राजा, प्रचार और महंगाई का स्वर्णकाल

एक लोकतांत्रिक राज्य की व्यंग्य कथा

 

एक समय की बात है।
एक विशाल लोकतांत्रिक देश था, जहाँ जनता हर पाँच साल पर राजा चुनती थी और फिर अगले पाँच साल तक यही सोचती थी कि आखिर चुना क्या था।
उसी देश में एक नए राजा का उदय हुआ।
राजा बड़े प्रभावशाली वक्ता थे। भाषण ऐसा देते कि बेरोजगार भी ताली बजाते-बजाते कुछ देर के लिए खुद को रोजगारयुक्त महसूस करने लगे।
उन्होंने सिंहासन पर बैठते ही घोषणा की—
“मेरे पहले जो राजा थे, वे बदनसीब थे। उनकी किस्मत खराब थी। मेरे आते ही देखिए, पेट्रोल सस्ता हो गया, टमाटर मुस्कुराने लगे और महंगाई घुटने टेकने लगी।”
दरबारियों ने तुरंत ताली बजाई।
मीडिया नामक राजकीय वाद्य यंत्र ने अगले दिन हेडलाइन चलाई—
“इतिहास में पहली बार भाग्यशाली राजा का आगमन!”
राज्य की जनता भी खुश थी।
लोगों को लगा कि अब शायद सचमुच अच्छे दिन आने वाले हैं।
हालांकि अच्छे दिन कहाँ से आने वाले थे, यह किसी को नहीं पता था।
फिर भी उम्मीद पर लोकतंत्र कायम था।
धीरे-धीरे राजा ने पूरे राज्य को एक विशाल मंच में बदल दिया।
जहाँ देखो वहाँ राजा की तस्वीर।
स्कूल की किताब में राजा, राशन की थैली पर राजा, वैक्सीन के सर्टिफिकेट पर राजा, रेलवे टिकट के विज्ञापन में राजा।
कुछ लोगों को तो डर लगने लगा कि कहीं सुबह उठकर आईने में भी अपना चेहरा हटाकर राजा का चेहरा न दिखाई दे।
इधर मीडिया ने भी अपनी जिम्मेदारी समझ ली थी।
पहले पत्रकार सवाल पूछा करते थे।
अब वे राजा की आवाज़ में आवाज़ मिलाकर पूछते—
“महाराज, आप इतना काम कैसे कर लेते हैं?”
फिर रात 9 बजे का विशेष कार्यक्रम आता—
“राजा सिर्फ 3 घंटे सोते हैं!”
“राजा ने आज 19वीं मीटिंग की!”
“राजा ने विदेशी मेहमान को आम खिलाया, दुनिया हुई भावुक!”
उधर जनता सोच रही थी कि
“अगर महाराज इतना काम कर रहे हैं, तो हमारी जेब खाली क्यों हो रही है?”
कुछ समय बाद बाजार ने अपना असली चरित्र दिखाना शुरू किया।
दाल ने शतक लगा दिया।
सरसों तेल ने ओलंपिक हाई जंप पार कर लिया।
गैस सिलेंडर आम आदमी की पहुँच से ऊपर उठकर राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गया।
गरीब आदमी सिलेंडर को रसोई में कम, ड्राइंग रूम में ज्यादा सजाने लगा।
लेकिन दरबार का दावा जारी था—
“महंगाई महसूस करना राष्ट्रविरोधी मानसिकता है।”
फिर एक रात राजा ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया।
घड़ी में आठ बजे थे।
जनता समझ गई कि या तो युद्ध हुआ है या फिर कोई नया प्रयोग होने वाला है।
राजा बोले—
“आज रात 12 बजे से पुराने नोट कागज हो जाएंगे।”
राज्य में अफरा-तफरी मच गई।
लोग लाइन में लग गए।
किसी की बेटी की शादी अटक गई, किसी की दवा रुक गई, कोई बूढ़ा बैंक की लाइन में खड़ा-खड़ा स्वर्ग सिधार गया।
लेकिन अगले दिन मीडिया ने बताया—
“लाइन में खड़े लोग राष्ट्र निर्माण का आनंद ले रहे हैं।”
राजा ने कहा—
“थोड़ी तकलीफ होगी, लेकिन भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा।”
कुछ महीनों बाद पता चला कि भ्रष्टाचार तो नहीं गया, लेकिन मोहल्ले की आधी दुकानें जरूर चली गईं।
फिर आया टैक्स सुधार।
इतना सुधार हुआ कि छोटे दुकानदार को अपना व्यापार छोड़कर आधा समय पोर्टल का पासवर्ड याद करने में लगने लगा।
राजा बोले—
“डिजिटल बनिए।”
दुकानदार बोला—
“महाराज, नेटवर्क तो दिलवा दीजिए।”
इधर कुछ बड़े व्यापारी लगातार अमीर होते गए।
उनके लिए नियम ऐसे बनते कि शेयर बाजार हर सुबह उन्हें प्रणाम करता।
टीवी एंकर खुशी से चिल्लाते—
“शेयर मार्केट ने नया रिकॉर्ड बनाया!”
उधर बेरोजगार युवक सोचता—
“काश नौकरी भी रिकॉर्ड बना पाती।”
फिर राज्य में महामारी आई।
इतिहास की सबसे कठिन घड़ी।
लोग अस्पताल ढूँढ रहे थे, ऑक्सीजन ढूँढ रहे थे, दवा ढूँढ रहे थे।
लेकिन दरबार ने जनता से कहा—
“पहले थाली बजाइए।”
जनता ने थाली भी बजाई, मोमबत्ती भी जलाई, मोबाइल की फ्लैशलाइट भी जलाई।
बस अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं जली।
सड़कों पर मजदूर पैदल चल रहे थे।
कोई सैकड़ों किलोमीटर पैदल घर लौट रहा था।
लेकिन टीवी पर बहस चल रही थी—
“क्या दुनिया राजा की नेतृत्व क्षमता से ईर्ष्या करती है?”
इसी बीच राजा लगातार चुनाव प्रचार में व्यस्त रहे।
कभी उत्तर में रैली, कभी दक्षिण में रोड शो, कभी पूर्व में सरकार गिराने का प्रयास, कभी पश्चिम में विपक्ष खरीदने का अभियान।
दरबारियों ने हिसाब लगाया—
राजा साल में 200 दिन चुनाव में रहते हैं और बाकी 165 दिन अगले चुनाव की तैयारी में।
धीरे-धीरे चुनाव भी महंगे होते गए।
अब लोकतंत्र में विचार कम और विज्ञापन ज्यादा दिखाई देने लगे।
एक उम्मीदवार के पोस्टर पर इतना खर्च होने लगा कि उतने पैसे में गाँव का स्कूल बन जाए।
लेकिन मीडिया ने फिर समझाया—
“यह लोकतंत्र का उत्सव है।”
जनता बोली—
“हाँ, उत्सव तो है… बस इसमें खाना हमें नहीं मिलता।”
समय बीतता गया।
राजा का प्रचार बढ़ता गया।
महंगाई भी बढ़ती गई।
लेकिन हर सवाल का जवाब एक ही था—
“पिछले राजाओं ने 70 साल में क्या किया?”
आखिरकार एक दिन जनता को समझ आने लगा कि
राज्य में समस्याएँ खत्म करने से ज्यादा जरूरी, समस्याओं पर शानदार इवेंट करना हो गया है।
और तब चाय की दुकानों पर लोग धीरे-धीरे फुसफुसाने लगे—
“राजा देश चला रहा है…
या देश को कैमरे के सामने चलाता हुआ दिखा रहा है?”

नीरज कुमार

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