ममता का किला ढहा, भगवा लहर का उदय

बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत, राजनीतिक मायने और विपक्ष का संकट

 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी ने 165+ सीटें जीतकर TMC के 15 वर्षीय शासन को उखाड़ फेंका। एंटी-इनकंबेंसी, घुसपैठ, भ्रष्टाचार और CAA ने मातुआ वोट एकजुट किया। ममता की ‘अजेय’ छवि टूटी, विपक्ष कमजोर। राष्ट्रीय INDIA गठबंधन प्रभावित, पूर्वी भारत में BJP विस्तार। नई सरकार विकास-कानूनव्यवस्था पर फोकस करेगी, परंतु हिंसा रोकना चुनौती। यह जीत लोकतंत्र में परिवर्तन का प्रतीक है।

 

डॉ. प्रियंका सौरभ

 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ऐतिहासिक जीत ने न केवल ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 15 वर्षीय शासन को समाप्त कर दिया, बल्कि पूरे भारतीय राजनीति के परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। रुझानों और अंतिम परिणामों के अनुसार, बीजेपी ने 294 सीटों वाली विधानसभा में 165 से अधिक सीटें हासिल कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया, जबकि टीएमसी 100 सीटों के आसपास सिमट गई। कांग्रेस और सीपीआई(एम) जैसे पारंपरिक विपक्षी दल क्रमशः 2-3 और 1-2 सीटों तक सीमित रह गए। यह परिणाम 2021 के चुनाव से पूरी तरह उलट हैं, जब टीएमसी ने 213 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया था। बीजेपी का वोट शेयर 2016 के मात्र 10% से बढ़कर 2024 के लोकसभा चुनावों में 39% हो चुका था, और अब यह पूर्ण सत्ता में तब्दील हो गया।

इस जीत के पीछे कई बहुआयामी कारक कार्यरत थे। सबसे पहले, एंटी-इनकंबेंसी लहर ने जोरदार तरीके से अपना प्रभाव दिखाया। ममता बनर्जी सरकार पर भ्रष्टाचार, कटमनी, घुसपैठ और राजनीतिक हिंसा के गंभीर आरोप लगे थे। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत वोटर लिस्ट से 27 लाख कथित फर्जी नाम हटाए गए, जिसने बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को केंद्र में ला खड़ा किया। मातुआ समुदाय—जो बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों का सबसे बड़ा वोट बैंक है—ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के कार्यान्वयन के बाद बीजेपी का पूर्ण समर्थन किया। इसके अलावा, कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में TMC कार्यकर्ताओं द्वारा हिंसा, ने गैर-टीएमसी मतदाताओं को एकजुट किया। पहले चरण में 92.88% का रिकॉर्ड मतदान इसी असंतोष का प्रमाण था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के आक्रामक प्रचार ने इस लहर को और तेज किया। मोदी ने ‘अंग-बंग-कलिंग’ (बंगाल, बिहार, ओडिशा) में बीजेपी शासन का नारा दिया, जबकि शाह ने 152 में से 110 सीटों पर बढ़त का दावा किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिंदुत्व, विकास और ‘बुलडोजर बाबा’ की छवि के साथ हिंदू मतदाताओं को लामबंद किया। महिला आरक्षण बिल को केंद्र सरकार की विफलता बताने वाले विपक्षी दावों को बीजेपी ने पलटकर टीएमसी के कुशासन से जोड़ा। उच्च मतदान ने दबे हुए वोटरों—खासकर महिलाओं और युवाओं—को बाहर निकाला, जो टीएमसी के ‘खेला होगा’ नारे से प्रभावित नहीं हुए।

