दिल्ली में ऐसे भी नेता हुए हैं!

रमेश दत्ता ‌दिल्ली के मिंटो रोड क्षेत्र‌ से नौ बार निरंतर दिल्ली नगर निगम के सदस्य चुने गए थे। ‌ जिसकी एक सरहद‌ नई दिल्ली के कनॉट प्लेस, ‌ ‌तथा दूसरा सिरा पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद‌ से जुड़ा है। स्कूली दिनों से ही रमेश दत्ता के साथ मेरे‌ ताल्लुकात कायम हो गए थे। रमेश राउज एवेन्यू के सरकारी स्कूल में छात्र थे‌ उनके खास दोस्त सुरेंद्र कुमार गोयल जो की गाजियाबाद से लोकसभा के सदस्य भी रह चुके थे वे मेरे स्कूल में सहपाठी थे। उनके कारण अक्सर इनसे मेरी मुलाकाते होती थी। मैंने उनको बहुत करीब से देखा था, ‌ ऐसे ईमानदार आदमी मैंने अपने जीवन में ‌बहुत कम देखे हैं।

1971 में पहली बार नगर निगम का सदस्य बनने के बाद 9 बार ‌ निरंतर नगर निगम का चुनाव जीतने‌ के कारण दिल्ली के इतिहास में ‌ उनका नाम दर्ज़ है। ऐसा कॉरपोरेटर एक झुग्गी की तरह टूटे-फूटे सरकारी लावारिस ढांचे में जो पुराने अखबारों, पोस्टरों,‌ पर्चों,‌ हैंड बिल से भरा, ‌‌ कई टीन के संदूको में‌ नेहरू ब्रिगेड ‌ जो उन्होंने बना रखी थी उसके वॉलंटरीयो के‌ पहनने के कुर्ते पजामे, सफेद टोपी, तथा तिरंगे झंडे‌ से भरे रहते थे। कांग्रेस के हर आयोजन‌, राष्ट्रीय पर्व, ‌ तथा शौक के अवसर पर वे अपनी ब्रिगेड के साथ पंक्तिबद्ध खड़े होकर‌ सलामी देते थे। विरोधी दल के भी किसी नेता या जानकार कार्यकर्ता के दुख के समय वे अपनी ब्रिगेड के साथ हाजिरी लगाते थे। अपने चुनाव क्षेत्र में उन्होंने नेहरू हिल के नाम से‌ सुंदर स्मारक भी स्थापित किया था। उनका घर लकड़ी के तख्त, ‌ तथा पुराने ‌ ओढ़ने ‌ बिछाने के‌ कपड़ों ‌ तक ही महदूद था। उनका न कोई दर था ना घर था। मां के ‌ मरने के बाद‌ उसके परिवार में भी कोई नहीं था। ‌ उसके साथ हर वक्त ‌ 20-25 बेसहारा, कंगले, लावारिस लोग उनकी टीम में शामिल रहते थे।‌ उसके पास जो कुछ भी होता वह तत्काल इन पर खर्च कर देते थे। ईमानदारी की वजह से ही ‌ वह लगातार चुनाव जीतते रहे।

एक बार कांग्रेस का टिकट कट जाने के‌ कारण निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा। मैंने चंद्रशेखर जी से जाकर इसकी सूचना देते हुए उनसे जनसभा को संबोधित करने का अनुरोध किया वे रमेश दत्ता को अच्छी तरह से जानते थे उन्होंने मिंटो रोड में जनसभा को संबोधित करते हुए रमेश को जिताने की अपील की थी, ‌रमेश चुनाव जीत भी गए। निजी जीवन में सादगी और ईमानदारी के कारण उनका जीवन एक फकीर की तरह लगता था। 67 साल की उम्र में चुनावी ‌ हलफनामे ‌में उन्होंने अपनी चल अचल संपत्ति के रूप में‌ 42000 ‌ रुपए की मिल्कियत लिखी थी। मैं उनके चुनाव में अपने‌ तथा अपने एक दो ‌ अन्य साथियों‌ के साथ पान फूल देकर‌ संतोष अनुभव करता था। एक बार वह दिल्ली के उप-महापौर भी बने‌ क्योंकि वे अधिक पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए आगे नहीं पढ़ पाए। 2020 में उनका इंतकाल हो गया। साथी राकेश कुमार भूतपूर्व दिल्ली नगर निगम के सदस्य तथा विरोधी दल के नेता रहे हैं, अब उनकी धर्मपत्नी किरण बाला‌ इसी चुनाव क्षेत्र से नगर निगम की सदस्य हैं। ‌ उन्होंने रमेश दत्ता ‌ की याद को ताजा करते हुए जो ‌ पोस्टर निकाला है,‌ वह उच्च मानदंडों का प्रतीक है, विरोधी विचारधारा का होने के बावजूद अच्छे ‌ ईमानदार कार्यकर्ता के लिए ‌ ‌ उन्होंने अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है।

राजकुमार जैन

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