चंद्रशेखर जी जन्मदिवस पर : चंद्रशेखर जी के राजनीतिक जीवन की लंबी दास्तान

राजकुमार जैन

चंद्रशेखर जी के राजनीतिक जीवन की लंबी दास्तान है। समाजवादी चंद्रशेखर, ‌ युवा तुर्क चंद्रशेखर, प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, भोंडसी आश्रम के चंद्रशेखर वगैरा-वगैरा। इस दौरान हर तरह के अनगिनत लोगों से उनका नजदीक का संबंध बना,‌ हर कोई महसूस करता कि मेरे ताल्लुक़ात ऐसी शख्सियत से हैं जिनकी संगत से कभी शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ेगी, अगर कोई मुसीबत आन पड़ी तो अध्यक्ष जी (‌ अदब, खुलूश मोहब्बत में‌ चंद्रशेखर जी को उनके साथी, अनुयायी ‌ अध्यक्ष जी कहकर संबोधित करते थे) ढाल बनकर मेरे साथ खड़े होंगे।
मैं भी उन लोगों में ही हूं, ‌ उनकी संगत में मैंने जो देखा और किया उनके जन्मदिवस के मौके पर उनमें से ‌ कुछ घटनाक्रमों को ‌ रेखांकित करने का प्रयास कर रहा हूं।
समाजवादी कार्यकर्ता होने के नाते, चन्द्रशेखर जी से व्यक्तिगत परिचय होने से पहले ही मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। वे कांग्रेस पार्टी में थे, जबकि मैं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य था। कांग्रेस-विरोधी होने के नाते मैं उनका विरोधी था, परंतु अन्य समाजवादियों से उनके बारे में जो बातें सुनने को मिली थीं, उनके आधार पर मेरे मन में उनके प्रति आदर और सम्मान की भावना बनी रहती थी।
सन् 1974 में जयप्रकाश जी का आंदोलन शुरू हो चुका था। चन्द्रशेखर जी कांग्रेस पार्टी के नेता थे। इन्दिरा जी जयप्रकाश जी के विरोध में थीं, किंतु चन्द्रशेखर जी जे.पी. और इन्दिरा जी के बीच मतभेदों को पाटना चाहते थे। इन्दिरा जी की नापसंदगी के बावजूद उन्होंने अपने घर पर जयप्रकाश जी के सम्मान में एक चाय-गोष्ठी का आयोजन किया। राजनीतिक हलकों में यह एक बड़ी खबर थी।
इसी बीच दिल्ली के कुछ कांग्रेसी नेताओं, जिनमें पी. एन. सिंह प्रमुख थे, (‌ वे मूलतः बलिया के रहने वाले थे,‌ दिल्ली विधानसभा के भी सदस्य बने, आपातकाल में ‌ मीसाबंदी भी रहे थे) ने ‌ चंद्रशेखर जी के विचार सुनने के लिए सरोजिनी नगर में जनसभा का आयोजन किया। मैं भी उत्सुकतावश उस सभा में पहुँच गया। चन्द्रशेखर जी के भाषण के आरम्भ में ही कुछ इन्दिरा-समर्थक कांग्रेसियों ने यह कहते हुए हंगामा शुरू कर दिया कि “यह जे.पी. का दलाल है।” कुछ ही क्षणों में शोर-शराबा और धक्का-मुक्की शुरू हो गई। मैं अनायास ही चन्द्रशेखर जी के समर्थन में नारे लगाने लगा।
