भारत में समंदर किनारे दबा था दुनिया का पहला बंदरगाह, 4000 साल तक यूरोप में भी नहीं था ऐसा पोर्ट, इतिहासकार ने खोली अंग्रेजों की झूठ की पोल

नई दिल्ली। अरसे से पश्चिम के इतिहासकार इस थ्योरी पर जोर देते रहे हैं कि सभ्यता की शुरुआत मेसोपोटामिया से मानी जाती है, जिसे आज आधुनिक युग में इराक कहा जाता है। यह सभ्यता दो नदियों दजला और फरात के बीच फली-फूली। अब एक मरीन इतिहासकार निक कॉलिंस ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा है कि मेसोपोटामिया से कभी सभ्यता की शुरुआत नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत भारत से हुई थी। उनके इस दावे से इतिहासकारों की दुनिया में खलबली मच गई है।
 

मेसोपोटामिया कभी सभ्यता का पालना नहीं था: इतिहासकार

 

 

मैरीटाइम हिस्टोरियन निक कॉलिंस ने सोशल मीडिया X पर लिखा, ‘मेसोपोटामिया कभी भी सभ्यता का पालना नहीं था। भारत था।’ उन्होंने इतिहास के उस नजरिए को चुनौती दी जो पीढ़ियों से दुनिया भर में पढ़ाया जाता रहा है। कॉलिंस के इस दावे ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है।

 

 

भारत के शहर, गणित और समुद्री संपर्क आगे

 

 

कॉलिंस ने एक व्यापक सबस्टैक कॉलम में इस दावे को और विस्तार से समझाया है। उनका तर्क है कि भारत के शहर, गणित, मैन्युफैक्चरिंग और समुद्री नेटवर्क उस समय से बहुत पहले ही फल-फूल रहे थे, जब पश्चिमी इतिहासकार उनके पैमाने को पहचानने के लिए तैयार थे।

सांस्कृतिक प्रवाह पूर्व से पश्चिम की ओर था, न कि इसके विपरीत।

 

 

 गुजरात का लोथल बंदरगाह सबसे बड़ा सबूत

 

 

सिंधु-सरस्वती सभ्यता में सैकड़ों बस्तियां एक जैसे आकार-प्रकार की ईंटें और बाट, ग्रिड-पैटर्न वाली सड़कें, बाथरूम, ढकी हुई नालियां और बड़े पैमाने पर विनिर्माण कारखाने और व्यापारिक नेटवर्क थे।

गुजरात का लोथल, कॉलिंस की थ्योरी का एक अहम हिस्सा है। उनका तर्क है कि वहां बना ईंटों का विशाल बेसिन असल में एक एडवांस्ड डॉकयार्ड था, जहां दर्जनों व्यापारिक जहाज़ आ-जा सकते थे। कुछ शुरुआती व्याख्याओं में इसे नहाने का कुंड या पानी की टंकी माना गया था।

 

 

यूरोप में 4 हजार साल तक लोथल जैसी चीज नहीं थी

 

 

कॉलिंस के लिए उस गलती से एक गहरी पूर्वाग्रह वाली सोच का पता चलता है। इतनी एडवांस्ड समुद्री सुविधा, प्राचीन भारत के बारे में पश्चिम की बनी-बनाई छवि में फिट नहीं बैठती थी। उन्होंने लिखा, ‘यूरोप में चार हज़ार साल तक ऐसी कोई चीज नहीं थी।’
लोथल में दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात बंदरगाह था, जो शहर को सिंध के हड़प्पा शहरों और सौराष्ट्र प्रायद्वीप के बीच व्यापार मार्ग पर साबरमती नदी के प्राचीन मार्ग से जोड़ता था।
इसकी खोज 1954 में भारतीय पुरातत्वविद् एसआर राव ने की थी। प्राचीन काल में मेसोपोटामिया और पश्चिम एशिया तक मोतियों व गहनों का व्यापार होता था।

 

 

सबूतों का किया पीछा तो पहुंचा भारतीय उपमहाद्वीप

 

 

इंटरनेशनल शिपिंग में 40 साल बिताने के बाद, कॉलिंस ने प्राचीन दुनिया में जहाजों, सामानों और कमर्शियल नेटवर्क की आवाजाही का पता लगाना शुरू किया। उन्होंने लिखा, ‘मुझे किसी पुरानी मान्यता का बचाव नहीं करना था। मैंने सबूतों का पीछा किया और वे सभी एक ही जगह पर ले जाते थे-‘भारतीय उपमहाद्वीप।’

 

 

अभी तक क्या माना जाता रहा है

 

 

