तीसरी अर्थ व्यवस्था का दावा खोखला नज़र आ रहा : अजय खरे

सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश में आम आदमी के लिए सोने की कील भी नसीब नहीं

 

रीवा । समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा सन 2014 से एक दशक के शासन काल में भारत की अर्थव्यवस्था को दोगुनी गति से आगे बढ़ाकर देश को ग्यारवीं से तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने के किए गए दावा देश के लोगों को धोखे में रखने जैसा साबित हुआ। नतीजतन 2024 के चुनाव में भाजपा स्पष्ट बहुमत से दूर रही। किसी तरह तीसरी बार सरकार तो बना ली लेकिन जन विरोधी नीतियों को लागू करने से वह बाज नहीं आई। हालत यह है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा जनसाधारण से एक साल तक सोने की किसी तरह की खरीददारी नहीं करने की अपील की जा रही है।

यह अपील ऐसे समय की जा रही जब सोने की कीमत में जबरदस्त उछाल है और आम आदमी की खरीद फरोख्त से दूर है। यही नहीं, लोगों से पेट्रोल डीजल ही नहीं, खाना पकाने के ईंधन और तेल में भी कटौती करने को कहा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद विदेश यात्रा पर जा रहे है लेकिन देश के लोगों को विदेश यात्रा करने से मना किया जा रहा है। श्री खरे ने कहा कि मोदी शासनकाल से पहले सोने की कीमत 24000 रुपए प्रति दस ग्राम से 6 गुना बढ़कर इधर बारह साल में 154200 रुपए हो गई है। आम आदमी के लिए सामान्य जीवन मुश्किल हो गया है। देश की अधिकांश आबादी को मुफ्त का अनाज उपलब्ध कराकर विकास की झूठी वाहवाही लूटी जा रही है। यह अप्रिय स्थिति 21 वीं सदी में देश की गरीबी और भुखमरी का बखान कर रही है, ना कि विकसित अर्थव्यवस्था की। आत्म निर्भर भारत का दावा खोखला नज़र आ रहा है।

अमेरिका और इजरायल के द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद से भारत में ईंधन संसाधनों को लेकर विदेशी निर्भरता काफी खतरनाक दिखाई दे रही है। बिना युद्ध लड़े ही दुष्परिणाम सामने नजर आ रहे हैं। श्री खरे ने कहा कि यदि भारत आत्म निर्भर स्थिति में होता तो देश के प्रधानमंत्री को इतनी जल्दी लोगों से दैनिक आवश्यक सामग्री में कटौती की अपील नहीं करनी पड़ती। श्री खरे ने कहा कि भारत की ऐतिहासिक पहचान सोने की चिड़िया के देश के रूप में थी लेकिन आज लगभग 215 लाख करोड़ रुपए का विदेशी कर्ज हमारी अर्थव्यवस्था को गुलामी की ओर ले जा रहा है। देश को दांव पर लगाकर विकास की बात बेईमानी है। श्री खरे ने कहा कि सोना भारत के लोगों की भावनाओं और उनकी आर्थिक स्थिति का इजहार करता है। ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति भी सोना रखने की कोशिश करता है। ग़रीब औरतें भी अधिक नहीं तो सोने की कील पहनती रहीं हैं जिसे बढ़ती कीमतों के चलते आज उन्हें खरीदना मुश्किल हो गया है।

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