25 जून 1975 को जब ‌ उनको यह पता चला कि ‌ जयप्रकाश जी को गिरफ्तार करके पार्लियामेंट थाने ले जाया गया है, तो चन्द्रशेखर जी स्वयं उनसे मिलने थाने पहुँच गए। जेपी को देखकर उन्होंने रोष में कहा ‌‌ आजादी के इस सिपह सालार को ‌ गिरफ्तार करके लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। पुलिस के बड़े अफसर ने होम मिनिस्टर को इसकी सूचना दी गृहमंत्री ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को, प्रधानमंत्री ने ‌ हुक्म दिया की ‌ इन्हें भी गिरफ्तार कर लो। ‌ तत्पश्चात उन्हें भी मीसा के अंतर्गत बंद कर दिया गया।
उस दिन मुझे लगा कि चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले नेता हैं।
नागरिक अधिकारों ‌ की हिमायत ‌ चंद्रशेखर जी ‌ हमेशा‌ किया करते थे। 1974 में दो नक्सलवादी‌ नेताओं किस्ता गोंड और भूमिया‌ को मृत्युदंड की घोषणा हो चुकी थी। दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में उनकी फांसी की सजा को ‍ निरस्त करवाने के लिए जनसभा का आयोजन हुआ था जिसमें चंद्रशेखर जी और जार्ज फर्नांडिस‌ मुख्य वक्ता थे। हम तीन समाजवादी साथी रविंद्र मनचंदा,‌ ललित गौतम,‌ और मैं‌ भी उस सभा में शामिल थे। चंद्रशेखर जी ने सभा में कहा था कि मैं किसी को फांसी की सजा देने के खिलाफ हूं, ‌ इसलिए इन दोनों की फांसी की सजा के‌ बजाय‌ अन्य सजा दी जा सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मैं हर प्रकार की हिंसा के खिलाफ हूं,‌ नौजवानों को हिंसा का मार्ग छोड़कर अहिंसात्मक ढंग से अपना विरोध दर्ज करना चाहिए। सभा के बाद हम साथीयों ‌ ने नारा लगाना शुरू कर दिया कि किस्सा गोंड‌ भूमिया को रिहा किया जाए। अध्यक्ष जी के साथ ब्रह्मानंद जी भी थे ‌ जिनसे हमारी गहरी छनती थी‌ उन्होंने कहा चलिए काफी पी जाए। हम तीनों अध्यक्ष जी के साथ ‌ तीन मूर्ति गए।चंद्रशेखर जी से ‌ शुरुआत में निकटता का संबंध ब्रह्मानंद जी के कारण हुआ। ‌ ब्रह्मानंद जी ‌ पुराने सोशलिस्ट ‌ तथा विद्वान व्यक्ति थे। चंद्रशेखर जी से उनका अति निकट का रिश्ता था‌। उन्होंने समाजवादियों के कई ग्रंथों ‌का संपादन भी किया था। आचार्य नरेंद्र के भाषणों विचारों का एक संकलन भी उनके द्वारा हुआ। चंद्रशेखर जी द्वारा संचालित पत्रिका ‘यंग इंडियन’ के भी वे‌ संपादक मंडल में थे तथा पत्रिका की ‌ रूपरेखा तैयार करने में उनकी मुख्य भूमिका रहती थी। वे अविवाहित थे, ‌ हम लोगों के साथ उनका ‌ अति निकटता का संबंध बन गया था, ‌ चंद्रशेखर जी ‌ हमको एक साथ देखकर कई बार मजाक में कहते थे,‌ आप लोगों की क्या साजिश चल रही है।
