अब इथेनॉल का कचरा दिलाएगा पोल्ट्री फार्मिंग में मोटा मुनाफा

पोल्ट्री बिजनेस में आजकल सबसे बड़ा सिरदर्द मुर्गियों के दाने यानी फीड की बढ़ती कीमतें हैं. फीड का खर्च कुल लागत का करीब 70-80 परसेंट तक पहुंच जाता है. जिससे मुनाफा काफी कम हो जाता है. लेकिन अब इस टेंशन का एक जबरदस्त समाधान सामने आया है और वह है इथेनॉल प्लांट से निकलने वाला कचरा. जिसे DDGS (Distillers Dried Grains with Solubles) कहा जाता है.

मक्का या अनाज से इथेनॉल बनाने के बाद जो अवशेष बचता है. वह असल में प्रोटीन और एनर्जी का पावरहाउस होता है. इसे फेंकने के बजाय अगर सही तरीके से प्रोसेस करके पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल किया किया जा सकता है. यह तकनीक न केवल लागत घटाएगी बल्कि मुर्गियों की सेहत के लिए भी वरदान साबित होगी.

 

सस्ता और प्रोटीन से भरपूर फीड

 

पोल्ट्री फीड के लिए आमतौर पर मक्का और सोयाबीन का इस्तेमाल होता है. जिनके दाम आसमान छू रहे हैं. इथेनॉल का कचरा यानी DDGS इन महंगे ऑप्शंस का एक बहुत ही किफायती रिप्लेसमेंट है. इसमें मक्के की तुलना में प्रोटीन की मात्रा काफी ज्यादा होती है. जो मुर्गियों के विकास के लिए बहुत जरूरी है.

जब आप अपने फीड मिक्स में एक निश्चित मात्रा में इसे मिलाते हैं. तो फीड की क्वालिटी तो बनी रहती है लेकिन उसे तैयार करने का खर्चा काफी कम हो जाता है. छोटे और बड़े दोनों तरह के पोल्ट्री फार्मर्स के लिए यह एक वेस्ट टू वेल्थ वाला आइडिया है. जो सीधे तौर पर उनकी बचत को बढ़ा देता है.

 

 

कैसे करें इस्तेमाल?

 

इथेनॉल वेस्ट को सीधे मुर्गियों को देने के बजाय उसे प्रॉपर तरीके से प्रोसेस करना जरूरी है. सबसे पहले इस गीले कचरे को सुखाया जाता है. जिससे इसमें नमी कम हो जाए और यह लंबे समय तक खराब न हो. इसके बाद इसे बारीक पीसकर मुर्गियों के रेगुलर दाने में मिक्स किया जाता है.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि पोल्ट्री फीड में करीब 10 से 15 परसेंट तक DDGS आसानी से मिलाया जा सकता है. हालांकि इसकी मात्रा मुर्गियों की उम्र और उनकी ब्रीड पर भी निर्भर करती है. सही मिश्रण तैयार करने से मुर्गियों का वजन भी सही तरीके से बढ़ता है और अंडों की क्वालिटी में भी सुधार देखने को मिलता है.

 

प्रदूषण कम मुनाफा ज्यादा

 

इथेनॉल प्लांट से निकलने वाले कचरे का मैनेजमेंट करना फैक्ट्रियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती होती है. अगर पोल्ट्री सेक्टर इस कचरे को कंज्यूम करने लगे. तो इससे पर्यावरण प्रदूषण कम होगा और वेस्ट मैनेजमेंट का एक सस्टेनेबल मॉडल तैयार हो जाएगा. बिजनेस के नजरिए से देखें तो फीड की लागत कम होने से किसानों का प्रॉफिट मार्जिन सीधा बढ़ जाता है.

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