एस आर दारापुरी
कल 31 जुलाई को दिली में जंतर मंतर पर चोटिल हुए पुलिसकर्मियों के परिवार वालों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस की गई। इसमें उन्होंने मुख्यतया अपने पिता/पति जो दिल्ली पुलिस में कार्यरत हैं, के 20 जुलाई को सीजेपी के प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई हिंसा में चोटिल होने तथा अपने भी अधिकार होने की बात कही। उनका यह भी आरोप था कि प्रदर्शनकारियों में भारी संख्या में शरारती तत्व शामिल थे जिन्होंने हिंसा फैलाई। उनका यह भी कहना था कि सोशल मीडिया में पुलिस वालों को खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है जिससे वे आहत हैं। अतः उन्हें भी न्याय मिलना चाहिए।
अब यदि घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों की शिकायत पर विचार किया जाए तो उनके पिता/पति का घायल होना वास्तव में चिंता एवं दुख की बात है। परंतु सोशल मीडिया से यह भी उभर कर आया है कि जंतर मंतर पर पुलिसकर्मियों द्वारा किया गया बल प्रयोग बर्बर एवं जरूरत से अधिक था। उनमें पुलिस द्वारा लड़कियों तथा औरतों के साथ दुर्व्यवहार तथा पुलिस की बर्बरता भी स्पष्ट दिखाई देती है। इसको झेलने वालों तथा देखने वालों के मन में पुलिस की कैसी छवि बनी होगी, का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या पुलिस वालों के परिवार उनके अभिभावकों द्वारा की गई बर्बरता एवं दुर्व्यवहार के लिए उन्हें दोषी मानने पर विचार करेंगे तथा उन्हें मानवीय होने एवं नियमों का पालन करने हेतु प्रेरित करेंगे? उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उनके पिता/पति स्वेच्छा से यह जानते हुए पुलिस में भर्ती हुए थे कि वहाँ पर चोट आदि भी लग सकती है। यह उनकी नौकरी का जोखिम है। इसके बारे में विकटिम कार्ड खेलने का कोई फायदा नहीं है।
पुलिस द्वारा भीड़ पर बल प्रयोग के नियमों में हल्के बल प्रयोग, केवल हिंसा कर रहे उपद्रवियों पर बल प्रयोग, लाठी डंडा/गोली कमर से नीचे मारने तथा उनके तितर बितर हो जाने पर बल प्रयोग रोक देने के आदेश हैं। यह नियम आईपीएस अफसरों से ले कर सिपाही रैंक तक के अफसरों को पढ़ाए जाते हैं तथा नकली प्रदर्शन करके इनका अभ्यास भी करवाया जाता है। उन्हें यह भी बताया जाता है कि बल प्रयोग का उद्देश्य भीड़ को तितर बितर करना है न कि बदले की भावना से प्रेरित हो कर उन्हें अधिक से चोट पहुंचा कर सबक सिखाना है। उन्हें यह भी बताया जाता है कि प्रदर्शनकारी अपने ही देश के नागरिक हैं जिन्हें अपनी मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
आइए अब देखें कि जंतर पर पुलिसकर्मियों द्वारा भीड़ नियन्त्रण संबंधी नियमों का कितना पालन किया गया। सोशल मीडिया पर उस समय के उपलब्ध वीडियोज में दिखाई देता है कि उनका खुल कर उल्लंघन किया गया। उनमें दिखाई देता है कि पुलिसकर्मियों द्वारा कितनी बर्बरता से लाठी तथा डंडे बरसाए गए। कैसे एक ही आदमी को एक से अधिक पुलिस वालों द्वारा जानवरों की तरह पीटा गया। यह माना कि लाठी चार्ज करने के अधिकारियों के आदेश थे परंतु डंडा कितने जोर से मारना है यह तो उनके हाथ में था। उनमें यह भी दिखाई देता है कि पुलिस द्वारा बरसाई गई लाठियाँ तथा डंडे बहुत जोर से कमर से नीचे मारने की बजाए सिर, कंधे तथा कमर पर मारे जा रहे थे जिनसे कई प्रदर्शनकारियों के सर फूटे तथा टांगें टूटी हैं। यह भी अत्यंत चिंता की बात है कि कई पुलिस वालों के हाथ में कील लगे डंडे तथा लकड़ी के पटड़े थे जो कि एकदम गलत है। वीडियोज में यह भी दिखाई देता है कि पुलिस वाले शांति से खड़े, पार्क में बैठे तथा अपने रास्ते पर जा रहे लोगों पर भी डंडे बरसा रहे थे जबकि बल प्रयोग हिंसा करने वाले व्यक्तियों पर ही किया जाना चाहिए। वीडियोज में पुलिस वाले डकैतों की तरह नकाब पहन कर अपनी पहचान छुपा रहे दिखाई देते हैं जो कि बिल्कुल गलत है।
यहाँ यह भी विचारणीय है कि पुलिसकर्मियों को चोटें क्यों और कैसे आईं। यह सभी जानते हैं कि धरने प्रदर्शन के दौरान हिंसा भी हो सकती है तथा पुलिस वालों को भी चोटें आ सकती हैं। अतः इससे बचने के लिए पुलिस वालों को सुरक्षा उपकरण जैसे हेलमेट तथा बाडी प्रोटेक्टर पहनाए जाते हैं। जैसे कहा जा रहा है कि पुलिस वालों की बड़ी संख्या (130) को चोटें आई हैं, अतः यह जानना जरूरी है कि क्या पुलिस वालों को वांछित मात्रा में सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए गए थे? यदि नहीं तो क्यों नहीं तथा इसके लिए कौन जिम्मेदार है? पुलिस वालों के परिवारों को इस बात को भी दिल्ली पुलिस के साथ उठाना चाहिए।
अतः मेरे विचार में जहां तक चोटिल हुए पुलिस कर्मियों का प्रश्न है हमारी संवेदना उनके परिवारों के साथ है। परंतु इसके साथ ही उन्हें यह भी देखना चाहिए कि उनके अभिभावकों ने जिस तरह से बर्बर एवं जरूरत से अधिक बल प्रयोग किया है और उससे प्रदर्शनकारियों को जो चोटें आई हैं वे बहुत चिंता की बात है। मेरा उनसे अनुरोध है कि उन्हें अपने अभिभावकों को अधिक संवेदनशील एवं नियम/कानून का अनुपालन करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें दिल्ली पुलिस से यह भी पूछना चाहिए कि उनके अभिभावकों को सुरक्षा उपकरण दिए गए थे या नहीं। यदि नहीं तो क्यों नहीं? केवल विकटिम कार्ड खेलने से कोई लाभ नहीं होगा। हमें जनहित में पुलिस को अधिक मानवीय, कानून का पालन करने वाली तथा जन मित्र बनाने की जरूरत है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित पुलिस सुद्धा जल्दी से जल्दी लागू किए जाने चाहिए।