सत्ता के गलियारों में रहकर सत्ता की बंदरबांट में शामिल हो जाना बहुत आसान होता है, परंतु चन्द्रशेखर जी हमेशा इसके विपरीत रहे। राजनीति के केंद्रीय मंच पर रहते हुए भी सत्ता और पद का लोभ उन्हें विचलित नहीं कर पाया। इन्दिरा जी के केंद्रीय मंत्रिमंडल से लेकर 1977 की जनता पार्टी सरकार तक, जब उनका नाम पहले पाँच मंत्रियों की सूची में था, तब भी उन्होंने मंत्री बनना स्वीकार नहीं किया। आपातकाल‌‌ की समाप्ति के बाद‌ जनता पार्टी की सरकार के मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बन चुके थे। उनके मंत्रिमंडल में विभिन्न घटकों के मंत्रियों को बनाने की प्रक्रिया जारी थी हालांकि चंद्रशेखर जी किसी एक घटक के प्रतिनिधि नहीं थे परंतु उनको मंत्रिमंडल में लेने पर एक आम सहमति थी। चंद्रशेखर जी के साथी मोहन धारिया का कहना था कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने उनके साथ बहुत अन्याय किया है उनका सम्मान बरकरार होना चाहिए। चंद्रशेखर जी ने दोस्ती निभाते हुए मोरारजी भाई को सूचित किया कि मंत्रिमंडल की सूची से उनका नाम हटाकर उनके स्थान पर मोहन धारिया को मंत्री बना दिया जाए।
इसी तरह वी.पी. सिंह की सरकार में उपप्रधानमंत्री का पद ठुकरा देना उनके त्याग और साहस का अनूठा उदाहरण है। राजीव गांधी की एक संविधानेत्तर टिप्पणी सुनकर प्रधानमंत्री पद से तत्काल इस्तीफा देने की घोषणा कर उन्होंने राजीव गांधी को हक्का-बक्का कर दिया था। भारतीय राजनीति में ऐसे विरल उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।
अन्याय के प्रतिकार के लिए बिना लाभ-हानि का हिसाब लगाए खड़े हो जाना, चाहे उसमें कितना भी जोखिम क्यों न हो, चन्द्रशेखर जी के स्वभाव का हिस्सा था। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जरनैल सिंह भिंडरांवाले के विरोध में ब्लू स्टार ऑपरेशन हो चुका था। चन्द्रशेखर जी ने ब्लू स्टार का विरोध करते हुए कहा कि यह गलत है; हम देश को गोली से नहीं, बोली से सुधार सकते हैं। भारत के शहरी मध्यम वर्ग में उनके इस वक्तव्य के विरोध में भावनाएँ उभरी थीं।
नवंबर 1984 की घटना मैं कभी नहीं भूल सकता। इन्दिरा जी की हत्या के प्रतिशोध में दिल्ली के बेकसूर सिखों का कत्लेआम हो रहा था। दिल्ली धू-धू कर जल रही थी। चन्द्रशेखर जी दिल्ली में ही थे और इन समाचारों से अत्यंत बेचैन थे। सहसा उनका जुझारू समाजवादी रूप जाग उठा। उस समय पास बैठे दस-बारह लोगों और कुछ अन्य साथियों को लेकर वे दिल्ली के सर्वाधिक पीड़ित इलाके भोगल की ओर शांति मार्च के लिए निकल पड़े। भोगल जल रहा था। चारों ओर ईंटों, पत्थरों, बोतलों, लाठियों और तलवारों से हमले हो रहे थे। चन्द्रशेखर जी आगे ही बढ़ते जा रहे थे और हम कार्यकर्ता उनके पीछे “हिंदू-सिख एकता ज़िंदाबाद” के नारे लगा रहे थे। मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों ने कहा, “चन्द्रशेखर जी, आगे मत जाइए, बहुत खतरा है।” परंतु उन्होंने उनकी बात अनसुनी कर आगे बढ़ना जारी रखा। मुझे लगता है कि अगर उस दिन स्वामी अग्निवेश अपने भगवा वस्त्रों में उस जुलूस में न होते, तो कोई भी अनहोनी घट सकती थी।