ममता बनर्जी की ‘अजेय दीदी’ वाली छवि इस हार के साथ पूरी तरह ध्वस्त हो गई। 2011 से बंगाल पर काबिज टीएमसी को अब विपक्ष की भूमिका निभानी पड़ेगी, जो उसके लिए अपरिचित चुनौती है। पार्टी में आंतरिक कलह की आशंका बढ़ गई है, क्योंकि शुभेंदु अधिकारी जैसे पूर्व TMC नेता बीजेपी में सफल साबित हुए। ममता ने एग्जिट पोल्स को ‘बीजेपी का पेड नैरेटिव’ करार दिया और केंद्र पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया, लेकिन रुझान सरकार गंवाने की ओर स्पष्ट इशारा कर रहे थे। टीएमसी ने चुनाव आयोग पर भी सवाल उठाए, परंतु निष्पक्षता के प्रमाण—जैसे रिकॉर्ड मतदान—ने इन दावों को कमजोर कर दिया। भविष्य में टीएमसी का पुनर्गठन कठिन होगा, क्योंकि उसका जमीनी संगठन भ्रष्टाचार के दागों से ग्रस्त हो चुका है।

राष्ट्रीय स्तर पर इस जीत के मायने गहन हैं। 2024 लोकसभा चुनावों में सीमित बहुमत वाली मोदी 2.0 सरकार को बंगाल ने पूर्ण राज्य सरकार के रूप में मजबूत आधार प्रदान किया। पूर्वी भारत में बीजेपी का विस्तार—असम और बिहार के साथ अब बंगाल—हिंदुत्व और विकास मॉडल की अपार सफलता का प्रमाण है। INDIA गठबंधन कमजोर पड़ जाएगा, क्योंकि टीएमसी का राष्ट्रीय कद घटेगा। उत्तर प्रदेश 2027 और बिहार चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ेगा, जहां बीजेपी मजबूत स्थिति में होगी। संघ परिवार की संगठनात्मक क्षमता ने क्षेत्रीय दलों को कड़ी टक्कर दी, जो भविष्य के चुनावी रणनीतियों को प्रभावित करेगी।

विपक्ष की स्थिति अब त्रिशंकु में आ गई है। कांग्रेस और वाम मोर्चा की नगण्य भूमिका 2021 से जारी रही, जो राष्ट्रीय विपक्ष की एकजुटता पर सवाल खड़े करती है। ममता का राजनीतिक करियर अब अनिश्चित है—क्या वे विपक्ष की नेता बनेंगी या पार्टी में नई पीढ़ी उभरेगी? विपक्ष को नई रणनीति अपनानी होगी: या तो कांग्रेस-वाम का मजबूत गठबंधन, या नया क्षेत्रीय मोर्चा। बंगाल अब बीजेपी का गढ़ बन चुका है, जिससे विपक्ष की आवाज राष्ट्रीय पटल पर और मद्धम हो गई।

सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से, नई बीजेपी सरकार विकास, कानून-व्यवस्था और घुसपैठ रोक पर फोकस करेगी। मातुआ समुदाय को CAA के लाभ मिलेंगे, जबकि बंगाल की जर्जर अर्थव्यवस्था—जो टीएमसी के कुशासन से पीड़ित थी—को नई दिशा मिल सकती है। हालांकि, राजनीतिक हिंसा को समाप्त करना और बंगाली अस्मिता के साथ भगवा लहर का संतुलन बनाना प्रमुख चुनौतियां होंगी। महिलाओं, युवाओं और अल्पसंख्यकों के मुद्दे—जैसे आरक्षण, रोजगार और शिक्षा—नई सरकार के एजेंडे में रहेंगे। बंगाल की सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखते हुए विकास मॉडल लागू करना होगा।

भविष्य की संभावनाएं रोचक हैं। बीजेपी को आंतरिक कलह से बचना होगा, जो उसके बंगाल संगठन की पुरानी कमजोरी रही है। विपक्ष को पुनर्जनन की आवश्यकता है—शायद ममता के नेतृत्व में नया आक्रमक रुख या कांग्रेस का पुनरुद्धार। यह चुनाव सिद्ध करता है कि स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे को परिभाषित करते हैं। बंगाल ने साबित कर दिया कि परिवर्तन अपरिहार्य है, और लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि होती है। यह जीत न केवल बीजेपी की रणनीतिक विजय है, बल्कि भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है।

 

(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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