौट जाएगा।
लेकिन समस्या का समाधान करना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल भी—क्योंकि उसके लिए जमीन पर काम करना पड़ता है। बयान देना कहीं ज्यादा आसान है।
इसलिए मीटिंग होती है, समीक्षा होती है, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और अंत में वही निष्कर्ष निकलता है—
“स्थिति पूरी तरह सामान्य है।”
आज भारतीय लोकतंत्र के सामने असली संकट यही है। समस्या से ज्यादा खतरनाक वह मानसिकता है जो हर समस्या को बयान से ढक देना चाहती है।
जनता अब धीरे-धीरे यह समझने लगी है कि
सत्ता के लिए “सामान्य” का मतलब और होता है,
और जनता के लिए “सामान्य” का मतलब कुछ और।
जनता के लिए सामान्य स्थिति वह है जब
घर में चूल्हा जले,
खेत में पानी पहुंचे,
अस्पताल में ऑक्सीजन मिले,
और सच्चाई को झूठ से ढकने की जरूरत न पड़े।
लेकिन जब व्यवस्था हर संकट पर सिर्फ यह कहने लगे कि “सब सामान्य है”, तब समझ लेना चाहिए कि असामान्यता बहुत गहरी हो चुकी है।
और इतिहास गवाह है—
जब जनता को बार-बार बताया जाता है कि उसकी तकलीफ असल में तकलीफ नहीं है,
तो एक दिन वही जनता सत्ता को बता देती है कि “सब सामान्य” अब नहीं है।

  • नीरज कुमार
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