कई बार हमारे नेता सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में जन-विरोधी नीतियों का समर्थन कर बैठते हैं, जो बाद में बहुत घातक सिद्ध होता है। नई आर्थिक नीतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, मुक्त व्यापार, विनिवेशीकरण आदि के दुष्परिणाम आज जनता भोग रही है। जब नई औद्योगिक नीति प्रारंभ हुई, तब चन्द्रशेखर जी ने उसका विरोध करते हुए चेताया था। उस समय नई आर्थिक नीति से “स्वर्ग का राज” स्थापित होने के सपने बुने जा रहे थे। सरकार और मध्यम वर्ग का घोर विरोध सहते हुए भी उन्होंने नई आर्थिक नीतियों के विरुद्ध अलख जगाई।

मैंने अपने जीवन में दो नेताओं राज नारायण जी और चंद्रशेखर ‌ जी को देखा‌ जो अपने कार्यकर्ताओं‌ की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। खास तोर से‌ गरीब साधन हीन‌ कार्यकर्ताओं का‌ विशेष ध्यान रखते थे। उनके पास‌ मिलने के लिए कोई साधन संपन्न व्यक्ति आया हुआ हो और वहीं पर कोई गरीब कार्यकर्ता भी हो‌ तो चंद्रशेखर जी ‌‌ आदतन कहते थे कि अरे भाई इसकी कुछ मदद करो। सर्दी के दिन थे ‌ एक साहब चंद्रशेखर जी से मिलने के लिए आए जिन्होंने पूरे गर्म कपड़ों के साथ-साथ ऊपर से कीमती ‌ गर्म शाल भी ओढ रखी थी,‌ कार्यकर्ता के शरीर पर ‌ केवल आघी बांह ‌ का स्वेटर था, ‌ अध्यक्ष जी ने कहा कि भाई तुम्हारी शाल तो बहुत ही‌ कीमती दिखाई दे रही है, जरा मुझे दिखाओ उनसे शाल लेकर उन्होंने उस कार्यकर्ता ‌ को देते हुए कहा इसको ‌ ओढ़ लो यह तो फिर एक नयी खरीद लेंगे। उनके कार्यकर्ताओं में हमेशा एक विश्वास बना रहता था की अध्यक्ष जी के रहते हुए हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। कैसी भी परेशानी हो कार्यकर्ता ‌ बिना हिचक के अपनी तकलीफ, मजबूरी को‌ उनको बतला देता था ‌ और जहां तक संभव होता अध्यक्ष जी सदैव मदद करते।केंद्र ‌ मैं जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद राज्यों के चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन होना था। उत्तर प्रदेश के प्रत्याशियों की एक लिस्ट चौधरी चरण सिंह ने प्रस्तावित की थी जिसमें से 88 नामों को चंद्रशेखर जी ने हटा दिया ‌ और नए ‌ प्रत्याशी बना दिए गए। चौधरी साहब ने इस पर गहरा विरोध दर्ज किया परंतु चंद्रशेखर जी टस से मस नहीं हुए। जिसके कारण बड़े स्तर पर सोशलिस्टों को विधानसभा का चुनाव लड़ने का मौका मिला।
समाजवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए चन्द्रशेखर जी बड़े दावे तो नहीं करते थे, परंतु ‌ हर तरह की मदद बिना ढोल पीटे ‌ वे करते थे।दिल्ली में डॉ. राममनोहर लोहिया समता न्यास की जमीन से लेकर उसके निर्माण तक की जिम्मेदारी चन्द्रशेखर जी ने उठाई। चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री थे, ‌ दिल्ली में कई संस्थाओं को उन्होंने सरकारी जमीन अलाट की थी,‌ परंतु ‌ समता न्यास को अभी तक भी‌‌ जमीन नहीं मिली थी, ‌ भावुकता वश मैंने ‌ उनसे कह दिया कि ‌ लगता है कि आपका‌ पुराना पीएसपी विरोध‌ अभी तक गया नहीं है। एकदम कड़क आवाज में उन्होंने कहा क्या बकते हो,‌ मेरे सामने तो यह बात अभी तक आई भी नहीं, ‌ उन्होंने तत्काल दिल्ली के गवर्नर मारकंडेय सिंह को टेलीफोन करते हुए कहा तुरंत यहां आओ, ‌ उनके आने पर उन्होंने आदेश दिया आज ही समता न्यास को‌ जमीन अलोट करो,‌ कोई दिक्कत अगर आ रही है तो मेरे आदेश से उसको करो। ‌ ‌कमल मोरारका के सहयोग से उसका निर्माण संभव हो सका। डॉ. लोहिया का सपना था कि भारत के ठीक बीचोंबीच करोंदी में कोई केंद्र बने। उसी स्थान पर “मनोहर गाँव” के नाम से केंद्र स्थापित कराने का कार्य भी चन्द्रशेखर जी ने ही पूरा किया।
समाजवादी चिंतक मधु लिमये के साथ मिलकर समाजवादी साहित्य न्यास की स्थापना का कार्य भी उन्होंने ही सम्पन्न किया। जवाहरलाल नेहरू म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के भूतपूर्व उपनिदेशक मरहूम डॉ. हरिदेव शर्मा के माध्यम से आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, यूसुफ मेहर अली, डॉ. राममनोहर लोहिया आदि समाजवादी विचारकों के साहित्य को संग्रहित, व्यवस्थित और प्रकाशित कराने में उन्होंने व्यक्तिगत रुचि लेते हुए हर प्रकार का सहयोग सहर्ष दिया। मधु लिमये और डॉ. हरिदेव शर्मा की असामयिक मृत्यु से इस दिशा में बहुत बड़ी क्षति हुई। अन्यथा मधु लिमये, चन्द्रशेखर और डॉ. हरिदेव शर्मा के संयुक्त प्रयास से समाजवादी आंदोलन वैचारिक रूप से बहुत अधिक पुष्ट हो सकता था।
समाजवादी विचारधारा के लिए काम करने वाले ‌ संगठनों,‌ व्यक्तियों की चंद्रशेखर जी ‌ हमेशा मदद किया करते थे। सोशलिस्ट विचारक किशन पटनायक द्वारा स्थापित समाजवादी जन परिषद के द्वारा प्रकाशित होने ‌ वाली पत्रिका ‌ सामायिक वार्ता के आर्थिक संकट के संदर्भ में साथी योगेंद्र यादव एवं अजीत ‌झा ने‌ कहा कि चंद्रशेखर जी से मुलाकात कर कुछ मदद ली जाए। मैं, योगेंद्र यादव और ‌ अजीत झा तीनों मिलने के लिए गए। उनको अपनी समस्या से अवगत कराया इसी बीच एक धनाढ्य व्यक्ति वहां पहुंच गए, ‌ चंद्रशेखर जी ने उनसे‌ मजाक करते हुए कहा‌ की कुछ हमारी भी मदद करोगे, ‌ या सब कुछ अपने पास ही रखोगे, उन्होंने कहा जैसा आपका हुकुम‌ तो चंद्रशेखर जी ने कहा‌ की ये क्रांतिकारी लोग हैं‌, ‌पत्रिका निकालते हैं, इनको ₹50000 ‌ दीजिए। इस प्रकार उन्होंने समाजवादी जन परिषद की मदद बिना किसी दिखावे या एहसान के करवा दी।
