Tribute to Sahib Singh Verma : बागपत की मिट्टी से निकला वह जननेता, जो दिल्ली का मुख्यमंत्री बना और डीटीसी बस से घर लौटा…

आज 30 जून है। यही वह दिन है जब दिल्ली की राजनीति ने अपना एक बेहद सादा, जमीनी और जनप्रिय नेता खो दिया था। 30 जून 2007 को पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। 15 मार्च 1943 को जन्मे साहिब सिंह वर्मा का मूल पैतृक संबंध उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के रमाला गांव से था। बाद में उनका परिवार दिल्ली के मुंडका गांव में जाकर बस गया। वे लाकड़ा चौहान गोत्र के जाट परिवार से थे। किसान परिवार के संस्कार, गांव की मिट्टी और सादगी उनके पूरे राजनीतिक जीवन में दिखाई देती रही। बहुत कम लोग जानते हैं कि राजनीति में आने से पहले वे एक पुस्तकालयाध्यक्ष (लाइब्रेरियन) थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े, समाजसेवा की और फिर भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से राजनीति में आए। 1993 में दिल्ली सरकार में मंत्री बने और 27 फरवरी 1996 को दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल में दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों, शिक्षा और आधारभूत ढांचे पर विशेष ध्यान दिया गया।

लेकिन साहिब सिंह वर्मा को केवल मुख्यमंत्री के रूप में याद नहीं किया जाता, बल्कि उनकी सादगी उन्हें सबसे अलग बनाती है। 1998 में जब पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन का फैसला किया, तो उन्होंने बिना किसी विवाद के मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। सत्ता से विदाई के बाद जिस नेता के आगे-पीछे सरकारी काफिला चलता था, वही साहिब सिंह वर्मा डीटीसी की बस से अपने घर मुंडका लौट गए। भारतीय राजनीति में यह घटना आज भी सादगी, विनम्रता और लोकतांत्रिक मर्यादा की मिसाल मानी जाती है। उनके बारे में एक और राजनीतिक प्रसंग भी अक्सर सुनाया जाता है। कहा जाता है कि जब वे मुख्यमंत्री बने, तब उनके नाम का प्रस्ताव वरिष्ठ नेता मदन लाल खुराना ने रखा था। बाद में जब नेतृत्व परिवर्तन का समय आया तो साहिब सिंह वर्मा ने स्वयं सुषमा स्वराज के नाम का समर्थन किया। यह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने संगठन को स्वयं से ऊपर रखा। 1999 में वे लोकसभा पहुंचे और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में श्रम एवं रोजगार मंत्री बने। श्रमिकों और कर्मचारियों के मुद्दों पर उन्होंने प्रभावी भूमिका निभाई। 30 जून 2007 को राजस्थान से दिल्ली लौटते समय एक सड़क दुर्घटना में उनका असमय निधन हो गया। दिल्ली ही नहीं, पूरे उत्तर भारत ने एक ऐसा जननेता खो दिया जो पद से नहीं, अपने व्यवहार से बड़ा था।

आज उनके पुत्र प्रवेश साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के उपमुख्यमंत्री हैं। हाल ही में उन्होंने मुख्यमंत्री पद के लिए रेखा गुप्ता के नाम का प्रस्ताव रखा। राजनीति में संयोग कभी-कभी इतिहास बन जाते हैं। एक समय पिता के नाम का प्रस्ताव किसी और ने रखा और उन्होंने स्वयं दूसरे नेता के नाम का समर्थन किया। भविष्य में क्या कभी ऐसा समय आएगा जब रेखा गुप्ता प्रवेश वर्मा के नाम का प्रस्ताव रखेंगी? इसका उत्तर भविष्य की राजनीति देगी, लेकिन इतना तय है कि साहिब सिंह वर्मा ने राजनीति में मर्यादा, सादगी और संगठन सर्वोपरि रखने की जो परंपरा छोड़ी, वह आज भी प्रेरणा देती है। साहिब सिंह वर्मा को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि। मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर डीटीसी बस से घर लौटने वाला नेता आज भी भारतीय राजनीति की सादगी का सबसे जीवंत प्रतीक है।

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