मुदनाकुडु चिन्नस्वामी
चुनाव चाहे कितनी भी नियमितता से हों, वे लोकतंत्र को तब तक बनाए नहीं रख सकते जब तक सामाजिक ऊँच-नीच समाज के बड़े हिस्से को सम्मान और समान अवसर से वंचित रखती है। जब से संविधान लागू हुआ है, भारत में लोकतंत्र का संकट लगातार बना हुआ है, चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल रहा हो। इस संकट के सबसे गहरे संरचनात्मक कारणों में से एक जाति व्यवस्था है, जो ऐतिहासिक रूप से हिंदू सामाजिक परिवेश में रची-बसी है और जो आज भी सामाजिक संबंधों और सत्ता तक पहुँच को आकार देती है।
संविधान में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को शामिल करने की डॉ. बी.आर. अंबेडकर की कोशिश जाति व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत है। संविधान एक बेहतरीन दस्तावेज़ है जो एक आदर्श समाज के लिए मार्गदर्शिका का काम कर सकता है। दुर्भाग्य से, हिंदू भारत लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को अपनाने और जाति व्यवस्था में निहित असमानता को खत्म करने के लिए तैयार नहीं था। हिंदू शास्त्रों के अनुसार शूद्रों और दलितों को ज़मीन, संपत्ति और शिक्षा हासिल करने से रोका गया था। इसलिए, उनके जीवन में संविधान का कोई खास महत्व नहीं था।
मौलिक अधिकारों ने निश्चित रूप से शोषितों को अधिकार दिए। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोज़गार के मामलों में समान अवसर सुनिश्चित करता है। ये अधिकार, प्रस्तावना और राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के साथ मिलकर, एक ऐसे समाज की परिकल्पना पेश करते हैं जो शोषण से मुक्त हो और हर इंसान के सम्मान को बनाए रखे।
चुनाव से परे लोकतंत्र
भारत को अक्सर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में सराहा जाता है। आज़ादी के बाद से, इसने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, समय-समय पर चुनाव और संवैधानिक ढांचे के भीतर सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण को बनाए रखा है। भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में ये उपलब्धियाँ कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।
फिर भी, लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित नहीं किया जा सकता। चुनावी प्रतिस्पर्धा लोकतांत्रिक जीवन का केवल एक पहलू है। लोकतंत्र तभी सार्थक होता है जब नागरिकों को सार्वजनिक जीवन में भाग लेने और सामूहिक फैसलों को प्रभावित करने के समान अवसर मिलें। इसलिए, प्रक्रियात्मक लोकतंत्र और वास्तविक (या सारपूर्ण) लोकतंत्र के बीच का अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। प्रक्रियात्मक लोकतंत्र वोट देने का अधिकार पक्का करता है; जबकि वास्तविक लोकतंत्र यह पक्का करता है कि हर नागरिक को बराबरी का सम्मान, बराबरी का मौका और न्याय तक बराबरी की पहुँच मिले। भारतीय लोकतंत्र का संकट ठीक इन्हीं दो आदर्शों के बीच बढ़ती खाई से पैदा होता है।
अंबेडकर और लोकतांत्रिक क्रांति
भारत 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र बना। लिखित संविधान अपनाया गया और लागू करने के स्तर पर, सभी अहम पदों पर ऊँची जातियों के लोग काबिज़ थे। अंबेडकर ने गहरी चिंता जताई थी कि सामाजिक बदलाव के बिना राजनीतिक आज़ादी, जाति-आधारित ऊँच-नीच के ढांचे को काफ़ी हद तक वैसा ही बनाए रख सकती है।
