अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट ने हाल ही में एक बयान में खुलासा किया कि यदि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया, तो ट्रंप प्रशासन को अरबों डॉलर की आयात शुल्क राशि वापस करनी पड़ सकती है। यह बयान तब आया जब फेडरल अपील कोर्ट ने 29 अगस्त 2025 को ट्रंप के टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रपति ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का दुरुपयोग करते हुए अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति के पास इतने व्यापक और अनिश्चितकालीन टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं है, क्योंकि अमेरिकी संविधान के अनुसार टैरिफ और टैक्स लगाने का अधिकार मुख्य रूप से कांग्रेस के पास है।
ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया कि ये टैरिफ व्यापार घाटे को कम करने और राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में जरूरी थे। बेसेन्ट ने दावा किया कि अगस्त 2025 में इन टैरिफ से 300 अरब डॉलर की आय हुई थी, और सितंबर में इसके 500 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद थी। हालांकि, कोर्ट के फैसले ने इन टैरिफ की वैधता पर सवाल उठा दिए, और यदि सुप्रीम कोर्ट भी इसे रद्द करता है, तो अमेरिकी ट्रेजरी को भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है, क्योंकि वसूला गया टैरिफ वापस करना पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की तैयारी कर रहा है, और बेसेन्ट ने विश्वास जताया कि वे इस मामले में जीत हासिल करेंगे। कोर्ट ने टैरिफ को तत्काल रद्द करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि 14 अक्टूबर 2025 तक इसे लागू रखने की अनुमति दी, ताकि अपील का समय मिल सके। इस बीच, ट्रंप ने कोर्ट के फैसले की आलोचना करते हुए इसे “कट्टरपंथी वामपंथी समूह” का निर्णय बताया और चेतावनी दी कि टैरिफ हटाने से अमेरिका की अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत को नुकसान होगा।
यह मामला भारत सहित कई देशों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया है, जिसमें रूस से तेल खरीदने के लिए 25% का दंडात्मक टैरिफ शामिल है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने इन टैरिफ को अवैध ठहराया, तो भारत को राहत मिल सकती है, विशेष रूप से 25% रेसिप्रोकल टैरिफ के मामले में, हालांकि दंडात्मक टैरिफ पर स्थिति अभी अस्पष्ट है।






