चुनाव आयोग बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण का गहन अभियान चला रहा है. बिहार में चुनाव के तीन चार महीने पहले इस स्तर पर अभियान चलाये जाने का औचित्य किसी को समझ में नहीं आ रहा है. सिवाय इसके कि भाजपा को डर है कि साफ सुथरे चुनाव में उसका गठबंधन जीत नहीं पाएगा.
आयोग का दावा है कि अब तक 83 प्रतिशत से ज़्यादा पुनरीक्षण का काम पूरा हो चुका है. इस दावे का आधार क्या है ! यह दावा सही है या झूठ? आम मतदाता हकीकत कैसे जानेंगे ! आयोग की तटस्थता और ईमानदारी पहले से ही गंभीर संदेह के घेरे में है.
बिहार में प्रशासनिक कार्य कुशलता भगवान भरोसे है. बताया जाता है कि 99 प्रतिशत बीएलओ प्राथमिक शिक्षकों हैं.उनमें बड़ी तादाद नवनियुक्त प्राथमिक शिक्षकों की है. आनन-फ़ानन में सख़्त आदेश दे कर इनके हाथ में फार्म थमा दिया जाता है. उपर के पदाधिकारियों पर आयोग का दबाव रहता है. अपनी गर्दन बचाने के लिये दस प्रतिशत सच में नब्बे प्रतिशत झूठ का मिश्रण बनाकर पुनरीक्षण का दावा पेश कर दिया जाता है.
इस जालसाज़ी का भेद अभी चर्चित बिहारी पत्रकार अजीत अंजुम ने किया है. ऐसा नहीं है कि बीएलओ जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं. दस पंद्रह मिनट का भाषण पिला कर उनको काग़ज़ात पकड़ा दिया जाता है. बीएलओ को प्रशिक्षण देने की ख़ानापूर्ति की जाती है. अधिकांश मामले में फरेब हो रहा है. इस घोर लापरवाही को सामने लाने के लिये आयोग को नामचीन पत्रकार अजीत अंजुम को धन्यवाद देना चाहिए. उल्टे उन पर मुकदमा चला दिया गया है. इस मुकदमा के ज़रिए सरकार और चुनाव आयोग सिर्फ़ अजीत अंजुम को ही प्रताड़ित नहीं कर रहा है. बल्कि बाक़ी पत्रकारों को भी संदेश दिया जा रहा है कि हमारा भेद खोलोगे तो तुम्हारी भी यही दशा होगी. अजीत अंजुम पर दायर किए गये मुकदमे की हम घोर निंदा करते हैं. सरकार की इस कार्रवाई से यह आरोप और पुष्ट होता है कि भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार में लोकतंत्र सुरक्षित नहीं है. इसलिए इस चुनाव में इनको परास्त करना हमारा लोकतांत्रिक दायित्व है.
आयोग का दावा है कि अब तक 83 प्रतिशत से ज़्यादा पुनरीक्षण का काम पूरा हो चुका है. इस दावे का आधार क्या है ! यह दावा सही है या झूठ? आम मतदाता हकीकत कैसे जानेंगे ! आयोग की तटस्थता और ईमानदारी पहले से ही गंभीर संदेह के घेरे में है.
बिहार में प्रशासनिक कार्य कुशलता भगवान भरोसे है. बताया जाता है कि 99 प्रतिशत बीएलओ प्राथमिक शिक्षकों हैं.उनमें बड़ी तादाद नवनियुक्त प्राथमिक शिक्षकों की है. आनन-फ़ानन में सख़्त आदेश दे कर इनके हाथ में फार्म थमा दिया जाता है. उपर के पदाधिकारियों पर आयोग का दबाव रहता है. अपनी गर्दन बचाने के लिये दस प्रतिशत सच में नब्बे प्रतिशत झूठ का मिश्रण बनाकर पुनरीक्षण का दावा पेश कर दिया जाता है.
इस जालसाज़ी का भेद अभी चर्चित बिहारी पत्रकार अजीत अंजुम ने किया है. ऐसा नहीं है कि बीएलओ जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं. दस पंद्रह मिनट का भाषण पिला कर उनको काग़ज़ात पकड़ा दिया जाता है. बीएलओ को प्रशिक्षण देने की ख़ानापूर्ति की जाती है. अधिकांश मामले में फरेब हो रहा है. इस घोर लापरवाही को सामने लाने के लिये आयोग को नामचीन पत्रकार अजीत अंजुम को धन्यवाद देना चाहिए. उल्टे उन पर मुकदमा चला दिया गया है. इस मुकदमा के ज़रिए सरकार और चुनाव आयोग सिर्फ़ अजीत अंजुम को ही प्रताड़ित नहीं कर रहा है. बल्कि बाक़ी पत्रकारों को भी संदेश दिया जा रहा है कि हमारा भेद खोलोगे तो तुम्हारी भी यही दशा होगी. अजीत अंजुम पर दायर किए गये मुकदमे की हम घोर निंदा करते हैं. सरकार की इस कार्रवाई से यह आरोप और पुष्ट होता है कि भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार में लोकतंत्र सुरक्षित नहीं है. इसलिए इस चुनाव में इनको परास्त करना हमारा लोकतांत्रिक दायित्व है.
शिवानन्द