पेरियार ई. वी. रामास्वामी ने कहा था कि ‘ब्रिटिश शासन से आज़ाद होने के बाद भारत में सत्ता ब्राह्मणों के हाथों में चली गई’। जाति-प्रथा को खत्म करने का अंबेडकर का अभियान अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। यह उनकी सबसे बड़ी निराशा थी। उस समय तक, शूद्र, जो आबादी में ज़्यादा थे, कुछ ज़मीन और संपत्ति हासिल कर चुके थे और छोटे-मोटे व्यापार भी करने लगे थे। वैश्य, जिनकी संख्या कम थी, ने खुद को बोझ से मुक्त करने के लिए अपने रीति-रिवाजों को छोड़ दिया था। देश के कुछ हिस्सों में शूद्र समुदाय के लोगों ने आंदोलन और संघर्ष किए। लेकिन दलित, जिन्हें तथाकथित अछूत माना जाता था, पीछे छूट गए। उनकी स्थिति वैसी ही बनी रही।
ब्राह्मण और दबदबे वाली जातियों के लोग केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर अहम संस्थाओं – विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया – में सत्ता पर काबिज़ थे।
दलितों और ऐतिहासिक रूप से पिछड़े कई अन्य समुदायों को शिक्षा से दूर रखने के कारण सत्ता के पदों तक उनकी पहुँच बहुत सीमित हो गई। संविधान सिर्फ़ चुनाव कराने की प्रक्रिया तक ही सीमित रह गया। बाकी चीज़ें, जैसे उम्मीदवारों का चयन, वोटिंग का तरीका, मंत्रियों के पद बाँटना, ये सब दबदबे वाली जातियों की मर्ज़ी पर निर्भर थे और आज भी ऐसा ही है।
मेरी नज़र में, संविधान की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक उपलब्धि ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ थी – यानी ‘एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य’ का सिद्धांत – जिसके लिए अंबेडकर पूरी तरह प्रतिबद्ध थे, भले ही गांधी जैसे कद्दावर नेताओं ने भी इसका विरोध किया था। वोट ने दलितों को कुछ हद तक राजनीतिक पहचान दी, भले ही सामाजिक बराबरी नहीं मिल पाई।
25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में बोलते हुए, अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि भारत विरोधाभासों वाले जीवन में प्रवेश कर रहा है। जहाँ राजनीतिक समानता है, वहीं गहरी सामाजिक और आर्थिक असमानता भी है। उन्होंने तर्क दिया कि यह विरोधाभास अंततः लोकतंत्र के लिए ही खतरा बन जाएगा, जब तक कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतंत्र भी न हो। अंबेडकर ने जाति को लोकतांत्रिक नागरिकता के लिए सबसे बड़ी बाधा माना। ऊंच-नीच वाली असमानताओं में बंटा समाज भाईचारे को बढ़ावा नहीं दे सकता, और भाईचारे के बिना, समानता कमजोर बनी रहती है और स्वतंत्रता कुछ ही लोगों का विशेषाधिकार बन जाती है। इसलिए संविधान का उद्देश्य केवल प्रतिनिधि संस्थाएं स्थापित करना नहीं था, बल्कि विरासत में मिली ऊंच-नीच की व्यवस्था के खिलाफ सामाजिक क्रांति की शुरुआत करना भी था।
समकालीन भारत में लोकतंत्र का संकट
भारत में मौजूदा लोकतांत्रिक संकट कई तरह से सामने आता है। लोकतंत्र को तेजी से चुनावी जीत के बराबर माना जाने लगा है। सरकारें चुनावों के माध्यम से वैधता हासिल करती हैं, फिर भी लोकतांत्रिक वैधता संवैधानिक नैतिकता, संस्थागत स्वायत्तता, न्यायिक स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रता की सुरक्षा पर भी निर्भर करती है। केवल चुनाव ही लोकतांत्रिक शासन की गारंटी नहीं दे सकते। इस पहलू पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से 2014 के बाद की सरकार, जो लोकतांत्रिक मानदंडों का बहुत कम सम्मान करती है।
