आंदोलन की कामयाबी के बावजूद जबान पर लगाम जरूरी!

जंतर मंतर ‌पर नीट के सवाल पर‌‌ नयी नस्ल के‌ लड़के लड़कियों ‌ के भारी जुटान ‌ का कोई एक कारण नहीं। भारतीय जनता पार्टी ‌ के राज में‌‌ जहां जुमलो से‌ मुल्क को सब्ज बाग दिखाएं गए,‌ 2 करोड़ नौजवानों को रोजगार, ‌ हर‌ हाथ को काम‌ खेत को पानी, हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए, ‌ बेकारी का खात्मा, ‌ भ्रष्टाचार बेमानी के खात्मे लिए‌ प्रधानमंत्री का ऐलान ना खाऊंगा ना खाने दूंगा। परंतु हकीकत में हुआ इससे उलट, ‌‌ करोड़ों ‌ पढ़े लिखे डिग्री धारी तथा अशिक्षित नौजवान बेरोजगारी के आलम में दर-दर भटकने,‌ ‌ अड़ानी अदानी के हाथ में अरबों की सरकारी मिल्कियत ‌ को लूटाने, तथा आशा की किरण भी ‌ नहीं दिखती के कारण घर में मायूसी के आलम‌ के कारण नौजवानों ‌ के गुस्से का इजहार है।

नरेंद्र मोदी के राज में गद्दी पर बने रहने के लिए ‌ हिंदू मुस्लिम नफरती‌ ‌ एजेंडा, ‌ जिसके उन्माद में मुसलमानों को ‌‌ दूसरे दर्जे ‌का शहरी‌ बना‌ कर दहशत में‌ जीने का माहौल ‌ तैयार किया गया‌ ऐसे में जब ‌ नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‌ गैर मुस्लिमों का ही मोर्चा लग गया तो पूरी कौम‌ ने ‌ राहत महसूस करते‌ हुए‌ दिलो जान से मोर्चे में शिरकत की। और भी बहुत से ऐसे कारण थे जिसके कारण ‌ आंदोलन में ‌ आखिरी दिनों में‌ जान आयी ‌ नौजवानों के‌ अंतर्मन की झल्लाहट,‌ फटने‌ का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि मोदी जैसे अहंकारी जो पार्लियामेंट में अपने हाथ को छाती पर मारते हुए‌ मुनादी करते हैं,‌ एक अकेला सब पर भारी,‌ को होश में ला दिया। घबराहट से भरे हुए उनके चेहरे पर रात के 12:00 बजे ‌ जो अपील जारी की गई, ‌ उनका गरुर ‌ मेमना नजर आ रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी का यह ऊंट क्या करवट लेगा अभी कहना जल्दबाजी होगा। परंतु इस आंदोलन में‌ कुछ ‌ ‌असामाजिक तत्वों ने जिस प्रकार की गाली गलौज की भाषा का प्रयोग किया ‌ उसको भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री को इंगित कर‌ मां की की गालियां दी गई,‌ उसकी तरफदारी भी नहीं की जा सकती। ‌

निजी दोस्तों के बीच में‌ इस्तेमाल की गई भाषा ‌ तथा सार्वजनिक रूप से ‌ किसी को अपमानित ‌ करने की भाषा में फर्क होता है। ‌ कुछ का कहना है कि जब बीजेपी वाले सोनिया गांधी ‌ पर इसी प्रकार के हमले कर रहे थे तो उसके जवाब में अगर यह गालियां दी जा रही है तो क्या हर्ज है। उस समय भी कांग्रेस विरोधियों तक ने ‌ इसको जायज नहीं ठहराया इसकी ‌ मजम्मत की। गाली गलौज का तरह-तरह के तर्क देकर समर्थन करना जायज नहीं मेरे कहने का यह कदापि अर्थ नहीं कि वहां पर सारा युवा वर्ग इसी मिजाज का था। इन्हीं गाली बाजों के ‌ वीडियो को आधार बनाकर भाजपा का प्रचार तंत्र ‌ आंदोलन को बदनाम करने पर ‌ पूरी ताकत से जुट गया, ‌ बाकी सवालो ‌ से बहस को भटकाने में लग गया। कांवड़ ‌ जो धार्मिक लोगों के लिए आस्था का दिन है,‌ हरिद्वार से गंगाजल लेकर ‌ सैकड़ो मील ‌ पैदल चलकर‌ अपने मंदिर के शिवलिंग पर जलाभिषेक करने को‌ प्रतीक दिन मानते हैं के दिनों में‌‌ भी कुछ लफंगे सड़कों पर‌‌ आतंक मचाते हुए निकलते हैं। शब -ए -बारात मुसलमानों का एक पवित्र दिन है,‌ जो रमजान से ठीक 15 दिन पहले आता है, ‌‌ पूरी रात जागकर‌ इबादत नमाज और ‌ दुआ की जाती है,

मगर उस पवित्र दिन की गरिमा के‌ स्थान पर‌ ‌ कुछ लफंगे गुंडागर्दी तोड़फोड़ करते हुए दिल्ली की सड़कों पर पैदल मोटरसाइकिल पर निकल पड़ते, ‌ इंडिया गेट के पास मोटरसाइकिलों की कलाबाजी का प्रदर्शन करते आतंक मचाते फिरते थे। परंतु पुलिस की ‌ जवाबी कार्रवाई, ‌ तथा मुस्लिम समाज के धार्मिक एवं सामाजिक ‌ संगठनों नेताओं ने उसकी निंदा करते हुए उस पर रोक की‌ पहल की। इस तरह की‌ गुंडागर्दी करने वाला तत्व हमेशा मौके की तलाश में रहता है कब‌ भीड़ में मौका मिले तो वह अपनी दमित भावनाओं का इजहार कर सके। आंदोलन में इस तरह के तत्वों से सावधान रहने की भी निहायत जरूरी है। ‌कामयाबी के जश्न में ‌‌ होश में रहकर,‌ मर्यादा का पालन करने से आंदोलन को हमेशा ताकत ही मिलेगी।

– राजकुमार जैन

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