नियति का लेखा कोई मिटा नहीं सकता

ऊषा शुक्ला

नियति को मैं भगवान की मर्ज़ी के सिवाय कुछ नहीं मानती। नियति का शाब्दिक अर्थ : भाग्य, लेख, किस्मत, होनी आदि। जिसकी जैसी क़िस्मत इश्वर ने लिख दी ।व्यवहारिक तौर पर नियति का अर्थ है कि जो जैसा करता है, वैसा भोगता है।नियति एक धार्मिक और दार्शनिक अवधारणा है जो कहती है कि व्यक्ति की जीवन पथ और परिणाम पूर्व से निश्चित होते हैं, और उन्हें किसी अदृश्य शक्ति या भगवान की इच्छा के अनुसार प्राप्त होते हैं।नियति को हम केवल वर्तमान में ही बदल सकते हैं | इसलिए अतीत में उलझे ना रहे क्योंकि यह हमारी बहुमूल्य उर्जा को बर्बाद करता है | हम अपने विचारों,इच्छाओं एवं पसंद-नापसंद से नियति का निर्माण करते हैं | आमतौर पर माना जाता है कि जिंदगी में जो भी हमारे साथ होता है वह पहले से तय है। जहां नियति पर हर जगह भरोसा किया जाता है वहीं इसे लेकर अलग-अलग राय है। एक छोर पर तो वे हैं,जो मानते हैं कि हमारे क्रियाकलाप ही सबकुछ तय करते हैं। हालांकि, उनका यह ठोस आत्मविश्वास आमतौर पर जिंदगी की अप्रत्याशित घटनाओं के सामने नहीं टिक पाता। दूसरे छोर पर वे होते हैं, जो न सिर्फ नियति अथवा भाग्य पर भरोसा करते हैं बल्कि मानते हैं कि इसे बदला नहीं जा सकता।नियति का क्या मतलब है, क्या आप जानते हैं, शायद आपके अनुसार सब कुछ पहले से तय ओर निर्धारित है, ओर उसे कैसे बदले। शायद यही, लेकिन ऐसा नही है, श्रष्टि का नियम है, क्रिया की प्रतिक्रिया, मतलब कर्मफल, जैसा आप करोगे उसके अनुसार परिणाम आने तय है , वस यही नियति है, कर्मफल निश्चित रूप से ही तय है।आइये समझे नियति क्या है, ऐसा क्या है जो पहले से तय है, आपका जन्म कहा होगा , यह आपकी पिछली यादाश्त पर तय होता है, आप केसी प्रकृति के होंगे यह कुछ हद तक आपके जीन्स यानी माता-पिता और परिवारीजन पर निर्भर करता है, किन्तु मुख्य है आपके चारो तरफ का वातावरण जो कि आपके जीवन को बनाने में बहुत ही अहम है।उसके द्वारा आप अपनी नियति बदल सकते हैं। बस अपना वातावरण बदल दीजिये, जैसे कि संगत,जैसा बनना है वैसी संगत करें और प्रभाव देखे।भाग्य और नियति को अपने पूर्वकृत कर्मों के परिणाम के रूप में देख सकते हैं। ज्योतिषियों के स्थान पर ज्योतिर्विद्या को केंद्र में रखें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि यह विद्या मनुष्य के पिछले कर्मों का दंड-पुरस्कार बताने वाला विज्ञान है।कुछ ऐसा जिसके लिए किसी व्यक्ति या चीज़ को नियत किया जाता है ।अपने भाग्य को स्वयं नियंत्रित करना चाहता है। घटनाओं का एक पूर्व निर्धारित क्रम जिसे अक्सर एक अप्रतिरोध्य शक्ति या एजेंसी माना जाता है।अकसर आपनें बोलचाल की भाषा में सुना होगा कि नियती को यही मंजूर था। मतलब अगर किसी की अकासमिक मौत। या फिर कोई प्राकृतिक आपदा या फिर बाढ आना और उसमें जान माल का भारी नुकसान होना । यही है नियती मतलब भगवान प्राकृतिक इन दोनों को आप नियती या कहर, जलजला , आप कह सकती है। और नुकसान तो बहुत होता है। जब नियती की नियत बदलती है। तो भूकम्प जैसे आपदाओं का भी समना करना पडता है।नियति का लिखा विधाता का इंसान के कर्मो का ही लेखा जोखा है, प्रेतेक नियति का कोई ना कोई कारण है उसके लिए कुछ नए कुछ कारण है,कहते है नियति का लिखा ईश्वर भी नहीं टाल सकते और सबकी मृत्यु कैसे होगी यह भी निश्चित है। इसके लिये कर्म का सिद्धांत समझना होगा.आपने कोई कर्म किया, उसका कुछ न कुछ फल अवश्य होगा.। अगर आपने किसी की हत्या की, यह उसकी नियति थी. उसे इसी वक़्त मरना था और इसी तरह मरना था. उसने पूर्व में कुछ ऐसा कर्म किया होगा की उसकी हत्या होने की नियति बनी.।आपकी भी नियति थी की आप ही उसकी हत्या करें. परन्तु आपने ही उसकी हत्या क्यों की, जब आप इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए विचार करेंगे, तब आप पाएंगे की आपने अपने पिछले किसी कर्म के आधार पर ऐसा किया.।और अगर आपके पास यह ज्ञान है, यह जानकारी है, आपका विवेक इस तरह का जागृत हो गया है तो फिर अब आप उसकी हत्या नहीं करेंगे और अपने आने वाले कर्म फलों को अच्छा कर लेंगे.

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