चन्द्रशेखर जी की जीवटता का सुंदर प्रमाण हमें भोंडसी आश्रम के रूप में दिखाई पड़ता है। आज के इस हरे-भरे उपवन को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि कभी यह स्थान किस हालत में था। जब मैं पहली बार वहाँ गया, तो जो दृश्य मैंने देखा वह अत्यंत वीरान था—नंगे पहाड़, उबड़-खाबड़ मिट्टी के ढेले, कहीं-कहीं सूखी कीकर की कंटीली झाड़ियाँ, और चारों ओर ऐसा सूना विस्तार कि न पानी, न पक्षी, न जानवर, न इंसान दिखाई देता था।
बाद में इसी बियाबान जंगल में पलाश के वृक्ष के नीचे कुटिया बनाकर, अकेले धूनी रमाकर, बनियान और धोती पहने चन्द्रशेखर जी एक-एक क्यारी में पेड़-पौधे अपने हाथों से लगाते और सींचते रहे। पर प्रश्न यह है कि इस सिंचाई के लिए पानी कहाँ से आया? जंगल को उपवन बनाने के लिए सबसे बड़ी जरूरत पानी की थी। नंगे पहाड़ पर गिरने वाले बरसाती पानी के अतिरिक्त कोई दूसरा साधन नहीं था। वही बरसाती पानी पास के गाँव बादशाहपुर के लिए भी मुसीबत बन जाता था। उसी पानी को, जो पहले उपद्रव मचाता था, पहाड़ के साथ-साथ खाई खोदकर उसमें इकट्ठा किया गया। फिर ठहरे हुए पानी को, जिसे बार-बार जमीन पी जाती थी, रोककर सूखी धरती के पौधों तक पहुँचाने के लिए चन्द्रशेखर जी को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।
मैंने उनके निजी कक्ष में आचार्य नरेन्द्र देव और जवाहरलाल नेहरू का एक संयुक्त तैलचित्र लगा देखा था। मुझे लगता है कि चन्द्रशेखर जी का व्यक्तित्व संभवतः इन दोनों विभूतियों के समिश्रण से प्रभावित था। नेता पर जब राजनीति हावी हो जाती है, तो वह अहंकारी, आत्मकेंद्रित और अपनी कुर्सी की चिंता में डूबा रहता है; परंतु चन्द्रशेखर जी इसके अपवाद थे। वे न हठी थे, न दुराग्रही। उनमें खाँटी देशी ठसक थी। भाषा और वेश-भूषा में वे पूरी तरह देशज थे। 1990 में ‌ सोशलिस्ट नेता मधु लिमए ‌ ने चंद्रशेखर जी की ‌ प्रधानमंत्री बनने के बावजूद अपनी ‌ वेशभूषा न बदल कर ‌ वही धोती, कुर्ता,‌ बंडी, चप्पल ‌ पहनते रहने की ‌ तारीफ करते हुए ‌ कहा था कि यह महज कपड़े बदलने का मामला नहीं है, इसमें एक व्यक्ति की जीवन शैली, चिंतन, ‌ ‌व्यक्तित्व की झलक मिलती है। वे बेलौस और बेबाक होकर अपनी बात कहते थे, पर उसमें बड़बोलापन नहीं होता था। असहमति होने पर भी सामने वाले का सम्मान करना उनकी खूबी थी। राजनीतिक रूप से विरोधी होने परन भी व्यक्तिगत स्तर पर उसकी मदद करने का बड़प्पन उनमें था। वे विपरीत परिस्थितियों में भी हताशा और निराशा के शिकार नहीं होते थे।
एक दौर ऐसा आया की चंद्रशेखर जी अकेले से पड़ गए थे। उनके संगी साथी जिनको उन्होंने‌ फर्श से अर्श में बैठाया था‌ उनका साथ छोड़कर‌‌ सत्ताधारियों के साथ जुड़ रहे थे।
