जंतर-मंतर प्रदर्शन: फिलहाल तीन बातें

प्रेम सिंह

कल एक मित्र ने पूछ लिया कि जंतर-मंतर पर जो प्रोटेस्ट चल रहा है, उस पर मेरी टिप्पणी क्या है? मेरे चुप रहने पर उसने कहा कि वह दरअसल कई दिनों से मेरी टिप्पणी का इंतजार कर रहा था। मैंने साथी को अपना रटा-रटाया जवाब थमा दिया – ‘मैंने देश बचाने का काम काफी दिनों से छोड़ा हुआ है।’ मित्र ने कहा यह तो उसने कई बार सुना है, कुछ खुलासा करिए। मैंने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी करना, राजनीतिक बयान देना, धरना/प्रदर्शन/जनसभा/मार्च आदि में शिरकत करना अथवा उन पर टिप्पणी करना मैंने छोड़ दिया है। यहां तक कि सभा-सेमिनारों में जाना भी लगभग बंद किया हुआ है। ऐसे में आप किस नाते मेरी टिप्पणी की अपेक्षा करते हैं! सिविल सोसायटी ऐक्टिविस्ट में हूं नहीं; न ही पत्रकार; न किसी एनजीओ का संस्थापक-संचालक। मित्र ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘नागरिक तो हो; देश में नागरिक चेतना के प्रसार के लिए ‘भारत संवाद अभियान’ 2019 से ही चलाया हुआ है।’

बहरहाल, मैं एक नागरिक के नाते राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक आदि विषयों पर कमेंटरी लिखता हूं। अगली कमेंटरी में इस प्रोटेस्ट का जिक्र भी आएगा ही। मित्र के आग्रह को रखते हुए यहां पहली बात यह कहनी है कि 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के हिंसक हमले की फास्ट ट्रैक जांच होनी चाहिए; और दोषी पुलिस अधिकारियों/कर्मियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इस जांच में दिसंबर 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के परिसर, लायब्रेरी और हॉस्टलों में छात्र-छात्राओं पर पुलिस बलों के हिंसक हमले की वारदात को भी अवश्य शामिल किया जाना चाहिए। जांच पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। बेहतर होगा कि भारत का उच्चतम न्यायालय घटना की संगीनता का संज्ञान लेते हुए खुद जांच बैठाए या सरकार को जांच बैठाने का आदेश दे।

दूसरी बात यह कि नवउदारवादी दौर के पिछले तीन दशकों में भारतीय शिक्षा अत्यंत गंभीर संकट में फंस चुकी है। प्रदर्शनकर्ता और उनकी हौसला अफजाई करने वाले सज्जन पेशेवर पाठ्यक्रमों की परीक्षा-प्रणाली की अनियमितताओं को अपने आप में शिक्षा के साथ कन्फ्यूज़ न करें। वैसा करना नवउदारवादी दौर में शिक्षा के निजीकरण, बाजारीकरण और सम्प्रदायीकरण के खिलाफ संघर्ष की आवाज को नष्ट करना होगा। ध्यान रहे, शिक्षा के चरित्र और शिक्षा की अर्थव्यवस्था को बाजारोन्मुख बनाए जाने के खिलाफ देश में जो वैचारिक और सक्रिय संघर्ष होता रहा है, उसमें न सोनम वांगचुक, न सीजेपी के बनाने वाले लोग शामिल रहे हैं।

तीसरी बात यह कि विपक्षी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से फिलहाल कम से कम यह वचन लिया जाए कि उनके सत्ता में आने पर जंतर-मंतर, रामलीला मैदान, राजघाट जैसे स्थानों को बैरिकेड्स से मुक्त कर दिया जाएगा; दिल्ली या देश के किसी भी शहर में रैली करने या मार्च निकालने पर प्रतिबंध नहीं होगा; संगोष्ठी कक्ष या सभागार में सेमीनार/परिचर्चा/प्रस्तुति के लिए पुलिस अनुमति की जरूरत नहीं होगी; कॉलेज और विश्वविद्यालयों के परिसर के अंदर पुलिस का मुक्त प्रवेश नहीं होगा। धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा-प्रणाली में सुधार की मांग स्वीकार होने में समय लग सकता है, लेकिन विपक्ष लोकतंत्र के गिरते स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए निहायत जरूरी यह वचन तुरंत दे सकता है।

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