पहला, 2023 में चुनाव आयोग की नियुक्ति करने वाली चयन समिति के सदस्यों की संरचना बदल दी गई। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को उस समिति से हटा दिया गया जो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयोग (EC) के अन्य सदस्यों का चयन करती है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में न्यायपालिका की भागीदारी खत्म हो गई और EC की स्वतंत्रता पर चिंताएं पैदा हुईं।
दूसरा, मुख्यधारा की मीडिया के कुछ हिस्सों के स्वामित्व और संपादकीय स्वतंत्रता चिंता का विषय बन गए हैं, खासकर राजनीतिक और कॉर्पोरेट हितों के साथ उनकी कथित निकटता के कारण। मुख्यधारा की मीडिया के एक हिस्से की आलोचना इस बात के लिए की जाती रही है कि वे एक स्वतंत्र प्रहरी (वॉचडॉग) के रूप में कम और राजनीतिक व्यवस्था के समर्थक के रूप में अधिक काम करते हैं। मीडिया के स्वामित्व का बढ़ता केंद्रीकरण और राजनीतिक व कॉर्पोरेट हितों के साथ मुख्यधारा की मीडिया के कुछ हिस्सों का कथित जुड़ाव, मीडिया की विविधता और संपादकीय स्वतंत्रता के बारे में गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर है।
स्वतंत्र संस्थाओं को तेजी से राजनीतिक प्रभाव के तहत लाया जा रहा है और राजनीतिक विरोधियों तथा नागरिक समाज के कुछ वर्गों के खिलाफ उनका इस्तेमाल किया जा रहा है। न्यायिक स्वतंत्रता पर दबाव और संवैधानिक फैसलों पर कार्यपालिका के प्रभाव की संभावना के बारे में भी चिंताएं व्यक्त की गई हैं। यह संस्थाओं के बढ़ते विघटन का संकेत है। अंबेडकर ने हमें बौद्ध संघों की प्राचीन भारतीय गणतंत्रवादी परंपराओं की याद दिलाई, जहाँ बैलेट पेपर के ज़रिए चुनाव होते थे; इसी से यह दावा निकला कि भारत “लोकतंत्र की जननी” है। उस विरासत की पवित्रता अब कमज़ोर हो रही है। शिक्षा, रोज़गार, ज़मीन के मालिकाना हक, घर, शादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक पहुँच में जाति व्यवस्था आज भी गहराई से जमी हुई है। कानून के सामने औपचारिक समानता ने भी ढांचागत भेदभाव को खत्म नहीं किया है।
आर्थिक असमानता और बढ़ी है। धन का एक जगह जमा होना अक्सर असमान राजनीतिक प्रभाव, असमान शैक्षिक अवसरों और सार्वजनिक संसाधनों तक असमान पहुँच में बदल जाता है। जब नागरिकता असमान जीवन-अवसरों से तय होती है, तो लोकतंत्र और कमज़ोर हो जाता है। ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट’ के अनुसार, भारत की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा आबादी के सबसे अमीर 1% लोगों के पास है, जबकि सबसे गरीब 50% लोगों के पास सिर्फ़ 6% हिस्सा है। भूख के वैश्विक सूचकांक में, सर्वे किए गए 123 देशों में भारत 102वें स्थान पर है।
लोकतांत्रिक संसाधन के तौर पर दलित चेतना
सार्वजनिक बातचीत का माहौल बंट गया है। लोकतांत्रिक बहस की जगह अब पहचान-आधारित लामबंदी, गलत जानकारी और विचारधारा-आधारित दुश्मनी ले रही है। लोकतंत्र बातचीत, असहमति और आपसी सम्मान पर टिका होता है। जब असहमति को गलत या गैर-कानूनी ठहराया जाता है, तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमज़ोर हो जाती है, भले ही चुनावी संस्थाएं काम करती रहें।