जनता दल बनने के बाद विश्वनाथ प्रसाद सिंह को ‌ प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम में उनके खासमखास‌ भी जुट गए थे, परंतु चंद्रशेखर जी को यह कबूल नहीं था। एक साजिश के तहत चौधरी देवीलाल जी को प्रधानमंत्री बनाने के ‌ नाम पर एक नाटक हुआ। अध्यक्ष जी चौधरी देवीलाल जी के नाम पर तैयार हो गए परंतु जब संसदीय दल में यह प्रस्ताव आया तो चौधरी देवीलाल जी ने कहा कि मैं तो सबका ताऊ हूं,‌ मैं अपना ताज‌ विश्वनाथ प्रसाद सिंह के सर पर रखता हूं। उसके बाद‌ चारों ओर से दबाव दिया जाने लगा की विश्वनाथ प्रसाद सिंह के अंतर्गत चंद्रशेखर जी उप प्रधानमंत्री बन जाए। वक्त की विडंबना देखिए ‌ की जो लोग चंद्रशेखर जी की उंगली पड़कर मंत्री बन गए थे अब वे ‌ चंद्रशेखर जी ‌ की मुखर आलोचना करने लगे।
कुछ तथ्यों को रेखांकित करना जरूरी होता है कि इतिहास किस तरह से करवट लेता है। मेरे नेता और साथी बृजमोहन तूफान, ‌ रामगोपाल सिसोदिया, ‌ रविंद्र मनचंदा, ललित मोहन गौतम और मैंने ‌ एक‌ प्रेस वक्तव्य जारी कर चंद्रशेखर जी का समर्थन‌ तथा उनके साथ की जा रही साजिशों की‌ आलोचना कर दी,‌ इसकी एवज में ‌ जनता दल केंद्रीय कार्यालय की ओर से हमारे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का‌ फरमान निकल गया। ‌ पूरे जनतादल के शासन काल में‌ हम उसके केंद्रीय कार्यालय‌ सात जंतर मंतर नहीं गए। दिल्ली के विट्ठल भाई पटेल भवन के लान पर‌ जनता दल का विशाल ‌ आयोजन था,। प्रोफेसर मधु‌ दंडावते‌ सभा की कार्रवाई चला रहे थे, ‌ चंद्रशेखर जी भी मंच पर मौजूद थे उनकी मौजूदगी में कई छुट भैय्या नेता‌‌‌ अध्यक्ष जी पर व्यंग कस रहे थे। मुझसे रहा ना गया मैं एक संशोधन के नाम पर‌‌ माइक पर बोलने के लिए चला गया और जब मैंने ‌ चंद्रशेखर जी के सामने ‌ नए नकली गांधी बने नेता की आलोचना की तो भीड़ की ओर से ‌ आक्रमण शुरू हो गया। हरियाणा के फरीदाबाद के बादशाह‌ स्टेडियम में चौधरी देवीलाल जी ओमप्रकाश चौटाला जी के नेतृत्व में सभा हो रही थी वहां पर जब हम साथियों‌ ने चंद्रशेखर जिंदाबाद के नारे लगाए तो हमें हरियाणा पुलिस ने घकियाते, ‌ थप्पड़ मारते स्टेडियम से बाहर कर दिया।
लोकदल से अलग हटकर‌‌ समाजवादी जनता पार्टी बनी जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर, उपाध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, ‌ महामंत्री चौधरी ओम प्रकाश चौटाला बने‌ हम भी उसमें शामिल हो गए,‌ और मुझे दिल्ली समाजवादी जनता पार्टी का अध्यक्ष भी बना दिया गया, हम आख़िर तक चंद्रशेखर जी के साथ रहे। अध्यक्ष जी‌ गंभीर रूप से बीमारी ‌ के शिकार हो गए, ‌ उसके बावजूद भी उनका मनोबल कभी टूटा नहीं। पार्टी की आखिरी राष्ट्रीय समिति की बैठक में बीमारी की हालत में वे आए हुए थे उनकी आवाज बहुत मंद पड़ चुकी थी। साथ में पार्टी के महासचिव कमल मुरारका बैठे हुए थे‌ वे जो कुछ भी ‌ कह रहे थे उससे कमल मुरारका‌ कार्य समिति को बतला रहे थे। उस दिन अध्यक्ष जी ने कहा था‌ जिनको हमारे साथ रहना हो रहे,‌ जिनको अपना भविष्य कहीं और बनता दिख रहा हो,‌ वह जा सकते है।
