चिराग-मांझी-कुशवाहा के बीच बयानबाजी तेज
दीपक कुमार तिवारी
पटना। बिहार में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही एनडीए के अंदर सीटों की सियासत तेज हो गई है। गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। खासकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान, हम प्रमुख जीतनराम मांझी और रालोमो नेता उपेंद्र कुशवाहा के बीच सियासी जंग तेज हो गई है।
इन तीनों नेताओं के बीच न सिर्फ ज्यादा सीटों के लिए रस्साकशी हो रही है, बल्कि एक-दूसरे पर जुबानी हमले भी तेज हो गए हैं। चिराग पासवान के बिहार में लॉ एंड ऑर्डर को लेकर दिए गए बयान के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने खुलकर नाराजगी जाहिर की है। वहीं जीतनराम मांझी लगातार चिराग पर व्यक्तिगत तंज कसते हुए अपने आप को बड़ा दलित नेता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।
भाजपा की मुश्किल बढ़ी, सहयोगी दलों को साधने की चुनौती:
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो चिराग, मांझी और कुशवाहा की पार्टियां भाजपा के कोटे में आती हैं, लिहाजा इन तीनों को संतुष्ट करना भाजपा की जिम्मेदारी होगी। चूंकि भाजपा को अपनी सीटें छोड़कर इन दलों को सीटें देनी होंगी, ऐसे में सभी की अपेक्षाएं पूरी कर पाना नामुमकिन जैसा है। चिराग को जहां ज्यादा सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है, वहीं मांझी और कुशवाहा को अपेक्षाकृत कम सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है।
दलित नेतृत्व की लड़ाई: मांझी बनाम चिराग
मांझी और चिराग के बीच दलित राजनीति में वर्चस्व की जंग अब तीखी हो गई है। 2019 लोकसभा चुनाव से शुरू हुई यह लड़ाई अब विधानसभा चुनाव से पहले और भी धारदार हो चुकी है। मांझी खुद को सबसे बड़ी दलित आबादी (मांझी जाति) का प्रतिनिधि बताते हैं, जबकि चिराग पासवान का दावा है कि वे पासवानों का सौ फीसदी वोट ट्रांसफर कर सकते हैं। चिराग को लोकसभा में 5 में से 5 सीटों पर मिली जीत ने उन्हें गठबंधन में ऊंचा कद दिलाया है, जो अब मांझी और कुशवाहा के लिए चुनौती बन गया है।
मांझी ने चिराग पर तंज कसते हुए कहा, “मजबूत लोग बोलते नहीं, कमजोर लोग दिखावा करते हैं। 10 कारों में घूमने वाला सिर्फ नारेबाजी करता है, जमीनी समर्थन नहीं है।” यह बयान चिराग के लगातार बढ़ते प्रभाव पर मांझी की खीझ को दर्शाता है।
कुशवाहा की उलझन, जमीन कमजोर लेकिन दावेदारी मजबूत:
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोमो के पास इस समय न तो कोई विधायक है, न सांसद। लोकसभा चुनाव में उन्हें एक सीट दी गई थी लेकिन वे हार गए। इसके बावजूद वे विधानसभा में हिस्सेदारी के लिए अड़े हुए हैं। कुशवाहा का दावा है कि उनके पास कोइरी (कुशवाहा) वोट बैंक है, जो कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
NDA के सामने फॉर्मूले की चुनौती:
तीनों दलों में किसी के पास वर्तमान में विधायक नहीं है। ऐसे में भाजपा को जातीय समीकरण, सुरक्षित सीटें और प्रभाव क्षेत्रों का विश्लेषण कर इन पार्टियों को एडजस्ट करना होगा। यह कार्य आसान नहीं है, क्योंकि चिराग की विजय क्षमता को देखते हुए भाजपा उन्हें तरजीह देना चाहेगी, जबकि मांझी और कुशवाहा विरोध करेंगे।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए के सहयोगी दलों में जो अंदरूनी घमासान चल रहा है, वह भाजपा के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। चिराग, मांझी और कुशवाहा के बीच सीटों की जंग ने गठबंधन की एकता पर सवाल खड़ा कर दिया है। देखना होगा कि भाजपा क्या फॉर्मूला अपनाती है जिससे सियासी संतुलन बना रहे और चुनावी गणित भी फिट बैठे।