‘वेरायटीज़ ऑफ़ डेमोक्रेसी’ (V-Dem) रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत को ‘चुनावी तानाशाही’ (electoral autocracy) की श्रेणी में रखा गया है। राजनीतिक दखलंदाज़ी के कारण विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में कमी आई है। यह रिपोर्ट उच्च शिक्षा में हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को व्यवस्थित रूप से लागू करने पर ज़ोर देती है। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भारी बदलाव आया है। पाठ्यपुस्तकों से मुग़ल इतिहास को लगभग मिटा दिया गया है। शैक्षणिक आज़ादी का यह दायरा सिमटना लोकतंत्र को कमज़ोर करता है।
सार्वजनिक बहस की जगह लगभग खत्म हो गई है। उसी V-Dem रिपोर्ट के अनुसार, लोकतंत्र के पैमानों पर 179 देशों में भारत का स्थान 105वां है। पॉलिटिकल साइंटिस्ट क्रिस्टोफ़ जैफ़्रेलॉट इसे लोकतंत्र के कमज़ोर होने का दौर कहते हैं। राजनीतिक और आर्थिक ताकत कुछ ही हाथों में सिमट गई है। उनका कहना है कि इस दौर में असमानता बढ़ी है, लेकिन धर्म के नाम पर गरीबों ने अमीरों के पक्ष वाली सरकार का समर्थन करना जारी रखा है। इसके अलावा, मुख्यधारा की राजनीति से मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से बाहर रखा जा रहा है, जबकि लोकतंत्र एक समावेशी समाज की मांग करता है।
दलित चेतना लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक प्रहरी की तरह काम करती है। यह विरासत में मिली ऊंच-नीच की व्यवस्था को चुनौती देती है। यह नागरिकता के अर्थ का विस्तार करती है। यह केवल प्रतिनिधित्व के बजाय सम्मान पर ज़ोर देती है। यह दिखावटी समानता और असल असमानता के बीच के विरोधाभास को उजागर करती है और संवैधानिक नैतिकता को मज़बूत करती है। इसलिए, दलितों की मुक्ति कोई सीमित एजेंडा नहीं है; यह खुद भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा है।
छुआछूत का बने रहना
संविधान का खुलेआम उल्लंघन हुआ है, जिस पर पर्याप्त हंगामा नहीं हुआ। भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मार्च 2022 में अपनी पत्नी के साथ ओडिशा के पुरी जगन्नाथ मंदिर गए थे, लेकिन पुजारियों ने उन्हें मंदिर के अंदर नहीं जाने दिया क्योंकि वे दलित समुदाय से थे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो एक आदिवासी महिला हैं, को भी हाल ही में उसी जगह ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा। भारत के प्रथम नागरिक होने के बावजूद उन्हें ऐसे अपमान का सामना करना पड़ा। संवैधानिक असर होने के बावजूद इस घटना पर राष्ट्रीय मीडिया का लगातार ध्यान नहीं गया। मीडिया और यहां तक कि संसद में भी इस पर हंगामा होना चाहिए था।
गांवों में सवर्ण हिंदू आज भी दलितों का मंदिरों में प्रवेश शायद ही स्वीकार करें। बाबासाहेब भी दलितों के मंदिरों में प्रवेश को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। जहां उन्होंने सार्वजनिक सुविधा के अधिकार के तौर पर महाड के चौदार टैंक से पानी पीने के लिए ठोस प्रयास किए, वहीं मंदिर प्रवेश को लेकर उन्हें कुछ हिचकिचाहट थी क्योंकि उनका मानना था कि दलितों को सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेना चाहिए। 1935 में नासिक में कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन के विफल होने के बाद ही उन्होंने यह घोषणा की थी कि वे कभी भी हिंदू के तौर पर नहीं मरेंगे। गांधी भी दलितों के मंदिरों में प्रवेश के पक्ष में नहीं थे, और न ही उन्होंने छुआछूत खत्म करने के लिए सत्याग्रह का इस्तेमाल किया। मशहूर वाइकोम सत्याग्रह में भी, उन्होंने दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए ऊंची जाति के लोगों की मंज़ूरी (जनमत संग्रह के ज़रिए) लेने का समर्थन किया था, जिसकी उम्मीद कोई नहीं कर सकता था।