एक सवाल हमेशा ‌ दिमाग‌ में कौंधता है कि उनके द्वारा ‌ स्थापित किए गए रचनात्मक कार्यों को पलीता क्यों लगा? किसी भी विचारधारा,‌ मिशन के प्रचार प्रसार के लिए ‌ एक व्यवस्थित तंत्र की ‌‌ अनिवार्य आवश्यकता होती है। उन्होंने अपने जीवन में ‌ अपनी व्यक्तिगत संपत्ति ना बनाते हुए इस दिशा में भी ‌ अथक कार्य किये। भारत यात्रा केंद्र के नाम से भोंडसी ‌ सहित देश के अन्य राज्यों, ‌‍‌‌ अगली (केरल) यरकाट (तमिलनाडु) ‌ देव ग्राम (आमदापुर उत्तर प्रदेश) ‌ सारनाथ, ‌ मारलवाडी (कर्नाटक) ‌ डेडिया पाड़ा ‌ (गुजरात) परणदवाडी (महाराष्ट्र) में सैकड़ो एकड़ जमीन के ऊपर आश्रम, केंद्र स्थापित किये। दिल्ली में आईटीओ के पास पुलिस हेडक्वार्टर के पीछे ‌ तकरीबन 2000 गज की भूमि पर ‘नरेंद्र देव निकेतन’ की स्थापना की थी। वही आईटीओ के पास दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर ‌ तकरीबन 800 ,गज के प्लाट पर ‌ एक भवन का भी निर्माण हुआ जिसका बाद में ‘चंद्रशेखर भवन’ नामकरण हुआ। यंग इंडियन मैगजीन ‌ के एतिहासिक ‌ दस्तावेज,‌ लेख‌,‌ पुस्तकें,‌ पांडुलिपि, ‌ ऐतिहासिक फोटो इत्यादि के रिकॉर्ड‌ का क्या हुआ?
नरेंद्र देव निकेतन ‌‌ को बुलडोजर से भूमिदोज‌ कर नामोनिशान मिटा दिया गया। चंद्रशेखर भवन पर ताले पड़े हैं, कोर्ट कचहरी चल रहा है। भारत यात्रा केंद्र नाम मात्र के‌‌ आश्रम है। सूर्य कुमार जी द्वारा संचालित ‌ देव ग्राम आमदापुर ‌ से जरूर सूचनाओं मिलती रहती हैं।गनीमत है कि अभी तक उसकी हजारों करोड़ मूल्य की ‌ भूमि ‌ की बंदरबांट नहीं हो पायी,‌ इसका श्रेय ट्रस्ट के अध्यक्ष‌ सुधीन्द्र भदोरिया को दिया जा सकता है।
चंद्रशेखर जी ‌ के अनुयायी,‌ ‌ सहयोगी, मानने वाले, ‌ अगर नालायक निकले तो इसमें चंद्रशेखर जी का क्या कसूर। उनके जन्मदिवस पर अगर हम उनके ‌ जीवन ‌ से कुछ सीख सके‌ तभी उनका जन्म दिवस मनाना ‌ सही मायने में सार्थक होगा। एक ऐसा नेता,‌ जिसने आचार्य नरेंद्र देव ‌ के समाजवादी विचार दर्शन ‌ मैं दीक्षित होकर,‌ जीवन पर्यन्त हालात कैसे भी रहे हो, कभी समाजवादी विचारधारा से मुंह नहीं मोड़ा। जो हर अन्याय, जुल्म ज्यादती ‌ गैर बराबरी के खिलाफ ‌ लड़ता ही रहा। हर बेसहारा बेकसूर‌,‌ मजदूरो, किसानों‌ के हक ‌ की आवाज को संसद से लेकर सड़क तक ‌ उठाता ही रहा।‌ सत्ता ‌ उसको कभी अपने मोहपाश‌ मैं बांध नहीं पायी। आत्मसमर्पण करना उसने सीखा ही नहीं था। जिसको दोस्त, हमदर्द‌ साथी माना ‌‌ उसका कभी साथ छोड़ा ही नहीं।

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