आम तौर पर मानी जाने वाली कहानी में सभ्यता की शुरुआत मेसोपोटामिया से मानी जाती है, जिसके बाद मिस्र, ग्रीस और रोम का नंबर आता है। भारत का ज़िक्र बहुत बाद में आता है। अक्सर उसे ऐसी जगह के तौर पर दिखाया जाता है जहां दूसरी जगहों से भाषाएं, लोग और विचार पहुंचे। कॉलिंस का मानना है कि सबूत इसके ठीक उलट इशारा करते हैं।

 

 

 

जहां अंग्रेजों ने खोदा, उसे ही सभ्यता की शुरुआत माना

 

 

कॉलिंस का तर्क है कि मेसोपोटामिया सभ्यता का स्वीकृत पालना इसलिए बना क्योंकि यूरोपीय पुरातत्वविदों ने सबसे पहले वहां खुदाई की थी। वहां की शुष्क जलवायु ने मिट्टी की पट्टिकाओं, ईंटों और हड्डियों को सुरक्षित रखा, जबकि बाइबिल और शास्त्रीय ग्रंथों ने विद्वानों का ध्यान इस क्षेत्र की ओर खींचा। ओटोमन अधिकारियों ने भी यूरोपीय लोगों को खुदाई करने की अनुमति दी थी।

 

 

भारत पर नहीं दिया गया ध्यान

 

भारत पर उस तरह का ध्यान नहीं दिया गया। हड़प्पा की पहचान 19वीं सदी में ही हो गई थी, लेकिन उसकी ठीक से खोज कई दशकों बाद हुई। मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में हुई। कॉलिंस का तर्क है कि तब तक ‘मेसोपोटामिया सबसे पहले’ वाली बात एक ऐतिहासिक सच का रूप ले चुकी थी। उन्होंने लिखा, ‘असल में वहां प्राचीन दुनिया की सबसे बड़ी सभ्यता मौजूद थी।’

 

 

आर्यों के आक्रमण की थ्योरी भी झठी निकली

 

 

निक कॉलिंस भारत के अतीत से जुड़ी सबसे विवादित थ्योरी में से एक पर पहुंचते हैं, वो है आर्यों का आक्रमण। 19वीं सदी में यूरोपीय विद्वानों ने यह थ्योरी दी थी कि हल्के रंग वाले इंडो-यूरोपियन समूह लगभग 1500 BC में भारत आए और अपने साथ संस्कृत, वेद और वैदिक सभ्यता की नींव लेकर आए।

कॉलिंस ने लिखा, ‘आर्यों के आक्रमण की थ्योरी इसलिए बनाई गई थी क्योंकि 19वीं सदी के आखिर में लोग इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि एक भारतीय सभ्यता ऐसी भी हो सकती है जिसका कॉकेशियन लोगों से कोई लेना-देना न हो।’

इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि एक भारतीय सभ्यता ऐसी भी हो सकती है जिसका कॉकेशियन लोगों से कोई लेना-देना न हो।

 

 

कॉलिंस कहते हैं कि वेदों में किसी भी हमले का जिक्र नहीं

 

 

कॉलिंस ऋग्वेद में सरस्वती नदी के बार-बार किए गए वर्णन की ओर भी इशारा करते हैं। वह कहते हैं-यह एक विशाल नदी थी जो बाद के माइग्रेशन के पारंपरिक समय-निर्धारण से पहले ही सूख गई थी या लुप्त हो गई थी। उन्होंने तर्क दिया, ‘वेदों में किसी भी हमले का वर्णन नहीं है।’ कॉलिंस का मानना है कि असली समस्या इतिहास के अध्ययन के तरीके में है। मेसोपोटामिया के विद्वान मेसोपोटामिया का अध्ययन करते हैं, इजिप्टोलॉजिस्ट मिस्र का अध्ययन करते हैं और इंडोलॉजिस्ट भारत का अध्ययन करते हैं। हालाँकि, व्यापार इन अकादमिक सीमाओं को नहीं मानता था।

उनका तर्क है कि जब इन सीमाओं को हटा दिया जाता है, तो यात्रा की दिशा बिल्कुल अलग दिखाई देने लगती है। मेसोपोटामिया में मिले कार्नेलियन मनके, कपास और लकड़ी, सिंधु सभ्यता के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सुमेरियन नाम ‘मेलुहा’ से जहाजों के ज़रिए वहां पहुंचे थे। लोथल में व्यापारियों की मुहरें, पत्थर के लंगर और एक गोदाम के अवशेष उनके समुद्री व्यापार वाले तर्क को मज़बूत करते हैं। वहां बने मनके ‘उर’ के शाही मकबरों तक पहुंचते थे।

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