अब दिसंबर 2022 में तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई ज़िले के एक गाँव में हुई एक भयानक घटना को याद करना ज़रूरी है, जहाँ दलित बस्ती के लिए बने पानी के टैंक में इंसानी मल डाला हुआ मिला था। गाँव वालों को तब कुछ गड़बड़ होने का एहसास हुआ जब बच्चे बीमार पड़ने लगे और डॉक्टरों ने उन्हें पीने के पानी की गुणवत्ता की जाँच करने के लिए कहा।
इसकी वजह यह थी कि दलित पुरुषों और महिलाओं का एक समूह पुलिस की सुरक्षा में गाँव के मंदिर में गया था, जिससे ऊंची जाति के लोग नाराज़ हो गए और बदले में इतनी चरम और अमानवीय हरकत की। दलितों को सामूहिक सज़ा दी गई क्योंकि उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने के संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया था।
इलाहाबाद में, एक ‘ऊंची जाति’ के जज ने, जब एक दलित जज की जगह ली, तो कोर्टरूम को गंगाजल से ‘शुद्ध’ करवाया। यह घटना संविधान की रक्षा करने वालों द्वारा ही संवैधानिक मूल्यों को खत्म करने की कोशिश थी। हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सवर्ण हिंदू किस कीमत पर जाति व्यवस्था और छुआछूत जैसी घिनौनी प्रथा को बनाए रखना चाहते हैं। जातिगत संस्थाओं, धार्मिक अधिकारियों और मठों की ज़िम्मेदारी है कि वे लोगों को इस पुरानी प्रथा को छोड़ने के लिए शिक्षित करें, जो हिंदू धर्म का अपमान है और जिसकी वजह से दुनिया के सामने देश को शर्मिंदा होना पड़ता है।
इस देश में दलितों पर अत्याचार रोज़ की बात है। उत्तराखंड के हल्द्वानी रामलीला मैदान में हुई हालिया घटना बहुत चर्चित है। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अगस्त में वहाँ एक सभा को संबोधित किया था। दो दिन बाद, एक हिंदू समूह ने उसी जगह पर ‘शुद्धिकरण अनुष्ठान’ किया क्योंकि खड़गे दलित समुदाय से हैं, इसलिए उस जगह को अपवित्र माना गया था। यह संविधान द्वारा गारंटीकृत समानता के अधिकार का घोर उल्लंघन है। यह दलित चेतना पर हमले के अलावा और कुछ नहीं है।
समानता का दावा
अक्सर दलित चेतना को सिर्फ़ अपनी पहचान ज़ाहिर करने या शिकायतों की राजनीति के तौर पर गलत समझा जाता है। ऐसी सोच इसके असल लोकतांत्रिक स्वरूप को नज़रअंदाज़ करती है। दलित चेतना जाति-आधारित ऊँच-नीच के ख़िलाफ़ एक नैतिक और राजनीतिक चुनौती के तौर पर उभरी। इसने जन्म-आधारित असमानता की वैधता पर सवाल उठाए और इंसानी गरिमा के सार्वभौमिक सिद्धांत पर ज़ोर दिया। इसने अपमान को राजनीतिक प्रतिरोध में और अलग-थलग किए जाने को लोकतांत्रिक भागीदारी में बदल दिया।
दलितों द्वारा समानता की माँग किसी विशेषाधिकार की माँग नहीं, बल्कि संवैधानिक नागरिकता की माँग है। आरक्षण की नीतियाँ, शिक्षा तक पहुँच, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कानूनी सुरक्षा और सकारात्मक कार्रवाई (अफ़र्मेटिव एक्शन) को अक्सर रियायतें समझ लिया जाता है। असल में, इनका मकसद ऐतिहासिक रूप से जमा हुए ढाँचागत नुकसानों को ठीक करना है। असमान समूहों के साथ एक जैसा व्यवहार करके समानता हासिल नहीं की जा सकती। कभी-कभी सही मायने में समान अवसर पैदा करने के लिए अलग-अलग उपायों की ज़रूरत होती है। अमर्त्य सेन ने सिर्फ़ आर्थिक विकास बढ़ाने के बजाय इंसानी क्षमताओं को बढ़ाने पर ज़ोर दिया। ये सैद्धांतिक विचार अंबेडकर की इस बात से मेल खाते हैं कि लोकतंत्र को समान भागीदारी रोकने वाली संस्थागत बाधाओं को तोड़ना चाहिए। इसलिए, समानता की माँग नागरिकता का दायरा बढ़ाकर और सार्वजनिक भागीदारी को व्यापक बनाकर लोकतंत्र को मज़बूत करती है।
अनुच्छेद 330 और 332 के तहत आरक्षण की व्यवस्था की वजह से सार्वजनिक क्षेत्र में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व दिखता है। आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के बिना, SCs का राजनीतिक प्रतिनिधित्व संभव नहीं होता। लेकिन विशेषाधिकार प्राप्त जातियों द्वारा खड़ी की गई बाधाओं के कारण वे अभी भी ऊँचे पदों तक पहुँचने के लिए संघर्ष करते हैं। उच्च शिक्षा के स्तर पर भेदभाव बड़े पैमाने पर होता है। कई प्रतिष्ठित संस्थानों में SC और ST समुदायों के छात्रों का प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है, और जो वहाँ पहुँचते भी हैं, उन्हें जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता है। प्रवेश के स्तर पर हमेशा जातिगत अहंकार काम करता है और वंचित निचली जातियों के उम्मीदवारों को बेरहमी से बाहर कर दिया जाता है। अगर कुछ लोग संस्थानों में प्रवेश पाने में सफल भी हो जाते हैं, तो उन्हें अलग-थलग कर दिया जाता है और अलग फ़्लोर/कमरों में रखा जाता है। AIIMS जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव, अपमान और छात्रों द्वारा आत्महत्या के मामले सामने आए हैं।
निष्कर्ष
भारत में लोकतंत्र का संकट मूल रूप से समानता का संकट है। चुनाव चाहे कितने भी नियमित क्यों न हों, अगर सामाजिक ऊँच-नीच समाज के बड़े हिस्सों को गरिमा और समान अवसर देने से इनकार करती रहती है, तो लोकतंत्र कायम नहीं रह सकता। दलित चेतना इस विरोधाभास को चुनौती देती है और इस बात पर ज़ोर देती है कि लोकतंत्र को औपचारिक प्रक्रियाओं से आगे बढ़कर वास्तविक न्याय की ओर बढ़ना चाहिए।
इसलिए, जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष लोकतंत्र को और गहरा करने के संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता। समानता, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों पर ज़ोर देकर, दलित चेतना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमज़ोर नहीं करती; बल्कि उसे नई ऊर्जा देती है। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य न केवल चुनाव कराने के तरीके पर निर्भर करेगा, बल्कि इस बात पर भी कि वह आंबेडकर के उस समाज के सपने को कितना पूरा कर पाता है जो आज़ादी, बराबरी, भाईचारे और हर इंसान की बराबर अहमियत पर आधारित हो। दलित चेतना सिर्फ़ संकट के प्रति एक प्रतिक्रिया नहीं है; यह उससे निपटने का एक लोकतांत्रिक तरीका भी देती है – बराबरी, सम्मान, भाईचारे, संवैधानिक नैतिकता और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही ऊँच-नीच का विरोध करके।
मुदनाकुडु चिन्नस्वामी कन्नड़ भाषा के जाने-माने कवि, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्वान और लेखक हैं।
सौजन्य: द वायर
अंग्रेजी लेख का लिंक: https://thewire.in/caste/dalit-consciousness-and-the-crisis-of-democracy








